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बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 29
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
गुरुवार , , 03 अप्रेल
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



भावना दिखाने के बहुत सारे तरीक़े हैं। जो प्रकृति ने हर जीवित प्राणी को दे रखे हैं। मुश्किल सिर्फ इस बात की है कि सामने वाला उन भावनाओं को कितना समझ पाता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप उस भावना को पढ़ पा रहे हैं या नहीं पढ़ पा रहे हैं। इससे भी अधिक अहम होता है कि आप पढ़ना चाहते हैं या नहीं। साथ ही महत्वपूर्ण है कि सामने वाले से आप किस बंधन में बंधे हैं। अगर आप प्यार के बंधन में बंधे हैं और वो भी बचपन से, तब आप सामने वाले की बहुत सारी बातों को बिना कहे ही समझ जाते हैं। ...ऐसा क्यों होता है जब माँ अपने बच्चे की अधिकांश बातें, बिना कुछ कहे ही समझ लेती हैं? ऐसा क्यों होता है कि बाप अपने बच्चे को आसानी से पढ़ लेता है? बच्चे भी जाने-अनजाने अपने माँ-बाप को जानने लगते हैं। ऐसा क्यों होता है कि भाई अपनी बहन को, तो बहन अपने भाई को बहुत अच्छी तरह से पहचानती है? ...शायद उनके बीच में प्यार का बंधन होता है।
इसी समाज में ऐसा भी होता है... एक इंसान जो आपको बहुत प्यारा लगता है, ज़रूरी नहीं दूसरे को भी प्यारा लगे।
सुप्रिया बचपन से ही न बोल पाती थी, न चल पाती थी, हाथ भी पूरी तरह से काम नहीं करते थे। ज़्यादा तो चैकअप नहीं कराया था पर सरकारी अस्पताल के डाक्टर ने बताया था कि पोलियो की वज़ह से है, ठीक नहीं हो सकता। किसी और डाक्टर ने सेरीब्रेल पेल्सी बीमारी का असर बताया था। उसका शरीर उसके उम्र के हिसाब से विकसित नहीं हो रहा था। हाथ-पैर में जान नहीं थी। परन्तु मन-मस्तिष्क उसकी उम्र के साथ-साथ धीरे-धीरे विकसित हो रहे थे। मालती और मास्टरजी के पास सीमित साधन थे। यही कारण था जो चुपचाप भगवान का दिया समझकर स्वीकार कर लिया था।
बचपन से ही अमित ने माँ की आँखों में कभी भी नहीं देखा था कि वह इस बात से परेशान हैं। चिंतित ज़रूर रहती थीं। सोचती रहती थीं पता नहीं क्या होगा। माँ का दिल जो ठहरा। माँ के मन में बेटी के प्रति असीम प्यार था। उधर, सुप्रिया को कभी भी यह एहसास नहीं हुआ कि वह पूर्णतः आश्रित है।
बचपन से ही सभी उसकी बातों को, उसकी भावनाओं को बहुत अच्छी तरह समझ जाते थे। अमित का स्कूल से आना और सबसे पहले उससे मिलना। परीक्षा वाली रात में पूरी-पूरी रात सुप्रिया का साथ जागना। बाहर के कमरे में बिस्तर पर लेटे-लेटे, सारा दिन सभी का इंतज़ार करती रहती। आते-जाते हर आहट पर उसकी आँखों में चमक देखते बनती थी। घर आने के बाद सब उसके आसपास बैठ जाया करते थे। सुप्रिया कह तो नहीं पाती थी, पर सब लोग उसके कुछ कहे बिना ही समझ जाते थे। वह हर बात को बड़े ध्यान से सुनती थी और अपने ही अंदाज़ में बिना कुछ कहे हुए आँखों से ही सब कुछ कह जाती थी। अमित ने कभी भी उसकी आँखों को जीवन से निराश होते नहीं देखा था। यहाँ तक कि बचपन में पिता के देहांत के वक्त भी वह दुःखी तो हुई थी मगर विचलित नहीं हुई थी।
