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बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 35
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
शुक्रवार , , 11 अप्रेल
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



निकिता का अपरिभाषित, अव्यवस्थित व अप्रत्याशित व्यवहार बढ़ता जा रहा था। अमित अब तक इसे बीमारी न समझते हुए उसका स्वभाव ही मान रहा था। वह उसके अनापेक्षित व्यवहार से दुःखी था तो मालती सहमी रहती थी। निकिता अपने अंदर से उठ रहे अनियंत्रित विचारों से नियंत्रित होने लगी थी। उसे सदैव लगता कि कोई उसे कुछ कह रहा है और वह वैसा ही करने लगती। एक दिन तो उसने हद कर दी। साहू कि दुकान से खुद ही कुछ लेने के लिए चल पड़ी। अमित अस्पताल से लौट रहा था। निकिता को मोहल्ले से बाहर दुकान पर देखकर रुक गया। सोचा स्कूटर पर ही साथ घर चले जायेंगे। दुकान में जाकर उसने भी साहू से कुछ सामान लिया और फिर निकिता की ओर देखकर कहने लगा,
''कुछ और लेना है?''
''साहू कितने पैसे हुए मेरे।'' निकिता ने अमित की तरफ़ देखे बिना कहा था।
''इकट्ठे जोड़ दूँ।'' साहू पूछने लगा।
''क्यूँ? जो मैंने लिया है उसी के बताओ।'' निकिता ने तेज़ स्वर में कहा था।
साहू ने मुस्कुराते हुए पैसे जोड़े और निकिता से पैसे लेकर अमित से बात करने लगा,
''लगता है, नाराज़ है बहू।''
निकिता पैदल ही उसकी ओर देखे बिना घर की ओर चल चुकी थी। अमित ठगा-सा खड़ा रह गया था। बचपन से आज तक इतनी पीड़ा और अपमान उसे ग़रीबी के दिनों में भी किसी ने नहीं पहुँचाया था, जितना उसे उस बदमाश साहू की कुटिल मुस्कान और बात करने के ढंग से हुआ था।
निकिता का अटपटा व्यवहार बढ़ता जा रहा था। मोहल्ले में अब यह आम बात हो गई थी। अमित मानसिक रूप से परेशान रहने लगा था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि बात क्या है। कहाँ, क्या ग़लती हुई? जो संवेदनशील होता है वह ज़्यादा सोचता है। वहीं निकिता को कोई परवाह नहीं थी अपना रोज़ खाना खाकर बिस्तर पर लेट जाना। अमित रात-रात भर सो नहीं पाता था। कभी-कभी आकांक्षा को भी गोद में खिलाना पड़ता... और क्या करता, अभी वो साल की भी नहीं हुई थी। ...और फिर निकिता ज़िद्दी स्वभाव की है यही निष्कर्ष निकाल कर संतोष कर लेता था।
निकिता के मन में जो आता वही करती। अपने घर वालों से विशेष स्नेह था उसे। जबकि उसके घर वालों का उसके प्रति कोई विशेष लगाव दिखाई नहीं देता था। हाँ, अमित से जुड़ी हुई हर चीज़ से उसे विशेष नफरत होती थी। यहाँ तक कि वह अनादर करने से भी नहीं चूकती थी। जो भी मालती या अमित कहते उससे सदैव उल्टा करती। ...मगर क्यों? अमित के पास कोई जवाब नहीं था। ...क्या उसे शादी के पहले नहीं पता था। फिर पहल भी तो उसी की तरफ़ से हुई थी। हाँ, अमित अपनी ज़िम्मेदारी को, जो भी थी निभा रहा था। परंतु जब भी बात बिगड़ती तो उसका कोई कारण नहीं होता था। साधारणतः लोग बड़े से बड़े कारण होने पर भी ऐसा बर्ताव नहीं करते। पर घर में निकिता जब भी झगड़ती उसके पीछे तो कोई कारण ही नहीं होता था। अमित दो मिनट के लिए विचलित होता फिर शांत ढंग से, उसे प्यार से समझाता। कई बार बिना किसी बात के अपनी ग़लती स्वीकार करके, उसके क्रोध को शांत करने की कोशिश करता। मगर निकिता का चुप होना, या शांत होना किसी भी बात पर निर्भर नहीं करता था। उसका बर्ताव सदैव असामान्य ही होता।
समय के साथ अमित ने एक बात और नोट की थी कि निकिता ज़्यादातर व़क्त अपने में ही रहती थी। कभी एकदम उदास फिर कभी अत्यधिक खुश, बहुत बात करती। जब नॉर्मल होती तो आकाँक्षा से खूब बातें करती, उसे बहुत प्यार करती, फिर कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं देती। कई बार फूल-सी नाजुक बेटी की खूब पिटाई कर देती और फिर छोटी-सी मासूम बच्ची को भी भला-बुरा कहने से नहीं चूकती। मालती जब भी आकांक्षा को ऐसी हालात में उठाकर दूर ले जाना चाहती, तो खूब उल्टा-सीधा सुनती।
निकिता को जब भी प्यार की आवश्यकता होती तो अमित से जबरदस्ती करती थी। वहीं अमित में देह का आकर्षण, प्यार का जुनून कम तो नहीं हुआ था, पर उस पर मानसिक अवस्था का असर होने लगा था। वह अब आंतरिक क्षणों में न तो आनंदित हो पाता, न ही पूरी तरह से उसमें जुड़ पाता था। एक रात के घटनाक्रम में अजीब-सी बात देखकर तो वो फिर अचंभित हो गया था। निकिता ने आकांक्षा को माँ के पास लेटाकर, देर रात अमित से कई बार हाथ धुलवाया था। कहती रही,
''तुम्हारे हाथ गंदे रहते हैं। तुम हाथ धोकर मेरे पास आया करो।''
एक बार तो रोज़ ही उसे अपना हाथ धोना पड़ता था पर उस रात कई बार ऐसा करने से वह चकराया था। बाद में निकिता ने जब उससे कहा,
''मुझे मेरा बच्चा चाहिए।'' तो वह बहुत देर तक समझ न सका था।
''क्यूँ? आकांक्षा तुम्हारी बेटी नहीं है क्या?''
