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बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 34
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 2
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
गुरुवार , , 10 अप्रेल
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



अमित बेहद खुश था। सुप्रिया के जाने का दुःख, बालिका के आगमन से विस्थापित हो रहा था। नामकरण हुआ तो आकांक्षा रखा गया। उसी की पसंद थी। घर पर खुशी का माहौल रहता था। अमित को एमडी की पढ़ाई करनी थी। रात-रात भर पढ़ना होता। निकिता कभी सोती रहती तो कभी सारी रात जागती रहती। आकांक्षा रात को रोती तो कभी माँ कभी अमित उसे गोदी में घुमाने लगते, मगर निकिता नहीं उठती थी। अमित ने कई बार महसूस किया था कि आकांक्षा बिस्तर पर लेटे-लेटे रोते रहती और निकिता किसी शून्य में ताकती रहती। कभी उदास-सी बैठी रहती तो कभी-कभी खूब ज़ोर-ज़ोर से बोलते हुए आकांक्षा के साथ खेलती रहती। अगर हँसती तो हँसती ही रहती और चुप होती तो दिनभर चुप रहती। अमित ने कई बार माँ से इसका ज़िक्र किया था। परंतु माँ के लिए वह बहू नहीं एक बेटी थी। उसकी प्यारभरी आँखें कुछ भी नहीं देख पाती थीं। निकिता जब माँ से बात करती तो घंटों बात करती और जब नहीं करती तो दिनभर नहीं करती। फिर माँ उसे मनाती रहती। अमित ने निकिता के व्यवहार में परिवर्तन के साथ-साथ एक विशेष बात और नोट की थी। निकिता तक़रीबन हर रात, सोने से पहले, उसे हाथ धोने के लिए ज़रूर कहती। कई बार वह स्वयं पहले ही हाथ धोकर आता तो भी निकिता को तब तक विश्वास नहीं होता जब तक वह एक बार और नहीं धुलवा लेती।
एक दिन निकिता ने पूरा घर सिर पर उठा लिया था। माँ ने साधारण रूप से उसके साथ बैठकर सुप्रिया की बात की थी ओर आकांक्षा के जन्म को उससे जोड़ा था। बस निकिता उखड़ गयी। खूब चिल्लाई, रोती रही और माँ को काफी भला-बुरा कहा।
''मेरी बेटी क्या लंगड़ी होगी? जैसी, तुम्हारी बेटी थी...'' और पता नहीं क्या-क्या।
सुनकर माँ तो रो पड़ी थी। अमित हक्का-बक्का रह गया था। जैसे ही कुछ कहता, उसने उसे भी झिड़क दिया था।
''जाओ, अपनी माँ के पास जाओ, मेरे पास मत आना...''
