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बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 36
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
सोमवार , , 14 अप्रेल
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



दर्द हद से बढ़ जाये तो दवा बन जाता है, सत्य नहीं है। मगर हाँ, अपने निकलने के लिए रास्ता ज़रूर तलाश कर लेता है। मालती स्वाभाविक रूप से भोली-भाली और कम बोलने वाली थी। भगवान ने जितने दुःख दिए थे उतनी ही उसको सहने की शक्ति भी दी थी। पहले तो स्कूल जाने के कारण वैसे ही मोहल्ले में आस-पड़ोस की बातें सुनने का कम मौका मिलता था। अब रही सही कसर आकांक्षा ने पूरी कर दी थी। उसकी दुनिया उसके इर्द-गिर्द सीमित होकर रही गई थी। सुप्रिया नये रूप में थी और वह माँ की जगह दादी माँ बन चुकी थी। कभी-कभी गीता और उषा आ जाती तो वो भी निकिता को पसंद नहीं होता था। कमला पड़ोस से झाँककर अपनी बात ज़रूर कह जाती थी। मालती चुपचाप सुन लेती। आदत पड़ चुकी थी। जीवन रुकता नहीं, चलता रहता है। मालती के लिए नया जीवन था, आकांक्षा का अस्तित्व। उसी में सुप्रिया को ढूँढ़कर खुश हो जाती। जीवन से वैसे भी कभी कोई शिकायत नहीं की थी।
अमित भी आशावादी था। जीवन में हर चीज़ संघर्ष से प्राप्त करने की आदत पड़ चुकी थी। उसके सामने सारा जीवन अभी पड़ा था। पत्नी सुंदर, आकर्षक, पढ़ी-लिखी थी। फिर कमी कहाँ है? उसको ढूँढक़र हल निकालना चाहता था। मानसिक रूप से परेशान ज़रूर था मगर टूटा नहीं था। भावुक और संवेदनशील व्यक्ति को अपनी इ़ज़्ज़त बड़ी प्यारी होती है। मोहल्ले में अपनी चर्चाओं से सिर्फ आहत हो जाता था। दोस्तों से भी कभी ज़िक्र तक नहीं करता, इसमें उसे घर की बात बाहर जाती दिखाई देती थी। मगर परिवार में सुख और शांति दोनों ही न हो तो फिर क्या किया जाये। शायद उसी में कोई कमी हो तो उसका फिर इलाज़ भी ज़रूरी है। बहुत सोच-विचार कर एक दिन काउंसलिंग के लिए साइकेट्रिरक डाक्टर चौधरी के पास अकेले ही पहुँच गया। डाक्टर ने उसकी आँखों में उतरते हुए बड़े ध्यान से पूछा था, ''हाँ, बताइए।''
कहाँ से शुरू करे, उसे समझ में नहीं आया था। कितना बताये कितना छुपाये, यह पता नहीं था। लोगों की लाज शर्म थी। अपनी पहचान भी छुपा रहा था। बस इतना ही कह पाया था,
''शादी के बाद खुशियाँ नहीं है, जानना और समझना चाहता हूँ। पत्नी का बर्ताव ठीक नहीं है। डाक्टर है पढ़ी-लिखी है पर कुछ भी ठीक नहीं है।''
''आपकी पत्नी कहाँ है? साथ आई है? हो सकता है उसको भी आपसे शिकायत हो। जब तक दोनों की बातें नहीं सुनी जाये, कुछ नहीं कहा जा सकता। उसको भी साथ लाइये। फिर जैसा कि आप बता रहे हैं कि वो खुद डाक्टर हैं तो फिर तो कोई परेशानी ही नहीं।''
