|
बन्धन : खण्ड 4 / अध्याय 30 |
|
उपन्यास
|
|
शुक्रवार , , 04 अप्रेल |
| |
 |
मनोज सिंह
|
|
अमित ने धीरे से निकिता के गर्भवती होने के बारे में भी माँ को बता दिया था। मालती को पहली बार में तो अटपटा लगा मगर फिर... अब दोनों पढ़े लिखे हैं, शादी कर रहे हैं, तो उसमें बुरा ही क्या है। ...और फिर स्वयं के उत्तर से संतुष्ट होकर मन ही मन खुश हुई थी। रसोई के छोटे से आले में विराजमान भगवान को उसने सिर झुकाकर प्रणाम किया और फिर बेटे के सिर पर प्यार से हाथ फेरा था। वह उसके साथ थी। अमित ने खुशी-खुशी कालेज जाकर सारी बात निकिता को बताई और बड़ी गर्मजोशी से हॉस्टल के बाहर ही उसका हाथ पकड़ लिया था। निकिता सिर्फ मुस्कुरा रही थी।
जो चीज़ आसानी से हो जाए या मिल जाए उसका महत्व कम होता है। चाहे वह फिर कितनी भी कीमती हो। मगर जो मुश्किल से मिले, फिर चाहे कितनी भी सस्ती हो, उसका मूल्य बढ़ जाता है। निकिता के लिए अमित की माँ का मानना कोई मायने नहीं रखता था। उधर, अमित के चेहरे पर खुशी और उत्साह का मिश्रण आँखों से टपक रहा था,
''माँ ने तुम्हें घर बुलाया है।''
''ठीक है।''
''अच्छा अब हमें श्याम, राधिका और अदिति से भी बात कर लेनी चाहिए।''
अमित ने बड़े अपनेपन से यह बात कही थी। उसके मतानुसार पत्नी सबसे नज़दीक होती है। पति-पत्नी को सारी बातें आपस में मिलजुल कर, सलाह करके ही करनी चाहिए। मगर निकिता के चेहरे से मुस्कुराहट अचानक गायब हो चुकी थी और उसने बड़े ठंडे ढंग से कहा था,
''ठीक है।''
''तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है क्या?'' अमित ने निकिता के चेहरे पर उभरी उदासी को पढ़ा तो चिंतित हुआ था। मगर उसकी बात का निकिता ने कोई जवाब नहीं दिया था।
अमित ने देखा कि जिस उमंग से निकिता ने कल अपने गर्भवती होने की बात बताई थी उतना उत्साह आज नहीं था। सोचने लगा... गर्भ के दौरान लड़कियों के साथ ऐसा अक्सर होता है। वैसे भी लड़कियाँ शादी के नाम से अक्सर गुमसुम हो जाती हैं। हो सकता है माँ-बाप से डर रही हो। और उसने प्रेमपूर्वक निकिता के कंधे पर हाथ रखकर फिर गालों को प्रेमपूर्वक स्पर्श दिया था यह उसके विश्वास का एक सफल प्रदर्शन था।
''तुम तैयार होकर कॉफी हाउस पहुँचो मैं तब तक श्याम और राधिका को लेकर आता हूँ।''
श्याम और राधिका एक ही वार्ड में मिल गये थे। पक्के दोस्त थे, सुनकर बेहद खुश हुए। श्याम ने तो उसे झट गले लगा लिया था। और फिर पीठ पर प्यार से मारते हुए कहने लगा,
''तू तो यार असल में हीरो निकला। ज़ुबान और उसूल का पक्का।''
राधिका को अपनी सहेली से प्यार था, इतने सालों का साथ, ...और उसकी आँखों में खुशी के आँसू उभर आए थे। सिर्फ मुस्कुराकर उसने बधाई दी थी। उधर, अदिति से अमित की बात करने की हिम्मत ही नहीं हुई थी। कहाँ से शुरू करें? कुछ दिनों में ही वह उससे बहुत दूर हो चुका था। वह दूर रहने भी लगी थी। निकिता से संबंधित उसने बहुत-सी बातें छुपा ली थीं। लेकिन अब भी उसमें अदिति के प्रति अपनापन था। बचपन की दोस्ती थी। मगर उससे थोड़ा शरमाता और डरता था। राधिका से उसे कहने के लिए कहने लगा। पहले तो राधिका को अजीब लगा पर फिर वह मान गई थी। राधिका ने अदिति को वार्ड में जाकर सब कुछ बताया। अदिति तो यकीन ही नहीं कर पा रही थी। कहने लगी,
