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बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 32
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 3
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
मंगलवार , , 08 अप्रेल
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



सुप्रिया शारीरिक रूप से विकसित हो या न हो, मानसिक रूप से परिपक्व थी। प्रकृति का नियम है कहीं न कहीं संतुलन ज़रूर करती है। उसके सुनने और समझने की शक्ति बहुत ज़्यादा थी। वह समझ गई थी कि भाभी को शायद वह पसंद नहीं। उसे अब एहसास होने लगा था कि वह ज़िंदगी में किसी के ऊपर बोझ है। उधर, अभी शादी हुए कुछ ही दिन बीते थे कि अमित ने बहन की आँखों में नीरसता एवं ठहराव देखा था।
सुप्रिया को ज़िंदगी से गिला होने लगा था। उसके दायरे सिमटने लगे थे। कमज़ोर इंसान जब कुछ कर नहीं पाता तो अपने क्रोध को झल्लाहट में परिवर्तित कर देता है, और सामने वाले से ज़्यादा अपने आपको कष्ट देता है। वहीं दूसरी ओर, शक्तिशाली आदमी क्रोध में समाने वाले को नुक़सान पहुँचाता है। माँ की भोली आँखें सुप्रिया में हुए इस बदलाव को नहीं पढ़ पाई थी।
सुप्रिया, अपने आपसे कहीं ज़्यादा अपनी माँ को समझती थी। अब तो वह पूर्ण रूप से उस पर ही आश्रित थी। पहले तो भाई उसका सुख-दुःख बाँट लेता और रोज़मर्रा के काम में उसको सहयोग भी करता, पर शादी के बाद सब कुछ बिल्कुल बंद था। शाम को घर आने पर सुप्रिया से पहले मिलने पर निकिता उससे बच्चों के जैसे लड़ती। सारा घर सिर पर उठा लेती। ऐसा लगता कि जैसे उस पर कोई बहुत बड़ा ज़ुल्म हो गया है। माँ अमित को जल्दी ही उसके पास भेज देती। निकिता उसके पहुँचने मात्र से बच्चों के जैसे एकदम से खुश हो जाती। माँ यही समझती थी कि बचपना है पति का प्यार चाहिए। इस उम्र में और इस हालात में आजकल ऐसा होता है। फिर बेटी को समझाती, उसे भरपूर प्यार करती। सुप्रिया जल्द ही समझ गई थी कि अमित पर अब उसका कोई हक़ नहीं। और उसकी आँखें भाई के इंतज़ार में ताकती रह जाती।
 अब उसका एकमात्र सहारा उसकी माँ थी। बंधन फूलों के समान हो सकता है, बंधन प्यार का भी हो सकता है तो बंधन जेल का भी हो सकता है। एक बंधन दिल से होता है उसे आप खुशी-खुशी स्वीकार करते हैं। एक बंधन जबरदस्ती होता है जिसे आप बहुत परेशान होकर, कष्ट के रूप में स्वीकार करते हैं। बस एक दृष्टिकोण है, मानसिक अवस्था, जिसके कारण बंधन की अवस्थाएं व परिभाषाएं बदल जाती हैं।
