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बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 38
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
बुधवार , , 16 अप्रेल
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



अनिरुद्ध कब हुआ उसे ठीक से याद ही नहीं। आकांक्षा कब बड़ी होने लगी उसे पता ही नहीं चला। बच्चों का बचपन, शादी का चाव, ससुराल का प्यार, ज़िंदगी की खुशियाँ कुछ भी पता नहीं। बचपन से लेकर आज तक सिर्फ दुःख। बचपन याद आते ही एक एहसास मन में जागा था... लेकिन बचपन में अगर सुख नहीं था तो दुःख भी महसूस नहीं होता था, फिर किसी बात का कष्ट नहीं था। उलटे जीवन जीने की एक तमन्ना थी, इच्छा थी, जोश था। बचपन में दुःख नहीं था, अब सुख नहीं है। बाकी सब कुछ है, और जो नहीं है वह सब भौतिक सुख-सुविधाएं धीरे-धीरे इकट्ठी हो रही हैं। मगर सुख नहीं आ रहा। सिर्फ दुःख ही आ रहा है और साथ में कष्ट। फिर कष्ट में भी मानसिक कष्ट ज़्यादा पीड़ा करता है। शरीर पर चोट से ज़्यादा दिल पर चोट गहरी होती है। उसमें दर्द का असर सदा बना रहता है जिसकी टीस वर्षों तक होती रहती है। वह आज तक इस बात को नहीं समझ पाया था कि उसका कौन-सा, कहाँ पर, कैसे और कितना कसूर है। उलटा उसने हर पल, हर रोज़ एक नयी कोशिश की थी। कभी मुसीबत से नहीं भागा था। हाँ, कभी-कभी थक ज़रूर जाता। एक पल के लिए झुंझलाहट ज़रूर होती। फिर वह लड़ने लगता अपने आप से। पर उससे माँ का दुःख नहीं देखा जाता। इतने दुःखी और ज़लील होने पर भी, उसने कभी भी कुछ नहीं कहा था। उधर, निकिता को कभी एहसास भी नहीं हुआ कि वह किसी के साथ ग़लत कर रही है। वैसे तो ग़लती स्वीकार भर कर लेने से आधी समस्या का समाधान हो जाता है। मगर यहाँ तो बात ही कुछ और थी।
मालती चुपचाप सुन लेती, अकेले में अपने आँसू भी छुपाने की कोशिश करती। हाँ, बेटे का दुःख उससे देखा नहीं जाता था। दिनभर घर का ध्यान रखना, खाना बनाना, बच्चे देखना। आकांक्षा को तो उसी ने पाला था। उससे अकेले में खूब बातें करती पर कभी सुप्रिया का नाम भी नहीं लेती। साफ़-साफ़ झलकता था कि निकिता के गुस्से से डरती है। साथ ही अमित को अकेले में समझाती रहती,
''बच्चों का ध्यान रखा करो, बड़े हो रहे हैं। उनको तुम्हारी ज़रूरत है।''
निकिता के लिए कभी कुछ नहीं कहती। बस इतना ज़रूर कहती आजकल के ज़माने को देखते हुए बहुत अच्छी है। नये ज़माने की बहुओं के तो मिज़ाज ही नहीं मिलते ...और पता नहीं क्या-क्या उदाहरण देकर निकिता को अच्छी ही ठहराती फिर अमित को उसकी देखभाल करने के लिए कहती।