बड़ी बदतमीजी की थी। इतनी की मोहल्ले के आसपास की औरतें तक देखने आ गई थीं। सबने समझाया तो भी कोई असर नहीं था। चिल्लाती रही। घर की इज़्ज़त मोहल्ले में चर्चा बन गई थी। अमित ने ग़रीबी होते हुए भी अब तक शांति और इज़्ज़त से जीवन गुज़ारा था। अपनी मेहनत से एक गरिमा और नाम कमाया था। मगर आज वह भी दूसरों की तरह आम बन चुका था। दुःख इस बात का था कि कोई बात ही नहीं थी। पूरे मोहल्ले ने चटखारे लिये थे। अमित बहुत मानसिक कष्ट में था पूरी रात नहीं सो पाया। मगर निकिता सोती रही। जब आकांक्षा ज़्यादा रोती रही तो अमित ने उठाकर आकांक्षा को माँ की गोद में दे दिया था। माँ सोई नहीं थी। पूरी रात अपमान के घूँट पीकर अंदर ही अंदर से आहत थी। उसे अपना कोई दोष भी नहीं दिख रहा था। मगर बच्चे के गोद में आते ही वह सामान्य हो गई थी।
सुबह निकिता देर से उठी थी। उठने के साथ ही वह जिस तरह से माँ के साथ बात करने लगी, लगा ही नहीं पिछली रात कुछ हुआ था। अमित भी थोड़ी देर में अस्पताल चला गया था। सामान्यतः मनुष्य क्षमाशील होता है। अमित ने सोचा कि शायद अपनी बेटी से ज़्यादा प्यार होने की वज़ह से निकिता बर्दाश्त नहीं कर पायी हो इसलिए ऐसा सब कुछ कह गयी। और धीरे-धीरे समय ने सब भुला दिया था। मालती तो पहले ही भोली थी। उसे कुछ याद ही नहीं रहा। धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। हाँ, उस दिन के हादसे के बाद, एक बात ज़रूर हुई थी, अमित और मालती अब निकिता से थोड़ा संभलकर बात करने लगे थे।
दुनिया में विकास की धारा बह रही थी, घर पर टीवी ले लिया गया था। धीरे-धीरे दूसरी ज़रूरी चीज़ें भी, निकिता की ज़रूरत के हिसाब से, घर में आने लगी थी। फिर भी उसका घर पर मन नहीं लगता था। अब तक उसने रसोई में अपना हाथ नहीं आजमाया था। कुछ उसकी दिलचस्पी नहीं थी और कुछ माँ भी नहीं करने देती। दिनभर या तो टीवी देखते रहना या फिर लेटे रहना। कालेज में भी इंटरनशिप टुकड़ों में घिसटती हुई धीरे-धीरे पूरी हो रही थी। कभी-कभी ही कालेज जाती थी। अमित ने कई बार उसे किसी अस्पताल में प्रैक्टिस करने की सलाह दी थी... टाइम भी पास होगा और फिर अपने प्रोफेशन के साथ इंसाफ़ भी। मगर निकिता की कोई दिलचस्पी नहीं थी। माता-पिता से दिल्ली बात करने के लिए घर पर टेलीफ़ोन ज़रूर लगवा लिया था। हफ्ते में कम से कम दो बार, ज़रूर फ़ोन कर लेती। लेकिन बात करने के बाद अक्सर उसका व्यवहार रूखा हो जाता था। ज़रा-ज़रा सी बात पर भी समझौता नहीं कर पाती। अजीब-अजीब से विचार उसके मन में आते रहते। अमित उसकी उटपटाँग बातों को समझाकर दूर करने की कोशिश करता। लेकिन फिर भी वह नकारात्मक ही सोचती। यही कारण था जो हर इंसान के बारे में ग़लत सोचकर वह सब से दूर होती जा रही थी।
अमित ने श्याम और राजेश की सलाह पर स्कूटर भी किस्तों पर ले लिया था। सोचा था... निकिता के साथ बाहर जाने में सहूलियत भी रहेगी। अमित ने उसे कई बार घूमने चलने के लिए कहा परंतु वह अक्सर मना कर देती थी। अमित सोचने पर मजबूर हुआ था... शादी के पहले तो बहुत घूमती थी तो फिर अब क्यूँ नहीं? ...क्या उसमें कोई कमी है? ...इन विचारों से उसमें हीन भावना बढ़ जाती थी। निकिता को मानसिक बीमारी हो सकती है... यह वह सपने में भी नहीं सोच सकता था। एक दो बार मार्केट जाने पर अमित ने महसूस किया था कि बात-बात पर निकिता गुस्सा हो जाती है। मार्केट में हो या चलते हुए स्कूटर पर, जब बोलना शुरू करती तो रुकती ही नहीं। कई बार अगर अमित बीच में कुछ बोल देता तो बात बढ़ जाती और बहस के बढ़ने पर स्थिति बिगड़ जाती थी। कई बार आसपास के लोग देखने लगते। धीरे-धीरे अमित को उससे बात करने में डर लगने लगा था। घर के खर्चे बढ़ रहे थे, अमित को और मेहनत करनी पड़ रही थी। आकांक्षा महीनों में बढ़ रही थी। लेकिन अमित उसके बचपन को नज़दीक से देख ही नहीं पा रहा था।
एक दिन स्कूल से आते ही माँ ने अमित और निकिता से कहा था,
''मेरे स्कूल के प्रिंसिपल, गुरुजी अपनी पत्नी के साथ आ रहे हैं बेटा, ...खासकर निकिता और आकांक्षा से मिलने...'' माँ की आवाज़ में विनती थी।
''...हमारी मुसीबत में उन्होंने बड़ी मदद की थी।''
 मालती ने थोड़ा गुरुजी के बारे में बताने की कोशिश की, पर निकिता ने कोई ज़्यादा दिलचस्पी नहीं ली थी। अमित ने भी थोड़ी देर बाद बड़े प्यार से गुरुजी के बारे में बताने की कोशिश की तो अचानक तुनककर बोल पड़ी,
''क्यों? आज माँ बेटे बहुत मस्का लगा रहे हैं...!!''