''वह तुम्हारी है। मुझे मेरा बच्चा चाहिए। जो मेरे जैसा हो।''
सुनकर अमित को गुस्सा आ रहा था तो उधर निकिता उसके बदन के साथ खेलने की कोशिश कर रही थी। मगर आज अमित का क्रोध पिघल नहीं पा रहा था, शरीर की आग पर मानसिक तनाव जो छाया था। कुछ देर कोशिश करने पर भी जब कुछ नहीं हुआ तो निकिता ने ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया था। घबराकर अमित उसे समझाने लगा था,
''धीरे बोलो सब सुनते हैं। आवाज़ पड़ोसी और माँ तक जाती है।''
मगर वह चिल्लाती रही थी,
''तुम जैसों को तो प्यार करना भी नहीं आता। मेरी तो किस्मत ही खराब है। तुम लोग तो मुझे मारना चाहते हो...।''
अमित ने उसके मुँह पर हाथ रखा कि आवाज़ बाहर न जाये मगर वह और ज़ोर से चिल्ला पड़ी थी, ''...गला दबाओगे क्या?''
तभी दरवाज़े पर किसी आवाज़ ने अमित को चौंकाया था। माँ धीरे से फुसफुसा कर कह रही थी, ''बेटा, क्या हुआ...? बहू ठीक तो है...?''
''कुछ नहीं माँ, सब ठीक है।''
अमित ने निकिता को अपनी बाहों में भींचा कि शायद वह चुप हो जाये। शरीर के नज़दीक पहुँचते ही निकिता ने बिना रुके उसकी नग्न बाहों पर उसे तेज़ चूमना शुरू कर दिया था। अमित कुछ समझ न पाया तो डर से उसे साथ देने की कोशिश करने लगा, मगर असफल ही रहा। अब रोज़ निकिता उसे उत्तेजित करने की कोशिश करती और अमित प्रायः कुछ अधिक नहीं कर पाता। फलस्वरूप उसकी मानसिक पीड़ा और अधिक बढ़ रही थी। इसी अनमने जीवन और प्यार में कब निकिता पुनः गर्भवती हुई, अमित जान नहीं पाया। फिर भी वह निकिता की खुशी में एक बार फिर अपनी खुशी ढूँढ़ने की कोशिश में था। सुनकर मालती भी खुश हुई थी। ऐसा नहीं कि अमित को दूसरे बच्चे की खुशी नहीं थी, परंतु जिस हालात से वह गुज़र रहा था उसका कोई भी जवाब उसके पास नहीं था। फिर वह अपनी हर बात जहाँ अपनी माँ से नहीं कर सकता था वहीं उसकी तमन्ना रहती थी कि वह अपनी सारी बात अपनी पत्नी से करे। मगर निकिता से उसे अब बात करने से डर लगने लगा था। दोस्तों से बात करने में उसे शरम आने लगी थी। वह सदैव कोशिश करता, घर पर खुशी देने की, खासकर पत्नी और बेटी को, लेकिन निकिता को उसकी किसी भी चीज़ में आनंद नहीं आता। उसे उसके द्वारा लायी गई हर चीज़ खराब लगती। अमित हर बार मन को यही कहकर समझा लेता कि यह उसके पसंद व स्तर की चीज़ नहीं है। उधर, निकिता को हर किसी में, बड़े से बड़े आदमी, यहाँ तक कि अच्छे से अच्छे होटल में भी कोई न कोई नुक्स ज़रूर दिखाई देता। प्रकृति के खूबसूरत नज़ारों, पिकनिक स्पॉट में जाने पर भी खुश नहीं होती। पिक्चर, मार्केट घूमना, लोगों से मिलना-जुलना उसे कुछ भी पसंद नहीं था। बस हर व़क्त अपनी दुनिया में रहना चाहती। मोहल्ले की औरतें तो पढ़ाई-लिखाई और व्यवहार, दोनों के कारण उससे वैसे ही दूर रहती मगर अमित को भी धीरे-धीरे घर आने में डर लगने लगा था। मगर मालती कहाँ जाती...?


यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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