''यह बात तो ठीक है कि अमित को प्यार है निकिता से, पर क्या निकिता भी उससे उतना ही प्यार करती है?'' अदिति बहुत परिपक्व थी।
''हाँ, हाँ क्यूँ नहीं।'' राधिका ने भोलेपन से कहा था।
''तो फिर बढिय़ा है, कहाँ है दूल्हे राजा! चलो मिलते हैं।''
दोनों काफी हाउस की ओर बढ़ गये थे। अमित से अदिति बड़ी गर्मजोशी से मिली थी,
''तो जनाब इसलिये कुछ दिनों से गायब हैं और बात नहीं करते।''
अमित सिर्फ मुस्कुराता रहा था। ''और दुल्हन कहाँ है?'' अदिति ने मज़ाक में पूछा था।
''आ रही है, हॉस्टल में है।''
''तो जनाब को सब पता है।'' अदिति मज़ाक के मूड में थी और सुनकर सब हंस पड़े थे। थोड़ी देर में निकिता वहाँ पहुँची तो अदिति और राधिका ने उसे गले लगा लिया था। राधिका तो मारे खुशी के रोने लगी थी। उधर, निकिता सिर्फ मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी।
''ऐसे नहीं। वी वांट टू सी ओरिज़िनल निकिता।''
श्याम ने छेड़ते हुए कहा था।
''शायद माँ-बाप को लेकर परेशान है। फिर तबीयत भी शायद ठीक नहीं।'' राधिका ने सफ़ाई दी थी।
''अरे यार, इसमें परेशानी क्या है। अमित टॉपर है, डाक्टर है, एकलौता है, सुंदर, स्मार्ट है कोई ऐब नहीं और क्या चाहिए किसी भी लड़की के माँ-बाप को।''
अदिति ने फिर परिपक्वता के साथ अमित का पक्ष रखा था।
''ठीक बात है निकिता। तुम्हें अब मम्मी-पापा से बात करनी चाहिए और हमें जल्दी शादी की तारीख़ तय करनी पड़ेगी। बहुत काम करने पड़ेंगे, वक्त कम है।''
श्याम ने दोस्ती का फ़र्ज़ अदा करते हुए कमान सँभाली थी। वह आज बहुत खुश था। कालेज में पहले दिन से उनकी दोस्ती थी, सीधी सरल और सच्ची। तभी निकिता एकदम से हँस पड़ी और ज़ोर-ज़ोर से अपनी खुशी व्यक्त करने लगी। लगा कि मानो शून्य से अचानक निकली हो, कुछ पल के लिए सभी भौचक्के हुए थे और फिर धीरे-धीरे उसकी खुशी में शामिल होने लगे। श्याम को अजीब लगा था मगर फिर यह सोचने लगा था कि... शायद अब तक माँ-बाप से परेशान थी और डर रही थी, अदिति की बातों से अब उसमें हिम्मत आई है। ...श्याम निकिता को दिल्ली बात कराने के लिए पास के एसटीडी बूथ ले जाने लगा तो सभी पीछे-पीछे साथ चल पड़े थे। दोस्ती में साथ देने का फ़र्ज़ जो था। निकिता ने फटाफट फ़ोन मिलाया और कहने लगी थी,
''माँ मैंने शादी का फैसला किया है।'' दूसरी तरफ़ से कुछ पूछा गया था।
''नहीं नहीं वो नहीं। जो मेरे साथ पिछली बार घर आया था, अमित। ...माँ, पापा और भैया को आप बता देना। मुझे जल्दी है। आप लोग जल्दी यहाँ आ जाओ।'' कुछ देर वहाँ की बातें सुनने के बाद, पुनः बोलने लगी,
''...माँ मैं अब नहीं रुक सकती। बात ही कुछ ऐसी है। माँ जल्दी उनको नहीं, जल्दी मुझे है। ...आप समझ क्यूँ नहीं रहीं?'' निकिता लगातार बातों का जवाब दे रही थी,
''...हाँ सिर्फ माँ है उन्हीं के साथ रहते हैं।''