आवाज़ और बात में कटाक्ष के साथ-साथ रूखापन भी था। अमित तिलमिला गया था। क्या इस घर का, उस पर इतना भी हक़ नहीं? फिर यह तो साधारण-सी बात है। लोग मिलने आते हैं तो बताया जाता है। घर में बात की जाती है।
''क्यूँ? क्या कभी मेरे घर वालों को बुलाया?'' थोड़ी देर बाद निकिता फिर बोल पड़ी थी।
अमित कुछ समझ नहीं पाया था। बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई थी। सोचने लगा उसने कभी नहीं बुलाया, ठीक है मगर वह खुद भी तो नहीं आये। शादी के व़क्त भी उनका व्यवहार ठीक नहीं था। अमित को अक्सर लगता था कि वो लोग उसे पसंद नहीं करते। फिर सबसे बड़ी बात यह थी कि इसका ज़िक्र निकिता ने पहले कभी किया ही नहीं अन्यथा वह तो ज़रूर बुलाता और उसे खुशी भी होती। उसे तो वैसे भी प्यार की ज़रूरत थी। ...बहस से कोई फ़ायदा नहीं तो बात सँभालते हुए कहने लगा, 'हाँ हाँ, क्यूँ नहीं, हम उनको ज़रूर बुलायेंगे।''
''नहीं, तुमने कभी नहीं बुलाया। तुम्हें सिर्फ अपने घर वालों की लगी रहती है। पहले बहन फिर माँ, फिर माँ के स्कूल वाले। ...सारे घटिया लोग।''
बोलकर निकिता ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी थी।
अमित को कुछ बात ही समझ में नहीं आयी। एकदम से परेशान हो गया। मालती भी घबरा गई थी। अधिकतर लोग सरल सोच के होते हैं। हर चीज़ को सकारात्मक दृष्टि से ही देखते हैं। कहने लगी,
''सही तो कह रही है, इसके माँ-बाप को तुमने कभी नहीं बुलाया और न ही इसे तुम ले गये। अब ज़रूर ले जाना।''
''मगर माँ कुछ होता ही ऐसा चला गया। मौका ही नहीं मिला। फिर सुप्रिया की और आकांक्षा की खबर दी थी। मगर, शायद, पता नहीं...।''
आगे कुछ बोले बिना अमित चुप हो गया था लेकिन निकिता उलटे और बिफर पड़ी, ''तो क्या खाली बैठे हैं। उन लोगों की कितनी बिज़ी ज़िंदगी हैं। दिल्ली की लाइफ, तुम लोगों को क्या पता। अब क्या छोटी-छोटी सी बात पर भागे चले आयेंगे। तुम कितनी बार जाते हो।''
अमित का क्रोध पहली बार बढ़ रहा था। सोचने लगा... किसी की मौत उनके लिए छोटी-सी बात है, आकांक्षा का जन्म छोटी बात, तो फिर बड़ी बात कौन-सी है, वहीं हम को उन्होंने एक बार भी नहीं कहा आने के लिए। ...मगर वह चुप ही रहा। गुरुजी को आना था। बात बिगड़ सकती है। वह मगर समझ नहीं पा रहा था। ...