अपनी माँ का उसने हर मुसीबत में साथ दिया था। उसकी मुश्किलें ज़रूर बढ़ गई थीं। पहले तो आवाज़ लगाई और माँ हाजिर। परंतु अब उनको स्कूल जाना होता था। वैसे तो सब कुछ करवा कर जाया करती थीं परंतु हर बार शरीर साथ नहीं देता था। वैसे गीता, सुनीता आँटी और कभी-कभी कमला चाची भी आवाज़ लगाने पर, या यूँ ही बीच-बीच में देख जाती थी। पर जब सारी शक्ति खत्म हो जाती तो बिस्तर गंदा हो जाता था। कई बार उसी अवस्था में वह घंटों लेटी रहती थी। जब माँ पहुँचती तो सुप्रिया की आँखों में एक अजीब-सी शरम होती थी। मालती सब काम छोड़कर सबसे पहले उसकी सफ़ाई करती, कपड़े बदलती, हाँ, कई बार बीच में मुस्कुराते हुए उसे बच्चों की तरह दुलार करती।
''मेरा छोटा-सा बच्चा। फिर गंदा कर दिया, कोई बात नहीं।''
इन शब्दों में भी प्यार बेशुमार होता, भावना प्रधान होती। और फिर सुप्रिया भी मुस्कुरा देती। कभी-कभी अमित अगर पहले आ जाता तो वह भी सहयोग कर देता और सुप्रिया भाई पर अपना हक़ समझती।
शाम को स्कूल से आने के बाद माँ और अमित के लिए सबसे पहले सुप्रिया के पास बैठना ज़रूरी होता था। यह सुप्रिया का अधिकार क्षेत्र था। वैसे भी वह सारा दिन इंतज़ार करती और जैसे ही दोनों आ जाते उसके चेहरे पर खुशी देखते ही बनती थी। सारी रामायण, दिनभर की उसको बताई जाती। इस तरह से कब दिन बीत गए पता ही नहीं चला। अमित के मेडिकल कालेज में एडमिशन की सबसे ज़्यादा खुशी उसी को थी। उसे बचपन से उम्मीद थी कि अमित बड़ा होकर डाक्टर बनेगा और सबसे पहले उसी को ठीक करेगा। स्वप्न तो स्वप्न है, उसे देखना कोई ग़लत बात तो नहीं।
धीरे-धीरे कालेज में पढ़ाई बढ़ने लगी तो अमित को वापस आने में देरी होने लगी
थी। एक तो कालेज दूर पड़ता दूसरे लाइब्रेरी में पढ़ाई करने के लिए रुकना पड़ता फिर भी जब तक वह वापस नहीं आ जाता सुप्रिया की आँखों में नींद न आती, माँ तो कई बार झपकी ले भी लेती थी। अमित इस बात को जानता था तभी तो जब भी पूरी रात पढ़ना हो तो सुप्रिया के पास ही बैठकर पड़ता। कई बार तो सारी-सारी रात वो उसके साथ जागती थी। उधर, अदिति जब तक मोहल्ले में रही सुप्रिया से तक़रीबन रोज़ मिलती थी। और दोनों अच्छे दोस्त बन चुके थे।
प्रकृति भी पक्की नियम वाली है। किसी को भी नहीं बख़्शती। मगर यह कैसा इंसाफ़ है, सभी उसकी निगाह में एक समान है। प्रकृति यह भी नहीं देखती कि आपकी क्या मजबूरी है। उसे तो अपना काम करना ही है। मासिक अवस्था में पहले तो सुप्रिया को बड़ा अजीब-सा महसूस होता था। भाई से शरम भी आती थी परंतु अदिति कई बार माँ की अनुपस्थिति में उसको सहयोग कर देती थी।
हर नई कक्षा में अमित ज़्यादा व्यस्त होता चला गया। कालेज फिर इंस्टिच्यूट। मगर जब भी घर आता सबसे पहले सुप्रिया से ही मिलता। इंटरशिप में कई बार हफ्ता-हफ्ता भी नहीं आ पाता था। अस्पताल में भी सुप्रिया उसे याद आती थी। फिर निकिता के प्रेम ने उसे और अधिक व्यस्त कर दिया था। उन दस दिनों में वह एक बार भी घर नहीं आ पाया था। जब आया भी तो कुछ थका-थका और परेशान-सा ही रहता था। उसने पहली बार सुप्रिया से कुछ छुपाया था। निकिता उस दिन देर रात जब पहली बार घर आई थी तो सुप्रिया बड़ी प्रसन्न हुई थी। वैसे भी नये मेहमान के साथ वह ज़्यादा आत्मीयता से पेश आती थी। बिना आवाज़ के सिर्फ मुस्कुराती और उम्मीद करती कि नवागंतुक भी सबसे पहले उसी से मिले। पर निकिता ने बहुत ज़्यादा बात नहीं की थी। परंतु सुप्रिया के आँखों से लग रहा था कि वह उसकी खूबसूरती से आकर्षित है। उसकी आँखों की चंचलता ने बहुत कुछ कहने की कोशिश की थी। अमित ने ही उसे चुप कराया था।