दोनों बच्चों ने क्रमशः कब बोलना शुरू किया, कब खाना शुरू किया, कब चलना, कब उनके दाँत निकले, समय तक को पता न चला। अमित न तो देख सका न ही समय को रोक पाया। वह काल को रोकना भी नहीं चाहता था। दुःख का समय वैसे ही बड़ी मुसीबत से कटता है और वह उसे काट ही रहा था। निकिता ने किसी तरह एमबीबीएस कम्प्लीट किया और अमित ने एमडी। उसका और आगे पढ़ाई में अब मन नहीं लगता था। हाँ, हास्पिटल में रोगियों के बीच रहने में उसे आनंद आता था। खूब बातें करता, घर पर जो बिल्कुल भी नहीं कर पाता था। दिन में रोगियों से खूब खुलकर मिलता-जुलता और उनकी परेशानियों को समझता समझाता। मरीज़ों में लोकप्रिय रहने लगा। सारे साथी धीरे-धीरे जबलपुर से जा चुके थे। अदिति तो बहुत पहले ही मास्टर्स करने विदेश जा चुकी थी। श्याम और राधिका पोस्ट ग्रेजुएशन करके दिल्ली में प्रैक्टिस करने चले गये थे। निकिता के व्यवहार से, श्याम और राधिका जबलपुर में रहते हुए भी कम ही घर आते थे। कालेज में अमित से ज़रूर मुलाकात हो जाती। दोनों को बेहद प्यार था अमित से। उसे तकलीफ़ न हो इसीलिये उससे कभी ज़िक्र नहीं करते। मगर उसकी परेशानियों को समझने लगे थे। अन्य दोस्तों में ज़्यादातर को पीजी का मौका पहली बार में नहीं मिल पाया था। कुछ दूसरे कालेज में चले गये थे तो कुछ प्राइवेट प्रैक्टिस करने लगे। कुछ रईसों के माँ-बाप ने क्लीनिक खोल दी तो कुछ दूसरों के क्लीनिक पर काम करके अनुभव लेने लगे थे। विक्रम अपनी दुनिया में मस्त रहकर एमबीबीएस कम्प्लीट करके, कब कहाँ चला गया, दूसरों को पता ही नहीं।
अमित ने रेलवे के लिए यूपीएससी की परीक्षा दी थी। होशियार तो था ही सफल हुआ। पहली पोस्टिंग भुसावल (महाराष्ट्र), मध्य रेलवे में हुई थी। माँ ने साथ जाने से मना किया था। उसे धीरे से अकेले में समझाया था, '...नयी ज़िंदगी है, अकेले जियो, खूब मस्ती करो, शायद यही बहू चाहती है और शायद उसे अच्छा भी लगे, मेरी वज़ह से बँध जाते हो। मेरा क्या है, आती-जाती रहूँगी। फिर तुम लोग खुश रहोगे तो मैं भी खुश रहूँगी।' भारत सरकार में, प्रथम श्रेणी का अधिकारी, डाक्टर के रूप में पदस्थ होने पर भी घर पर कोई खुशी का माहौल नहीं था। न नये तौर-तरीक़ों की तरह कोई पार्टी हुई, न ही पुराने रीति-रिवाज़ों की तरह घर पर हलुआ बना था। बचपन में माँ अक्सर छोटी-छोटी खुशी में घर पर हलुआ बनाया करती थी। पड़ोस के लोगों को भी बुलाकर खिलाया जाता था। मोहल्ले में हर त्योहार पर घर-घर में मिठाइयाँ बनती थीं। सबके घर का अलग-अलग स्वाद होता था। उसमें मिठास और क्वालिटी घर के आर्थिक हालात पर निर्भर करती थी। मिठाइयाँ एक-दूसरे के घर भिजवाने का रिवाज़ था। मगर यहाँ नये घर में मालती को कुछ भी करने से डर लगता था। घर से बाहर ही नहीं निकल पाती थी। अड़ोस-पड़ोस को देखा भी नहीं था। दीवाली कब आती, होली कब निकल जाती पता ही नहीं चलता। बच्चे छोटे थे उन्हें अभी किसी बात का ज्ञान नहीं था। उन्होंने परिवार, मोहल्ला, सुख का अब तक स्वाद नहीं चखा था।
माँ दर्जनी मोहल्ले में वापस चली गई थी। हाँ, उसे अपने लिये ज़रूरी पैसे की अब कोई खास ज़रूरत नहीं थी। दो व़क्त की रोटी कोई भी दे देगा और नहीं मिली तो मरेगी नहीं और मर भी गई तो अब कोई इच्छा नहीं, कोई मोह नहीं। हाँ, अमित को अपनी माँ की जवाबदारियों का एहसास था। मोहल्ले वाले मालती के आने और अमित की नौकरी से बड़े खुश हुए थे। अधिकतर ने उसे जबलपुर रेलवे अस्पताल में ही आ जाने का सुझाव दिया मगर अमित एक मौका बाहर रहकर भी देखना चाहता था।