क्या बात थी, कहाँ से कहाँ पहुँच गयी। मालती एकदम हतप्रभ हो गई थी। उसे स्वयं समझ ही नहीं आया, कहाँ ग़लती हो गई उससे। उसे आत्मग्लानि होने लगी थी। इससे अच्छा तो गुरुजी आने के लिए कहते ही नहीं। अब वह मना भी कैसे करती। फिर वह स्वयं बहू की तारीफ़ भी करती रहती थी। वैसे भी उसके यहाँ कोई भी तो नहीं आता था। कमला तो आ जाती खोज ख़बर के लिए, मगर गीता उषा अब कम ही आती थीं। फिर वह आकांक्षा, स्कूल और घर के काम में व्यस्त रहती थी। घर का सारा काम करके ही स्कूल जाती। उधर, निकिता सारा दिन लेटी रहती थी कभी-कभी ही घर से बाहर निकलती। वैसे मालती ने कभी भी बहू को कष्ट नहीं होने दिया था। आज भी धैर्य से विनती करते हुए उसे शांत रहने के लिए कहा तो निकिता मुश्किल से चुप हुई थी।
गुरुजी अपनी पत्नी के साथ शाम को आए थे। बूढ़े हो गये थे और रिटायर भी। पत्नी गाँव की, मगर खूब बोलने वाली। आते के साथ, अंदर के कमरे में पहुँच गयी। अमित ने गुरुजी और उनकी धर्मपत्नी के चरण स्पर्श किए थे। निकिता अंदर के कमरे में पलंग पर ही बैठी रही। जबकि उसकी सुंदरता की खूब बड़ाई हुई थी। गुरुजी की धर्मपत्नी मालती से बात करती रही। साथ ही साथ आकांक्षा को गोद में खिलाते हुए बोलती रही... एकदम गुडिय़ा-सी सुंदर है। मालती की जान में जान आई थी। उसने सुप्रिया को नहीं देखा था सो उसका नाम नहीं लिया। सुप्रिया और अमित दोनों भाई-बहन के चेहरे में एक ही झलक थी, बड़े ग़ौर से देखने पर कुछ देर बाद मास्टरनी ने ज़रूर कहा था,
''बाप पर गई है, सौभाग्यशाली है, क्यूँ बेटा?''
सुनकर निकिता के चेहरे के रंग बदलने लगे थे। मालती ने बात सँभाली थी,
''बच्चे अपना चेहरा कई बार बदलते हैं। जब माँ इतनी सुंदर है तो बेटी तो होगी ही, मैं तो बड़ी भाग्यशाली हूँ जो मुझे ऐसी बहू मिली है।''
निकिता ने कहा तो कुछ नहीं, बोली एक लाइन भी नहीं। बिस्तर से उठना तो बहुत दूर की बात थी, एक बार भी नहीं मुस्कुराई। कुछ देर बाद, निकिता को किसी तरह अमित अपने साथ बाहर के कमरे में तो ले आया मगर वहाँ भी वह चुपचाप ही बैठी रही। उधर, गुरुजी ने बहू को देखा तो बड़े प्रसन्न हुए थे और दूर ही से हाथ उठाकर दिल ही दिल आशीर्वाद दिया था। मालती के परिवार की उन्नति देखकर उन्होंने भगवान को धन्यवाद किया था। अंत में दोनों बुज़ुर्ग मेहमानों ने आशीर्वाद देते हुए विदाई ली तो अमित ने लंबी साँस ली थी।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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