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बन्धन: खण्ड 3 / अध्याय 25 |
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उपन्यास
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शुक्रवार , , 28 मार्च |
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मनोज सिंह
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अदिति पूर्ण रूप से परिपक्व थी। समझदार के साथ-साथ व्यावहारिक भी थी। उसे अपनी मंज़िल के अलावा कुछ नहीं दिखता था। परंतु अमित और निकिता के अचानक अधिक साथ रहने से, उसे परेशानी तो नहीं, आश्चर्य ज़रूर हो रहा था। ऊपर से कुछ दिनों से दोनों को गुमसुम देख-देख कर, उसने एक बार श्याम और राधिका से पूछा भी था। परंतु दोनों ने, ...कोई खास बात नहीं है, इतना कहते हुए बात टाल दी थी।
विक्रम के उच्छृंखल स्वभाव के चलते समझदार लड़कियाँ उसे दूर से ही नमस्कार करती थीं। जो स्वयं इसी सोच और स्वभाव की थीं, वे मज़े ले लेती थीं। वैसे इनकी संख्या कम ही थी। अब तक आधुनिकता का रोग ज़माने में कम ही फैला था। विक्रम भी इसी तरह की लड़कियों के साथ अपनी मस्ती में डूबा रहता और कुछ नहीं तो ट्रेनी नर्सों को ही तंग करता रहता। कभी कोई ज़रूरतमंद फँस गई या कोई भावनओं में बहकर आकर्षित हो जाये तो ठीक, नहीं तो पैसे के ज़ोर पर शहर में क्षणिक प्यार मिलने में कोई खास परेशानी नहीं होती थी। धीरे-धीरे व्यावसायिता और भौतिकता के बढ़ने से, लड़कियों की सोच और समझ में भी फ़र्क़ आना प्रारंभ हो चुका था। प्यार बेचने और खरीदने वालों की संख्या अचानक बढ़ने लगी थी। विक्रम शहर में भी मस्ती कर आता। अदिति के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानता था, पर घर के बारे में सुनकर अदिति पर भी एक बार अपने हथकंडे अजमाने की कोशिश की थी। खूब खरी खोटी सुनायी थी अदिति ने। मगर ऐसे लोगों का दिमाग़ ठीक कहाँ होता, बेशरम होते हैं। अदिति के धमकाने पर, हँसते मुस्कुराते हुए, भाग गया था।
एक दिन अचानक अदिति ने अमित को अकेले देखा तो फिर सीधे-सीधे पूछ ही लिया था,
''क्या बात है? ...दिखते ही नहीं। कालेज कम आते हो क्या? घर में सब ठीक तो है? और यह आजकल निकिता को क्या हुआ है? विक्रम से दूर रहती है! ...एक दिन विक्रम ने मेरे साथ भी बड़ी बेढंगी बात की थी। ...ये माजरा क्या है?''
''कुछ भी तो नहीं।''
अदिति के हक़ भरे सवालों को वह धीरे से टाल गया था।
''अच्छा मैं घर आऊँगी, क्या बताऊँ दूर पड़ता है। आँटी से कहना कि मैं उन्हें याद कर रही थी। और सुप्रिया कैसी है? उसे मेरा हाय कहना...।''
साल दो साल से अदिति अपनी माँ के साथ कालेज के पास ही किराये के मकान में रहने लगी थी। घमापुर दूर पड़ता था। आने-जाने में समय व्यर्थ होता था फिर पैसे की कोई कमी भी नहीं थी कि अच्छे मोहल्ले में न रहा जाये।
''...और हाँ संभलकर, इन लोगों से ज़्यादा दोस्ती ठीक नहीं। जो भी करना, सोच समझकर।''
अदिति का पूरा हक़ था, जाते-जाते कह गई थी। पर वह इस बात से अनजान थी कि अब एक नया अधिकार अमित पर अपने पाँव पसार रहा है।
निकिता जब भी कालेज आती अक्सर अमित के साथ ही रहती। अगर वह नहीं मिलता तो ढूँढ़ने लगती थी। हॉस्टल में भी उसी के इंतज़ार में बैठी रहती थी। अमित को कुछ खास समझ नहीं आ रहा था। मगर उसे भी निकिता का साथ अच्छा लगता था। भावनाओं में बह रहा था। सब कुछ बुद्धि से नहीं होता। सब कुछ सोचकर नहीं होता। कुछ विधि का विधान भी होता है। फिर ग़लत भी क्या था। निकिता पूर्ण रूप से टूटी हुई थी और अमित का सहारा उसे अच्छा लगता था, और वह उसे देने में कोई ग़लती नहीं महसूस करता था। इतने सालों का साथ था। पहले भी बच्चों-सी उसकी बातें उसे कभी भी ख़राब नहीं लगती थीं। छोटी-छोटी सी चीज़ों में उसका ज़िद्द करना उसे कभी तकलीफ़ नहीं देता था।