अमित, निकिता और बच्चों के साथ भुसावल पहुँच गया था। ताप्ती नदी के किनारे महाराष्ट्र का बहुत ही छोटा शहर। मगर रेलवे के दृष्टि से बहुत बड़ा और प्रमुख जंक्शन। एक तरफ़ मुम्बई तो दूसरी ओर दिल्ली और तीसरी ओर नागपुर। मध्य रेलवे के एक स्वतंत्र डिवीजन का मुख्यालय। डिवीजनल रेलवे मैनेजर स्तर का अधिकारी और उसका कार्यालय यहीं पर स्थित है। मध्य रेलवे के दूसरे डिवीजन, जबलपुर डिवीजन से उसकी सीमाएं मिलती। भुसावल सारे देश में केलों के लिए भी बहुत मशहूर था। आज भी है। अमित को बड़ा-सा रेलवे का बंगला ताप्ती नदी के पास ही मिल गया था। निकिता शुरू-शुरू में बड़ी खुश थी। पीछे सर्वेंट क्वार्टर्स में नौकर भी मिल गये थे। अपने माँ-बाप को हर चीज़ बताती थी। धीरे-धीरे रेलवे अस्पताल में अमित मेहनत करके नाम कमाने लगा। निकिता को बहुत अधिक लोगों का घर आना-जाना पसंद नहीं था। किसी से भी उसकी दोस्ती नहीं हो पाई थी। हर किसी में उसे कोई न कोई खराबी दिखती। अमित के कहने पर उसने किसी प्राइवेट डाक्टर के क्लीनिक में बैठना शुरू कर दिया था। परंतु एक चीज़ घर पर बढ़ती चली गई थी। रोज़ रात निकिता अमित का हाथ कई बार धुलवाती थी। अमित कई बार तंग हो जाता था। परंतु चुपचाप करता रहता। उधर, आकांक्षा से निकिता की नफरत बढ़ती जा रही थी। सामान्य अवस्था में अमित के सामने वह कुछ नहीं कहती। मगर अपनी भावनाओं को कई बार छुपा नहीं पाती थी। हाँ, अनिरुद्ध को बेहद प्यार करती। परंतु जब शून्य में रहती तो कई घंटों तक चुपचाप बैठी रहती। एक नयी बात भी निकिता ने शुरू की थी। पहले सिर्फ अमित फिर बाद में बच्चों से भी वह हर सामान बाएं हाथ से ही लेती थी। दाहिने हाथ से देने पर लड़ती। यहाँ तक कि चार-पाँच साल की आकांक्षा भी समझने लगी थी और अपने छोटे भाई का विशेष ध्यान रखती थी।
निकिता को खाना बनाने का शौक नहीं था। रसोई घर तक में कम ही जाती थी। अपने प्राइवेट क्लीनिक में भी जाना उसे पसंद नहीं था। अमित ने ज़ोर-जबरदस्ती नहीं की थी। निकिता को किसी के भी घर जाना अच्छा नहीं लगता। इतने बड़े बंगले के बेडरूम में ही लेटी रहती। यहाँ तक कि बाहर बड़े ही सुंदर बागीचे में भी कम ही घूमती थी। अमित धीरे-धीरे कोशिश करता रहता मगर उसकी चुप्पी देखकर चुप हो जाया करता था। सारे आसपास के लोग शाम ताप्ती नदी तक टहलने जाते मगर निकिता घर में और अमित अस्पताल रहने में ही खुश रहता था। पीछे के सर्वेंट्स कवार्टर्स में रहने वाली महाराष्ट्रीयन बाई घर पर खाना बना जाती। कई बार निकिता उसे अंदर ही नहीं आने देती और फिर कई दिन तक खाना नहीं बनता। अमित कई बार अस्पताल भूखा ही जाता पर बच्चे परेशान हो जाते थे। अमित धीरे से छुपकर उन्हें बिस्किट दूध दे देता। घर में सूखी खाने की चीज़ें खूब रखने लगा था। घर का सारा काम उसी को देखना पड़ता था। रसोई का सामान भी लाना उसी के ज़िम्मे था। आकांक्षा को नहलाने-धुलाने की जवाबदारी भी उसी की थी। मालती के साथ न होने से बच्चों की स्थिति बिगड़ती जा रही थी। कुछ दिनों बाद ही निकिता को रात-रात भर नींद नहीं आने लगी। पूरी रात नहीं सोती। एक दिन उसने अमित से कहा था,