अमित और सुप्रिया के बीच में भाई-बहन का अटूट व गहरा संबंध था। अमित उसे बहुत ज़्यादा प्यार करता तो सुप्रिया उस पर बहुत ज़्यादा हक़ समझती थी। पहले, कालेज से आने के बाद वो उसके पास घंटों तक बैठता, सुप्रिया छोटी-छोटी बात पर उससे लड़ती। उसको देखकर मुस्कुराना, पास आने की कोशिश करना और उसका पास बैठकर घंटों पढ़ना सुप्रिया को अच्छा लगता था। अब वह सब खत्म था। अब वह सोचती ही रह जाती कि अमित उसके साथ कम से कम कुछ पल तो बिताये। कहाँ पहले घंटों बात करता और कहाँ अब सब कुछ खत्म। बस आते जाते हैलो-हाय। किसी भी परीक्षा से पहले अमित कई सवाल सुप्रिया से पूछता फिर खुद ही जवाब भी देता। कई बार ऐसा लगता था कि उसके साथ-साथ शायद वह भी पढ़ती जा रही है। किसी मुश्किल सवाल के जवाब मिलने पर दोनों अत्यंत खुश हुआ करते थे। परीक्षा के पहले साथ-साथ रात-रात भर जागते। ऐसा अक्सर लगता था कि दोनों में भाई-बहन के अलावा एक अच्छे दोस्त का भी संबंध हैं। यहाँ तक कि जब निकिता को सबसे पहले सुप्रिया ने देखा था, तो उसकी आँखों ने मुस्कुराकर पहले ही कह दिया था,
''भाभी बहुत सुंदर है और उसे पसंद है।''
शादी के पहले, भाभी और नये मेहमान को लेकर वह बहुत उत्सुक थी। परन्तु भाभी के आने के साथ ही उसे अपने ज़िंदगी में परेशानियों का बोध होने लगा था। फिर भी उसने अपनी तरफ़ से बहुत कोशिश की थी। बड़ी थी, इसलिए समझौतों को स्वीकार किया था।
शादी एक बंधन है। उसमें खुशियाँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि उस बंधन में हम सामने वाले की परेशानियों को, मुश्किलों को किस हद तक स्वीकार करते हैं, सुख-दुःख को हम किस तरह से बाँटते हैं। माँ को अपनी जवाबदारी का एहसास था। बेटी को तो देखती ही थी साथ ही बहू का भी पूरा ख़याल रखती और उससे ज़्यादा आने वाले मेहमान की चिंता करती। इसी कारण से सुप्रिया को थोड़ा कम समय दे पाती थी। उधर, अमित के लिए हॉस्पिटल, फिर कोचिंग क्लास, फिर घर पर पढ़ाई और फिर सारी रात निकिता। व़क्त कहाँ बच पाता सुप्रिया के लिए। निकिता का जब भी दिल नहीं लगता या उसके मन की बात नहीं होती तो वह श्याम और राधिका के फ्लैट पर चली जाती थी। बहाना बनाती कि वहाँ से उसे कालेज नज़दीक पड़ता है। हर बार माँ, प्यार से मना कर ले आती थी। धीरे-धीरे निकिता का बचपना बढ़ता जा रहा था। कभी-कभी ज़रा-ज़रा सी बात पर माँ से बुरी तरह लड़ जाती और शाम को ही उससे हँसकर बात करने लगती। पर पता नहीं क्यों, सुप्रिया से उसे प्यार या हमदर्दी नहीं थी। वह उसे तिरस्कृत भी नहीं करती पर उसकी ओर ज़्यादा देखती भी नहीं थी। अमित को यह समझने में देर नहीं लगी थी कि निकिता में भावनाओं की कमी है।
स्कूल कालेज की पढ़ाई और सामाजिक पढ़ाई में बहुत फ़र्क है। एक डाक्टर औरत अगर किसी को नहीं समझ सकती तो इसके लिए डाक्टर को दोष देना ठीक नही। हाँ, उस औरत को ज़रूर दोष दिया जा सकता है। क्योंकि एक अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी औरत भी किसी को प्यार दे सकती है। प्यार देने के लिए पढ़ाई की आवश्यकता नहीं होती। हम हमेशा प्यार चाहते हैं। प्यार देने में हम सदा कंजूसी करते हैं। जबकि प्यार का सीधा गणित है कि जितना आप देंगे, आपको देर-सवेर उससे कहीं अधिक मिलेगा। मुश्किल सिर्फ इस बात की है कि आप उस प्यार को पाने के समय का इंतज़ार नहीं कर पाते। सुप्रिया अपनी भाभी