बड़ा रूखा-सा सीधा जवाब था। अमित भी जानता था। यही तो परेशानी है, कम पढ़े-लिखे को समझाया जा सकता है, डराया जा सकता है। मगर जो पहले से ही सब कुछ समझा हुआ हो उसे क्या समझाया जा सकता है। फिर भी शायद प्यार से जीता जा सकता हो। हो सकता है उसी में कुछ कमी हो। मगर हुआ वही जिसका उसे डर था। अमित ने बड़े प्यार से रात को निकिता को अपनी बाँहों में लेकर कहा था,
''निकिता मैंने तुम्हें कोई खुशी नहीं दी। मुझमें हो सकता है कोई कमी हो। तुमने कभी इस बारे में ज़िक्र भी नहीं किया। परंतु तुम खुश नहीं रहती हो। जानती हो मैंने एक डाक्टर से बात की है। वह कह रहा था कि वह सब कुछ समझ कर ठीक कर देगा। बस तुम्हें एक बार मेरे साथ डाक्टर के पास चलना होगा। प्लीज।''
''क्यूँ? मुझे तुम पागल समझते हो।''
''नहीं नहीं, वह तो मैं अपने बारे में कह रहा था। तुम बताओगी, तभी तो मेरे में सुधार होगा।''
''तो तुम माँ-बेटे जाकर इलाज़ करवाओ। साथ में अपनी बेटी को भी ले जाना।''
 निकिता तेज़ी में दूसरी तरफ़ मुँह करके सो गई थी। अमित सारी रात ताकता रह गया था। निकिता का सुंदर-सा आकर्षक शरीर आज उसे पता नहीं क्यूँ अब सम्मोहित नहीं कर पा रहा था।
अमित ने हिम्मत नहीं हारी थी। दूसरे दिन वह फिर डाक्टर के पास गया था। पूछने लगा कि क्या कोई सुझाव हो सकता है। डाक्टर ने सुझाव की जगह लंबा लेक्चर दे डाला था।
''आजकल!! अधिकतर शादियाँ असफल हैं। कारण बहुत से हैं। एक तो आदमी और उसके घर वाले वर्षों से औरतों पर ज़ुल्म करते आ रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। दूसरा इन बातों को सुन-सुन कर लड़कियाँ अधिक सतर्क और सावधान हो गई हैं। कई बार वे पूर्वाग्रहों से ग्रसित भी होती हैं। कई बार लड़की के घर वाले भी जाने-अनजाने में ज़्यादा हस्तक्षेप कर जाते हैं। लड़की को शादी के पहले ही सिखा-पढ़ाकर भेजा जाता है। फिर अगर लड़की पढ़ी-लिखी, स्वतंत्र और स्वावलंबी है तो फिर सामंजस्य का सवाल ही नहीं है। वो सुनती ही नहीं, उल्टा प्रभुत्व दिखाती हैं। एक तो ज़्यादा उम्र होने से पहले ही परिपक्व होती हैं फिर माँ-बाप, बहन-भाई के ऊपर पति का नाम ही नहीं आ पाता, तो फिर लड़के के घर वालों का तो सवाल ही छोड़ो। ऊपर से आजकल एकल परिवार। पहले सामूहिक घरों में मौका ही नहीं मिलता था। आजकल औरतों की समस्या कम, औरतों से समस्या ज़्यादा पैदा हो रही है। इसी के चलते औरतें उल्टा अब पहले से अधिक दुःख पा रही हैं। औरतें औरतों को भिन्न-भिन्न रूप में तकलीफ़ देती हैं। बस फ़र्क अब इतना है कि अब पुरुष भी कष्ट भोग रहा है। ...सेक्स संबंधी परेशानी भी एक बेहद गंभीर समस्या है। पति-पत्नी के बीच यह एक अति आवश्यक एवं प्राकृतिक बंधन है। भिन्न-भिन्न कारणों से, दोनों में से किसी भी एक का संतुष्ट नहीं होना झगड़े की शुरुआत करता है। आदमी की सिगरेट, शराब के अलावा अत्यधिक मानसिक तनाव से भी सेक्स के प्रति रुझान और शक्ति कम हो जाती है। दूसरी ओर, औरतों में जागरूकता और समझ बढ़ने से, उनकी सेक्स में इच्छा और ज़रूरतें बढ़ी हैं।'' डाक्टर ने एक लंबी साँस ली थी और फिर पुनः बोलता चला गया था,