राधिका और श्याम के वापस आ जाने से निकिता और अमित को मिलने में कठिनाई होने लगी थी। वैसे तो शाम को कॉलोनी के मंदिर ज़रूर जाते, कॉफी हाउस में सुबह का नाश्ता साथ ही करते। परंतु प्यार करने के लिए जगह नहीं मिल पाती। निकिता ने फाइनल प्रौफ पास कर लिया था और उसकी इंटरशिप भी शुरू हो गई थी। उसकी भी हॉस्पिटल में ड्‌यूटी लगने लगी थी। दोनों अधिकतर साथ ही ड्‌यूटी लगवा लेते थे। अमित ने इंटर्शिप में ही, प्रीपीजी की तैयारियाँ शुरू कर दी थी। श्याम और राधिका भी जमकर पढ़ रहे थे। अदिति का अपना अलग ही एजेंडा था। विदेश जाकर मास्टर्स करना था। उसकी आगे बढ़ने की भूख बरकरार थी। सेठ जी का देहांत हो चुका था। अदिति के साथ सुनीता भी साथ जाने को तैयार थी। पैसे सेठ जी काफी छोड़ गए थे। बस मेहनत और बाहर के प्रोफेसरों से जान-पहचान और संबंध निकालने थे। कालेज के वरिष्ठ प्रोफेसरों से परामर्श ले रही थी। अत्यंत व्यस्त थी। तक़रीबन सभी वरिष्ठ प्रोफेसरों ने अमित से भी भविष्य के बारे में पूछा तो अमित ने बड़े स्वाभाविक ढंग से बिना किसी हिचकिचाहट के कहा था,
''सर मैं यहीं रहूँगा, भारत में और वह भी जबलपुर में। सर एक तो पैसे नहीं है दूसरे अगर स्कॉलरशिप मिल भी जाये तो यहाँ अकेली माँ, बीमार बहन को छोड़कर जाना संभव नहीं। फिर बाहर जाकर जो पढ़ाई होती है वह यहाँ पर भी होती है तो फिर मैं अपने घर को क्यूँ छोड़ूँ। वैसे भी इंसान सब कुछ किसके लिए करता है? अपनों के लिए। जब अपने ही साथ न हो तो फिर क्या फ़ायदा।''
डीन बड़े आश्चर्यचकित हुए थे। बहुत होनहार था अमित। कई जगह उसे एडमिशन मिल सकता था परंतु अपने घर के लिए इतनी मोहब्बत, अब कम ही देखने को मिलती है।
...एक दिन अमित की केज़ुअल्टी वार्ड में ड्‌यूटी थी और निकिता की जनरल लेबर वार्ड में। देर शाम वो अमित के पास वार्ड में आयी तो कुछ-कुछ परेशान-सी थी,
''अमित ज़रूरी बात करनी है तुमसे, अभी कॉफी हाउस चलो।'' बीच में उभरी हल्की-सी मुस्कुराहट ने अमित को संशय में डाला था।
''क्या हुआ?''
''चलो तो सही, वहीं बताती हूँ।'' हाथ पकड़कर खींचते हुए ले गई थी। कॉफी हाउस में पहुँचकर उसने तुरंत अमित का हाथ अपने हाथ में लिया और आँखों में आँखें डालकर बड़ी आशाभरी निगाहों से कहा था,
''मेरा साथ, तुम तो नहीं छोड़ोगे?''
''नहीं, नहीं, मगर बात क्या है?''
''हमें जल्दी शादी करनी होगी, मैं फैमिली-वे में हूँ।'' कहकर निकिता ने शरम से आँखें नीची कर ली थी।
''क्या?'' अमित को एकदम से अनापेक्षित खुशी हुई थी, मगर जिस ढंग से वो तेज़ी से आई उसी तेज़ी से बहुत सारे सवालों ने भी घेर लिया था। उसे अपने घर में कोई परेशानी नहीं दिखती थी। परंतु निकिता के घर वाले, ...क्या वे मानेंगे?
''तुमने अपने घर वालों से बात की है?''
''यही सब तो बात करनी है तुमसे, ...कैसे करना है?''
''मेरी परिस्थितियां देखकर अगर वो लोग नहीं माने तो?''