से प्यार तो बहुत करती मगर प्यार दिखाने के लिए उसके पास बहुत सीमित साधन थे, सिर्फ मुस्कुराना और आँखें। वहीं निकिता के पास सब कुछ था पर प्यार देने की इच्छा की कमी थी। अमित अंदर ही अंदर सुप्रिया के लिए परेशान रहता था पर उसने कभी ज़ाहिर नहीं किया था। शादी से पहले कई मुलाकातों में उसने कई बार निकिता के साथ सुप्रिया का ज़िक्र किया था। अपनी तरफ़ से उसकी मुश्किलों का वर्णन भी किया था। परंतु निकिता ने उसके बारे में न तो शादी के पूर्व कोई बात की थी न ही शादी के बाद ध्यान दिया। शुरू में उसका सुप्रिया के लिए मौन उसकी स्वीकृति को प्रदर्शित करता था। मगर वह ग़लत था। शादी के बाद धीरे-धीरे निकिता का व्यवहार अजीब होता चला गया था। वह अपनी दुनिया मे ही मस्त रहती। सुप्रिया का तो अस्तित्व ही उसके लिए नहीं था।
प्यार से निकिता को अमित ने कई बार समझाया, परन्तु वह मौन ही रहती थी। उसे इसकी उम्मीद नहीं थी। वह इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था। उसने तो यह उम्मीद की थी कि शायद वह सुप्रिया के अस्तित्व को स्वीकार करती है। परन्तु मौन सदैव स्वीकृति प्रदर्शित नहीं करता। निकिता के महीने जैसे-जैसे बढ़ते गये वह मोटी होती चली गई थी। सभी उसका पूरा ध्यान रखते थे। उसकी छोटी-छोटी बात का भी ख़याल रखा जाता।
सुप्रिया एकदम अकेली पड़ चुकी थी। जीने की कोई चाहत नहीं थी। कोई खुशी का जरिया नहीं था। जीवन में कुछ भी नहीं था। आँखें सभी को दिनभर दूर से देखती रहती, रातों में नींद का इंतज़ार रहता। उसे कोई पूछने वाला ही नहीं था। मोहल्ले के लोग आते, माँ से बात करते, निकिता का हालचाल पूछते और उसकी ओर सिर्फ मुस्कुराकर चले जाते। हर वक्त उसे अपनी भाभी के दो पल प्यार का इंतज़ार रहता था। उसने अपने सूखे चेहरे से प्यार पाने की इच्छा भी कई बार भाभी को दिखाई थी, पर कुछ हासिल नहीं हुआ। निराशा में धीरे-धीरे सुप्रिया ने खाना छोड़ दिया था। एक रात सुप्रिया ने बहुत दस्त कर दिये थे। साथ में खून भी था। देखकर माँ डर गई थी। तुरंत अमित को उठाने के लिए आवाज़ दी थी। अमित ने उठकर उसे देखा और फटाफट दवाई दी थी। घर पर वह उसकी सारी दवाइयाँ रखता था। लेकिन खून देखकर वह भी चिंतित था। सुबह तक वह उसके पास ही बैठा रहा था। सुप्रिया की आँखों में आँसू की जगह पूर्ण खामोशी और वीरानगी थी। बड़े मायूस होकर उसने कई महीनों के बाद अमित को अपने पास देखा था। निकिता बिस्तर से उठी नहीं थी। आख़िरी महीना चल रहा था इसलिए किसी ने उठाना ठीक भी नहीं समझा था। माँ वैसे भी उसे कभी कुछ नहीं कहती थी, पर अमित उससे थोड़ी अपेक्षा ज़रूर करता था। ऐसी हालात में भी उसे कम से कम बिस्तर से लेटे हुए ही पूछ तो लेना था। देर सुबह होने पर खुद उसने निकिता को सुप्रिया की तबीयत के बारे में सब कुछ बताया। परंतु उसने सिर्फ इतना ही कहा था,