''...वो कोई बात नहीं। बढ़िया हैं, सीधे सरल और अच्छे हैं, मेरा ध्यान रखते हैं, पढ़ाई में होशियार हैं। आपको मैं डेट बता दूँगी। बस आप आ जाना।''
अमित चुपचाप सुन रहा था। निकिता जितना पहले चुप थी उतनी ही अब बहुत ज़्यादा खुश और ज़ोर-ज़ोर से बोल रही थी। उसकी बात खत्म होने पर श्याम ने कहा,
''अच्छा भाई शाम को हम सभी अमित के घर चल रहे हैं। अभी वार्ड में जाकर ड्यूटी भी एडजस्ट करनी होगी, फिर मुझे दिन में वकील से बात करके मैरिज की डेट भी लेनी है। तुम तीनों अमित के घर जाओ। शाम की तैयारी करो। हम दोनों आते हैं।'' श्याम ने अमित को फटाफट चलने को कहा था। अदिति, राधिका और निकिता को लेकर पहले अपने घर गई थी और माँ को सब कुछ खुशी-खुशी बताया था। सुनकर सुनीता को एक मिनट के लिए विश्वास ही नहीं हुआ था। चेहरे पर मन के भाव दस्तक देने लगे थे... दोनों सहेलियों की शादी हो रही है और उसकी बेटी? ...और फिर न चाहते हुए भी दिल की बात ज़ुबान पर आ ही गई,
''इसको भी समझाओ...'' अदिति ने माँ की ओर भरपूर निगाहों से देखा और फिर बीच में ही टोक पड़ी,
''मुझे तो आगे पढ़ना है, अभी तो बहुत कुछ करना है। ...अभी से बच्चा पैदा करने और रोटी के चक्कर में मुझे नहीं पड़ना।''
निकिता इस बात को सुनते ही रूठ गई थी, अचानक ज़ोर-ज़ोर से रोने लग पड़ी। अदिति और राधिका समझ नहीं पाये थे। बात बड़ी साधारण-सी थी। राधिका के मनाने पर भी जब वह चुप नहीं हुई तो अदिति को लगा कि शायद उसने ग़लत कह दिया है सो उसने फटाकट सॉरी भी कहा था। मगर निकिता लगातार रोती रही थी। अंत में घबराकर राधिका ने श्याम के फ्लैट पर फ़ोन किया तो श्याम और अमित घर पर ही थे। और उसने तुरंत अमित को बुलाया था। अमित ने तुरंत पहुँचकर निकिता को मनाने की बहुत कोशिश की और फिर हारकर कमरे में अंदर ले जाकर चुप कराता रहा। अदिति को बहुत आत्मग्लानि हुई थी। सोचती रही, पता नहीं अमित क्या सोचेगा। बहुत देर बाद जब निकिता शांत हुई तो उसको चैन आया था। सभी को बेचैन और कसा हुआ देख सुनीता ने माहौल हल्का किया था,
''चलो बच्चों, मैं तुम लोगों के लिए कुछ मीठा बनाकर लाती हूँ। तुम लोग यहाँ पर तब तक मस्ती करो।'' सुनीता आँटी आज भी आकर्षक थीं।
शाम को सारे अमित के घर में इकट्ठा हुए थे। अमित के घर पर पहला ऐसा मौका था। मालती ने अपनी शादी का हार निकाला था। कई तरह के विचार उसके मन में आ जा रहे थे... होने वाली बहू पहली बार घर आ रही है ...वैसे तो शादी के बाद आती है। ...मगर पहली बार आने पर ही मुँह दिखाई देनी होती है। ...पर इस तरह की शादी में अब पहले ही आ जाती है तो क्या करें, देना तो पहली बार में ही पड़ता है। मालती ने अंत में दिल की बात सुनी थी। और निकिता के घर पहुँचते ही सकुचाते हुए सबसे पहले बहू को हार पहनाया था। साथ ही कहने लगी,
''हमारे यहाँ पर बहू जब पहली बार घर आती है तो उसे मुँह दिखाई दी जाती हैं। अब तुम इस तरह से पहली बार आयी हो, सो हार पहनाए देती हूँ। ...सस्ता है बेटा, पता नहीं तुम्हें पसंद आयेगा या नहीं।''