''तो तुम क्या इस हालात में मुझे छोड़ दोगे? वही तो देखना है कि कैसे किया जाए। ...कैसे भी हो उन्हें मनाना होगा।''
''मेरे घर-परिवार को देखते और जानते हुए अगर तुम मुझे समझती हो तो मुझे कोई परेशानी नहीं।'' अमित थोड़ा-सा अपनी बात खुलकर कहना चाह रहा था।
''हाँ हाँ।''
कहकर निकिता ने तो बात खत्म कर दी थी और खुशी की चमक उसके चेहरे पर साफ़-साफ़ झलक रही थी मगर अमित अचानक ढेरों जवाबदारियों से घिर गया था।
अमित उस रात सो न सका, सारी रात सोचता रहा। किसी भी प्रश्न का जवाब न मिलने पर करवट बदल लेता... क्या यह सब ठीक है? ...परंतु अब उसे यह सोचने का क्या हक़। ...क्या निकिता, घर में माँ और सुप्रिया के साथ रह लेगी? ...पर ये सवाल तो उसे अपने आप से पहले पूछने थे। ...पहले कब पूछता, वक्त ही नहीं मिला। सब कुछ अचानक हुआ था। हालात ऐसे थे कि पूछ ही नहीं पाया। फिर कोई प्यार करने से पहले यह तो नहीं कहता कि पहले बताओ, तुम्हें मंजूर हो तो मैं प्यार करूँ। प्रेम कोई सीमाएं नहीं देखता। ...नहीं-नहीं, निकिता अच्छी लड़की है। सभी से प्यार करेगी। फिर माँ और सुप्रिया इतने सीधे हैं कि उन्हें कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। निकिता जैसी सुंदर बहू और ऊपर से डाक्टर, और क्या चाहिए। ...मगर क्या निकिता के माता-पिता मानेंगे? थोड़े गुस्सैल लगते हैं। क्या अपनी बेटी के प्यार के विरुद्ध जा सकते हैं? फिर ऐसी हालात में! क्यूँ एबार्शन भी तो करा सकते हैं? क्या निकिता ऐसा होने देगी? ...नहीं-नहीं।
अमित के दिल और दिमाग़ ने बारी-बारी से सवाल पूछे और खुद ही उसके जवाब दिए थे। मगर कई सवालों के जवाब नहीं हुआ करते। कुछ बातें तो भविष्य के गर्भ में छुपी होती हैं, अन्यथा इंसान भगवान न बन जाये। बेचैन नज़रों से उसने सामने की दीवार पर देखा वो सफेद व सपाट थीं और अचानक उस पर खुद का प्रतिबिंब उभरा था। सुबह की किरण घर में प्रवेश कर रही थी... वो खुद भी तो अब डाक्टर बन जाएगा। पैसे भी धीरे-धीरे आ ही जायेंगे। आज नहीं है तो क्या हुआ, कल तो उसका अपना है... जहाँ तक रही बात निकिता की कि उसको सब कुछ तुरंत चाहिए तो उसके लिए वो उससे बात कर लेगा। समझदार है, मान जाएगी। पर इसके पहले उसे माँ और सुप्रिया से बात करनी चाहिए।
सुबह-सुबह सुप्रिया के पास बैठकर, उसने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरा था। सुप्रिया की आँखों में चमक उभर आई थी बहुत दिनों बाद अमित यूँ उसके पास आज बैठा था। पिछले कुछ दिनों से भाई की उदासी उसे बेचैन कर रही थी, हाथ-पाँव से वो अपाहिज ही सही, दिल और दिमाग़ तो स्वस्थ थे। और वो भाई को लेकर अंदर ही अंदर रो लेती। ऐसी क्या बात है जो वो आजकल गुमसुम रहता है... कभी पूछेगी मगर आज नहीं और उसने हल्की-सी मुस्कुराहट चेहरे पर बिखेरी थी। अमित ने एक बार फिर सुप्रिया के चेहरे पर प्यार से हाथ फेरा था और माँ को आवाज़ लगाई थी। मालती रसोई से बाहर निकली तो भाई-बहन को बहुत दिनों बाद एकसाथ बैठा देख खुश हुई थी, मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद करने लगी कि अमित के इन शब्दों ने उसे चौंकाया था,
''माँ निकिता तुझे पसंद है?''
''क्यूँ क्या बात है?''
''माँ हम शादी करना चाहते हैं।''
मालती को अपने कान पर यकीन नहीं हो पा रहा था। बेटे के चेहरे को ग़ौर से देखा वहाँ कई सारी भावनाएं उभरने को आतुर थीं। और फिर शब्दों पर जैसे ही यकीन हुआ उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। निकिता को उसने उस रात देखा था। बहुत सुंदर है। उसी दिन समझ गई थी कुछ चक्कर है। मगर जान-बूझकर बड़प्पन दिखाते हुए, चुप ही रहकर मंद-मंद मुस्कुरा गई थी। उधर, सुप्रिया सुनकर उछल-सी पड़ी थी, ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर अपनी खुशी व्यक्त करने लगी। और फिर अगले ही पल उसने भाई को तिरछी निगाहों से देखा था... आँखें कह रही थीं भाभी बहुत सुंदर है। मुझे पसंद है। ...अमित ने बहन की चंचल पुतलियों को पढ़ा और समझते हुए सुप्रिया को उठाकर अपने सीने से लगा लिया था। ईश्वर का दिल आज भी नहीं पिघला था सुप्रिया के हाथ भाई को गले लगाने के लिए इस बार भी उठ नहीं पाए थे।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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