''आकांक्षा बड़ी हो गई है। हमें प्यार करने में दिक्कत होती है उसे हमें दूसरे कमरे में सुलाना चाहिए।''
अमित उसे समझाने लगा था... बहुत छोटी है फिर रात तो बच्चे गहरी नींद में सो जाते हैं। उन्हें तो होश भी नहीं रहता। फिर दोनों में प्यार करने की बारी भी अब कम ही आती थी। मगर निकिता के दिमाग़ पर नकारात्मक सोच हावी होती जा रही थी। एक रात चिल्लाने लगी,
''इसको दूसरे कमरे में सुलाओ। यह मुझे मार देगी।'' अंत में उसकी ज़िद्द को मानना पड़ा था। बगल के कमरे में एक बिस्तर लगाया था।
आकांक्षा बहुत छोटी और मासूम थी, सहम गयी। अंग्रेजों के ज़माने के बड़े-बड़े बंगलो के विशाल कमरे में अकेले कैसे सोती? बुरी तरह डर गयी। पहले तो अपनी माँ के भय से रो नहीं पा रही थी। मगर उसको कमरे में अकेला छोड़कर पिता को बाहर जाता देख चीख पड़ी। अमित ने वापस कमरे में दौड़कर उसे अपने बाँहों में ले लिया था। देखा तो आकांक्षा सहमी हुई थी। मासूम नज़रों से उसने पिता को देखा था। अमित को लगा कि फूल-सी बच्ची अपने बाप की मजबूरियों को समझने की कोशिश कर रही है। भावुक होकर उसने निश्चय किया कि वह आकांक्षा के पास ही सो जाया करेगा। मगर दूसरी रात निकिता ने हंगामा मचा दिया था,
''अपनी लड़की से प्यार है। मैं मर जाऊँ इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता।''
उठकर आकांक्षा को पीटने दौड़ी थी। दूसरे दिन ही अमित ने परेशान होकर माँ को बुलवा लिया था। कम से कम आकांक्षा की देखभाल तो कर लेगी, उसके साथ रात को सो तो सकती है, फिर घर पर बच्चों को खाना तो मिलेगा। माँ के आने पर कुछ राहत मिली थी। मगर निकिता की स्थिति बिगड़ती चली गयी। तंग आकर अमित ने एक दिन अपने ही अस्पताल के साइकॉइट्रिस्ट डाक्टर से बात की थी।
डाक्टर आनंद भला आदमी था। सब कुछ सुनने के बाद घर पर ही मिलने के बहाने से आ गया था। निकिता को चाय पीने के लिए साथ बैठा लिया था फिर मौका देखकर अमित कमरे के बाहर चला गया। डाक्टर ने अपने तरह से बात करने की कोशिश की थी और फिर दो-तीन दिन तक लगातार आता रहा था। फिर एक दिन मायूस होकर कहने लगा,
''थॉट डिसऑडर है। शी इज़ स्किजोफिरनिक। लंबा इलाज़ चलेगा।''
जाते-जाते कम्पोज और सेडिस्टिव का लंबा कोर्स बता गया था। अमित की ज़िंदगी तबाह हो चुकी थी, आकांक्षा और अनिरुद्ध को देखकर वह बेहद परेशान हुआ था। डाक्टर आनंद ने बहुत-सी बातें बता दी थीं,
''बड़े प्यार से हैंडल करना पड़ेगा। और हाँ जितने लोग हैं उनसे भी यही कहना कि ठीक वातावरण दें।''