''...खुशी के लिए समझौता और त्याग की जगह, लीक से हटकर जीने कि प्रवृत्ति आई है। देने की जगह लेने की आदत बढ़ी है। और भी बड़े कई कारण हैं। और फिर आप अकेले नहीं हैं। आजकल इनकी संख्या दिनोंदिन बढ़ती चली जा रही है। सब के अलग-अलग कारण है। उसमें आपका कौन-सा कारण है और आप उसमें क्या कर सकते हैं, स्वयं देख सकते हैं। पढ़ा-लिखा आदमी अगर ज़्यादा समझदार है तो फिर दिक्कत है कहाँ? परिवार संबंधों से बनता है, संबंध बंधन से बनते हैं। जिस बंधन में भावना नहीं, प्यार नहीं, विश्वास नहीं, वह कष्टदायक बन जाते हैं। भावना, प्यार, विश्वास के लिए दिमाग़ की नहीं दिल की ज़रूरत होती है। मगर आजकल दिमाग़ दिल पर हावी है।''
सब सुनने के बाद अमित ने सोचा था ठीक ही तो कह रहा है।
''जी आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। क्या फिर भी आप मेरी कुछ मदद कर सकते हैं? अगर आप विश्वास करें तो मैं सब कुछ ठीक-ठीक बताऊँगा। झूठ बोलने की मेरी कोई वज़ह भी नहीं है।''
अमित ने विक्रम और एबार्शन के अलावा सब कुछ विस्तार से बताया था। अपनी पत्नी के बारे में कुछ भी ग़लत कहना या सुनना उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने के समान और अपमानजनक था। शायद यही उसका प्यार था। उसकी सकारात्मक कोशिश थी। डाक्टर ने ध्यान से सुनने के बाद कहा था,
''अगर आप सब ठीक बयान कर रहे हैं तो कुछ ग़लत तो है। मेंटल डिसऑडर भी हो सकता है, पर मैं बिना पेशेंट से मिले कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ।''
अमित एकदम से बोल पड़ा था,
''नहीं, नहीं ऐसा नहीं हो सकता।''
डाक्टर ने महसूस किया तो कहने लगा,
''लगता है आप अपनी पत्नी से बहुत प्यार करते हैं। क्या चाहते हैं? शायद मैं कुछ मदद कर सकूँ।''
''सिर्फ और सिर्फ खुशियाँ। मैं तो चाहता हूँ कि वह खुश रहे। मगर वह भी खुश नहीं रहती।''
''क्या आप उसके माँ-बाप के पास गये हैं?''
''नहीं, बुलाया ही नहीं। मुझसे उनका बर्ताव ठीक नहीं। शायद मैं उनके लायक नहीं।''
''कोई बात नहीं, आप जाइये, क्या फ़र्क पड़ता है। उनके साथ मिलिये। पत्नी को अच्छा लगेगा। फिर उसे जो भी चीज़ पसंद हो उसे ही कीजिए।''
''मगर उसे तो कुछ भी पसंद नहीं।''
''ऐसा नहीं हो सकता, ढूंढ़िए। फिर उसको वही सब माहौल देने की कोशिश कीजिये जो उसके पास शादी के पहले था। अपना घर छोड़कर कोई अच्छे महौल का, अच्छे एरिया में मकान लीजिये। फिर हो सके तो बाहर घूमने जाइये। पढ़ाई के बाद बाहर पोस्टिंग लीजिए और हो सके तो सदैव प्यार से बात कीजिए।''
''और, आकांक्षा से ऐसा व्यवहार?''