कुछ हफ्ते बीत जाने पर भी निकिता सदमे से पूरी तरह बाहर नहीं हो पायी तो श्याम और राधिका के समझाने पर वह दिल्ली जाने के लिए तैयार हो गई थी। पहले तो डरती रही परंतु अमित के दिल्ली छोड़ आने के लिए तैयार होने पर, मान गई थी। अमित पहली बार दिल्ली जा रहा था। सारा इंतज़ाम श्याम ने किया था। दिल्ली पहुँचकर अमित को निकिता के घर का वातावरण कुछ भिन्न लगा था। समझने की कोशिश की तो नाकामयाब रहा। सोच रहा था, ...हो सकता है बड़े शहर के लोग ऐसे ही हों। उसने यह तो देख ही लिया था कि निकिता कोई बहुत बड़े घर की लड़की नहीं है। बड़े शहर का मध्यमवर्गीय परिवार था। परंतु हाँ, रहन-सहन और दिखावे की वज़ह से बाहर मिला इंसान, बड़ा मानने की ग़लती कर सकता था। यही सब लोग जबलपुर में भी निकिता के लिए समझते थे। वहीं पर उसने विक्रम के प्रभाव को भी देखा था। विक्रम के लिए निकिता के घर में कई बार पूछताछ हुई थी। उसके पैसे वाले होने का प्रभाव पूरे घर पर था। परंतु अमित से कोई भी जवाब नहीं मिलने पर सब अपने-अपने जीवन में व्यस्त और मस्त हो गए थे। किसी को भी निकिता की बहुत ज़्यादा फ़िक्र नहीं थी। अमित को ताज्जुब तो तब हुआ जब निकिता की माँ ने भी अपनी बेटी की उदासी को नहीं पढ़ा और न ही कुछ विशेष पूछताछ की थी। ...निकिता के पिता गर्म मिज़ाज के लगे। उनसे निकिता भावनात्मक रूप से अधिक जुड़ी हुई दिखाई दी थी। अब यह प्यार था या डर, अमित के लिए समझना मुश्किल था।
अमित ने पहली बार दिल्ली देखी थी। बड़ा शहर, बड़ी इमारतें, बड़ी गाड़ियाँ, चौड़ी रोड। उसको पहली बार तो इस चकाचौंध ने बड़ा प्रभावित किया था, पर जल्द ही इतना तो समझ ही गया था कि यह दुनिया बिल्कुल भिन्न है। राधिका के ज़ोर देकर कहने से, उसने उसके घर भी फ़ोन किया था। एक दिन राधिका के घर से गाड़ी आकर उसे ले गई थी। राधिका के घरवाले काफी पैसे वाले लगते थे। कोई पुराना खानदानी व्यवसाय था। मगर उसने इसका ज़िक्र कभी भी नहीं किया था। राधिका के मम्मी-पापा, बहुत सारे सगे और चचेरे भाई-बहन और छोटे-बड़े चाचा-चाची, दादी सभी बड़े आत्मीयता से मिले थे। संयुक्त परिवार था। राधिका के घर पर उसे बड़े शहर की उन किसी भी परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा था जो उसने निकिता के घर महसूस की थी। बड़े शहर में रहते हुए भी ऐसे वातावरण को देखकर उसे बड़ा अच्छा लगा था। सभी राधिका के बारे में जानने में उत्सुक थे। राधिका और निकिता के व्यवहार में फ़र्क़, दिल्ली आकर वह और अच्छे से कर सका था। राधिका के घर से आते-आते देर हो गई थी। वापस पहुँचा तो घर पर निकिता इंतज़ार कर रही थी। बाकी सब खाना खाकर अपने-अपने कमरे में बंद हो चुके थे। अगले दिन अमित का वापस निकलना था। उसने सुबह-सुबह जाने की तैयारी शुरू की तो निकिता दरवाज़े पर थी, ''मैं भी तुम्हारे साथ वापस चलूँगी''
अमित ने समझाने की कोशिश की थी, ''थोड़ा रुक जाओ, बाद में आ जाना।''
''नहीं... पढ़ाई मिस होगी''
और फिर वो वापस आने के लिए ज़िद्द करती रही। निकिता की माँ और पिताजी ने भी ज़्यादा नहीं मना किया, भाई के पास तो बात करने के लिए शायद वक्त की कमी थी, मगर बहन प्रणिता ज़रूर दुःखी थी। निकिता की टिकट भी नहीं थी परंतु अंत में जीत उसके ज़िद्द की ही हुई थी।
वापसी में नयी दिल्ली से भोपाल होते हुए जबलपुर आना पड़ा था। सीधे निज़ामुद्दीन से जबलपुर का टिकट नहीं मिल पाया था। नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बहुत अधिक ट्रैफिक होने के कारण नया स्टेशन निज़ामुद्दीन, दिल्ली में ही बनाया गया है। ...अमित ने दो दिन में ही काफी जानकारी हासिल कर ली थी। दोनों ओर के रास्ते के सफर में निकिता पूर्ण रूप से अमित पर निर्भर थी। कई जगह वह अमित के कंधे पर सिर रखकर सो भी जाती। अमित को महसूस होता था कि निकिता को उसका साथ बहुत अच्छा लगता है और शायद उसे उसकी ज़रूरत भी है। अमित को उसकी ऐसी हालात में सहयोग और सुख देने से आनंद की अनुभूति होती। और फिर वापसी में निकिता की इन बातों ने उसे सोचने के लिए मजबूर कर दिया था।
''मुझे सफर करने से बहुत डर लगता है, ...अगर तुम नहीं होते तो अकेले वापस पहुँच ही नहीं पाती। ...शायद रास्ते में ही मर जाती।''
सुनकर अमित उसकी आँखों में उभरती पीड़ा के वेग में बहने लगा था।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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