''अच्छा! दवाई दे दी है तो ठीक हो जाना चाहिए।'' अमित अंदर तक हिल गया था। इतना रूखा बर्ताव शायद संभव नहीं। निकिता ने सुबह उठकर भी सिर्फ दूर से पूछताछ की थी। सुप्रिया के पास बैठना तो दूर, वह पास थोड़ी देर ही खड़ी रही थी और पूछने में एक अजीब-सा बेमन का रूखापन था। शाम तक सुप्रिया को तेज़ बुखार हो गया था। दस्त रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। मुँह से ओरल कुछ भी नहीं जा रहा था। माँ उसके पास ही बैठी रही थी। निकिता गुमसुम अपने बिस्तर पर ही रही। शून्य में ताकते भावविहीन-सी। अमित को जब कुछ नहीं सूझा तो एम्बुलेंस में हॉस्पिटल ले गया था।
अस्पताल में ग्लुकोज़ चढ़ाया गया था साथ स्टीरॉयड भी दिया गया था। मगर कोई असर नहीं था। ऐसा लग रहा था कि बस, अब बंधन से मुक्त होना चाहती है, परंतु कोई आख़िरी आस बाकी है। ...धीरे-धीरे कब दो दिन गुज़र गए डाक्टरों और नर्सों को होश ही नहीं था। सभी तरह के टैस्ट पर अंतिम परिणाम शून्य। विशेषज्ञ डाक्टर भी परेशान थे। ईश्वर की महिमा अपरम्पार है और सब उसी की ओर आशा बंधाए देखने लगे थे। निकिता घर पर ही थी। तीसरी सुबह उससे नहीं रहा गया, अमित की याद आई तो वह भी हॉस्पिटल पहुँच गई थी। हॉस्पिटल में निकिता के पहुँचते ही सुप्रिया ने जैसे ही भाभी को देखा उसकी आँखों में पानी और होंठों पर मुस्कान थी। होंठों के हिलाने और आँसू के निकलने की भी ताकत उसमें नहीं रह गई थी। हाँ, आख़िरी बार अपने नये बंधन को एक बार देखना ज़रूर चाहती थी, सो देख लिया और आँखें कब खुली की खुली रह गई किसी को पता ही नहीं चला। सुप्रिया तीनों बंधन, सभी आशाओं, कष्ट, हर एहसास से मुक्त हो गई थी। माँ का तो जैसे सब कुछ खत्म हो गया था। अमित सब कुछ भूलने-सा लगा था। निकिता एक बार फिर से भावशून्य थी। उसको छोड़कर सभी की आँखों में आँसू थे। श्याम और राधिका ने निकिता को संभाला था। अदिति भी आ गई थी। एकदम से इतना सब कुछ हो गया उसे यकीन ही नहीं हुआ था। निकिता लगातार हताश होकर पथरीली आँखों से सब को ताकती रही तो श्याम ने अमित को समझाया था,
''एक को खोया है, दूसरे को मत खो देना।''
वह जल्द ही निकिता के पास जाकर उसे अपने सीने से लगाकर तसल्ली देने लगा था। मगर अंत तक उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। वहीं हर एक की आँखें नम थीं। निकिता का निष्क्रिय भाव देखकर सभी चिंता करने लगे कि उसे कहीं मानसिक तनाव न हो जाये। राधिका उसे अपने घर ले गई थी। अमित ने सुप्रिया को अग्नि देकर उसके शरीर को भी सभी बंधनों से मुक्त कर दिया था। एक दिन में ही सारी स्थिति बदल गई थी। सुप्रिया जा चुकी थी और नया मेहमान घर आने के लिए दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था। देर रात अमित घर लौटा तो चारों ओर सन्नाटा था, एक बिस्तर जिस पर हमेशा कोई लेटा होता, आज खाली था। और अमित इसे देखकर अचानक फफक कर रो पड़ा था।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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