अमित ने पूछा था।
''हो सकता है आपसे उसको दुःख पहुँचा हो। इसीलिये उन सभी को, जो आपसे जुड़े हैं, उसे दुःख का कारण मानती हो। वैसे ऐसा होना तो नहीं चाहिए। फिर भी प्यार से समझाइए, शायद दूसरे बच्चे के बाद ठीक हो जाये। वैसे हो सकता है शादी से पहले का कोई शॉक हो। विज्ञान में शॉक से मेंटल डिसऑडर होने के पुख्ता प्रमाण नहीं है। विज्ञान तो नहीं मानता। डिप्रेशन हो सकता है। फिर भी कह नहीं सकते, जब तक मरीज़ से खुद न बात हो। वही बता सकता है ऐसा क्यूँ हो रहा है। ख़ैर, अभी आप इतना कीजिये। फिर अगर हो सके तो मैं मरीज़ से एक बार मिलना चाहूँगा। थोड़ा डिप्रेशन में लगती है, मगर क्यूँ? यह जानना ज़रूरी है।''
अमित को अब यकीन हो गया था कि जो बात उसने छुपाई है वही मेंटल शॉक और डिप्रेशन का कारण हो सकती है, मगर मैंने तो उसे बचाया था, प्यार दिया, सहारा दिया फिर मेरे साथ ऐसा बर्ताव तो कोई पागल ही कर सकता है। पर अब वह क्या कर सकता है। निकिता फिर से प्रेगनेंट है उसे उसका ख़याल रखना ज़रूरी है। आज ही माँ से नये घर के लिए बात करेगा। फिर उसे भी कालेज से आने-जाने में कष्ट होता है। फिर माँ को भी अब नौकरी की क्या आवश्यकता है। बहुत हो गया। मिलता भी क्या है। जहाँ तक पैसे की बात है। शाम को किसी हॉस्पिटल में बैठकर कमा लेगा।
जल्द ही अमित ने मेडिकल कालेज के पास ही शास्त्रीनगर में दो कमरे का मकान ले लिया था। श्याम और राधिका भी खुश थे। मकान उनके घर से पास ही था। शादी के बाद दोनों में चमक, खुशी, मस्ती देखते ही बनती थी। अमित को तो बहुत बाद में पता चला था कि राधिका बहुत बड़े बिज़नेसमैन की लड़की है। कभी भी राधिका ने ज़िक्र तक नहीं किया था न ही कभी कोई एहसास होने दिया था। राधिका के घर वालों ने शादी में लग्ज़री गाड़ी भी दी थी। राधिका के सास-ससुर गाँव के जमींदार थे, और माँ-बाप दिल्ली के प्रतिष्ठित व्यवसायी। मगर दोनों परिवार एक साथ जबलपुर कई चक्कर लगा गये थे। दोनों परिवारों में बेहतरीन सामंजस्य था।
श्याम ने कई बार घर आने के लिए कहा था मगर अमित कोई न कोई बहाना बनाकर बात टाल जाता था। एक दिन राधिका और श्याम घर आ गये। निकिता बड़ी खुश हुई थी। गाड़ी देखकर कहने लगी,
''कहाँ से ली है?''
''पापा ने दी है।'' राधिका ने कहा था।
''दहेज की है।'' श्याम मज़ाक कर रहा था।
''क्यूँ? तुम्हारे मम्मी-पापा तो आते रहते होंगे?'' निकिता पूछ रही थी।
''हाँ, हाँ खूब आते हैं।'' राधिका ने जवाब दिया था।
''तुम उनको बुलाती रहती होगी?'' निकिता आज बात करने के मूड में थी।
''नहीं नहीं, बुलाना कैसा। वह अपने आप ही आते रहते हैं। बेटी हूँ। मगर हाँ, मैं अपने सास-ससुर को ज़रूर बुलाती रहती हूँ और वह अपने आप भी आते रहते हैं। श्याम को भी अच्छा लगता है और मुझे भी। दोनों सास-ससुर मुझे पसंद करते हैं। और तेरे मम्मी पापा?''
''वो ज़रा बिज़ी रहते हैं।'' निकिता उदास हो रही थी।
''ऐसे भी क्या बिज़ी, भाई।'' श्याम ने टोकते हुए कहा था।
''अच्छा अबकी बार हम सब कार में श्याम के गाँव चलेंगे, ठीक है।'' राधिका बड़े उत्साह से कह रही थी, दोस्तों में उसे आनन्द आता था।
''ठीक है निकिता से पूछ लो।'' अमित ने निकिता की ओर सहम कर देखते हुए कहा था।
''क्यूँ निकिता? चलेंगे। मुझे साथ घूमने में बहुत अच्छा लगता है।'' राधिका ने निकिता का हाथ पकड़ लिया था।
''ठीक है चलेंगे।'' निकिता ने धीरे से सिर हिला दिया था।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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