''पसंद तो अमित है आँटी। हार तो आपकी निशानी है। निशानी पैसे से नहीं, पहचान से होती है। इसकी कीमत नहीं लगाई जाती। ...क्यूँ निकिता?'' अदिति बोल रही थी।
''और क्या आँटी, ये देखो मेरा हार, कितना मोटा और पुराने स्टाइल का है। जब मैं श्याम के घर पहली बार गई थी तो मम्मी जी ने मुझे पहनाया था। मैं तो इसे उतारती ही नहीं। चाहे टूट जाये, पर उतरेगा नहीं। फिर आँटी ओल्ड इज़ गोल्ड और सारी पुरानी चीज़ें फैशन में लौटकर आती हैं। दिल्ली और बड़े शहरों में तो पुरानी चीज़ों की कीमत और ज़्यादा होती है।''
राधिका ने बड़े भोलेपन से कहा था। श्याम सुनकर हँस रहा था।
''अच्छा चलो बेटा, सासू माँ के पैर छूकर आशीर्वाद लो।''
सुनीता आँटी ने फरमान जारी किया था। निकिता ने वैसे ही किया था। पीछे से सुप्रिया ने आवाज़ लगाई तो सभी मुड़कर उसकी ओर देखने लगे थे। सुप्रिया भी बड़ी खुश लग रही थी। उसकी भोली आँखों ने बड़ी हसरत से निकिता को देखा था। अदिति ने निकिता का हाथ-पकड़ा और उसके पास ले गई थी,
''यह अमित की दोस्त, गाइड, बहन, हैड सब है।'' अदिति की आँखों में शरारत व बातों में मज़ाक था सुनकर सुप्रिया हँस रही थी। मगर निकिता ने कोई बात नहीं की थी, सिर्फ मुस्कुराती रही। बाद में राधिका ने सुनीता और मालती आँटी का रसोई में हाथ बंटाया तो अदिति सुप्रिया से बात करती रही। निकिता पास ही कुर्सी पर शांत बैठी थी। बीच-बीच में सुप्रिया उसे जी भर के देख लेती थी। अमित और श्याम बाहर कुर्सियों पर आगे के बारे में प्लान बनाने लगे थे। खाना खाने के बाद निकिता की इच्छा अमित के साथ घर पर रुकने की थी। लेकिन माँ ने समझाया था,
''बेटा शादी के बाद। वैसे तो कोई बात नहीं, फिर भी समाज में रहना है तो... और फिर मज़ा भी उसी में है।''
हाँ, उसने अमित से, निकिता को हॉस्टल छोड़कर आने के लिए ज़रूर कहा था। देर रात सभी खुशी-खुशी विदा हुए थे। जाते-जाते सुनीता मालती से गले मिली तो दोनों के आँखों में आँसू थे, पर कारण भिन्न-भिन्न थे।
सुप्रिया बहुत खुश थी। निकिता उसे पसंद थी। मगर एक बात उसे ज़रूर सता रही थी। भाभी उससे गले जो नहीं मिली थी। माँ उसे अपनी खुशियाँ बाँटते हुए, बातें सुना रही थी। निकिता की बड़ाई हो रही थी। लेकिन सुप्रिया का ध्यान इस ओर नहीं था वह तो आज अपने ही ख़यालों में गुम थी... भाभी ने उससे ज़्यादा बात नहीं की थी ...शायद शरमा रही हो या हो सकता है अभी सबके सामने बात नहीं कर पा रही हो या हो सकता है कम बोलती हो, ...तरह-तरह के विचार आ रहे थे। साथ ही एक चिंता की लकीर जाने-अनजाने ही उसके चेहरे पर उभर रही थी। जिसे आज माँ ने नहीं देखा था वह तो अपनी ही धुन में लगी थी। ...और आज अचानक सुप्रिया अकेली हो गई थी। उसने अपने आप को समझाया भी था कि उसे सिर्फ अपने बारे में नहीं सोचना चाहिए, परिवार में एक नया सदस्य आ रहा है। और फिर जल्दी ही... एक नन्हा मेहमान भी आएगा। ...अंत में यह विचार आते ही सुप्रिया मुस्कुरा दी थी।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
|
|
|
|