डाक्टर आनंद से बातचीत में अमित ने निकिता के पिता का एंटी डिप्रेशन्ट लेने का ज़िक्र किया था। साथ ही घर के बारे में जहाँ तक संभव था जानकारी देने की कोशिश की थी। शायद कोई दवाई सुनिश्चित करने में फ़ायदा हो। साथ ही निकिता के जुड़वां बहन की चर्चा भी की थी। डाक्टर आनंद ने बताया था कि ऐसे मरीज़ों के घर-परिवार में हिस्ट्री होने की संभावना ज़्यादा होती है। डाक्टर आनंद ने साथ में यह भी समझाया था कि निकिता के घर वालों को भी सजग रहना होगा। वह निकिता से समझदारी से पेश आयें। अमित सब कुछ सुनकर परेशान हो गया था... कैसे करेगा? सारी ज़िंदगी पड़ी है। सब कुछ अकेले करना है। आकांक्षा अनिरुद्ध बड़े हो रहे हैं मगर उनकी देखभाल नहीं हो पा रही थी। कई बार दिनभर रोते और भूखे रहते थे जबकि निकिता अपनी धुन में दवाई के असर में सोती रहती थी। सास-ससुर से उसे कोई उम्मीद नहीं थी। निकिता अक्सर अपने माता-पिता से बात करने के बाद उससे लड़ा करती थी। पता नहीं ऐसी क्या बात करते थे। उधर, माँ का भी दिल नहीं लगता था वह भी अक्सर जबलपुर चली जाती थी। अमित ने बहुत सोच-विचार करके, पहले प्रमोशन पर, डीएमओ बनने पर, जबलपुर रेलवे अस्पताल में ही ट्रांसफर ले ली थी। अपना शहर है। कुछ तो लोग हैं। जान-पहचान भी है। फिर माँ भी साथ रहेगी। उसका भी जब मन नहीं लगेगा तो बीच-बीच में अपने मोहल्ले भी आ जा सकती है। बच्चों का भी ध्यान हो जायेगा। वहाँ मेडिकल कालेज भी है ट्रीटमेंट भी बेहतर हो सकता है।
...सब कुछ सोच-विचार कर अमित वापस जबलपुर आ गया था। ...और आज उसी रेलवे अस्पताल में, इतने सालों बाद खुद भर्ती भी हो गया। ...अमित ने आँखें खोली तो देखा अदिति, आकांक्षा और अनिरुद्ध से बातें कर रही है। बाहर अंधेरा फैल चुका था, शाम ढल चुकी थी। उसके शरीर के हिलने की आवाज़ ने तीनों का ध्यान आकर्षित किया था और वे उसकी ओर आगे बढ़े थे। उसने आकांक्षा को अपने नज़दीक बुलाकर लेटे ही लेटे बहुत प्यार किया था। अनिरुद्ध को पास बुलाया और उसे भी प्यार किया था।
''माँ कैसी है?''
''ठीक है।'' अनिरुद्ध ने आँखें नीची करते हुए कहा था।
''तुम बड़े हो गये हो, ध्यान रखा करो।''
''जी''
''अब तुम दोनों घर जाओ, लेट हो रहे हो। मैं ठीक हूँ। सुबह दोनों स्कूल जाना, रोज़ की पढ़ाई रोज़ ज़रूरी है। चाहो तो स्कूल से यहाँ आ सकते हो।''
अमित ने दोनों को घर भेज दिया था। अदिति देखकर बहुत खुश हुई थी।
''बहुत प्यार है बच्चों से...'' कहते हुए उसकी आँखों में मुस्कुराहट थी।
''हूँ।''
''कैसे हो?''
''ठीक हूँ।''
''माँ काफी चिंता कर रही थीं। मालती आँटी की भी याद कर रही थीं। सब ठीक हो जाएगा। चिंता मत किया करो।''
अदिति ने अमित के सिर पर हाथ फेरा था। अमित समझ नहीं पाया था कि ये हाथ डाक्टर के थे या एक दोस्त और हमदर्द के, पर स्पर्श उसे अच्छा लगा था।
''...तुम ज़्यादा सोचा न करो। सब ठीक हो जायेगा, आजकल तुम जल्दी परेशान हो जाते हो। कल रात को भी लगता है ज़्यादा परेशान थे।''
अदिति बातचीत से उसे विश्वास दिलाना चाह रही थी।
''...मुझे देखो एकदम अकेली हूँ, वो भी विधवा माँ के साथ। कितनी मुसीबतें आई पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। ...मेरे पास क्या है, भविष्य के लिए तो कुछ भी नहीं। पर परेशान नहीं होती। ...लड़ नहीं रही हूँ, जी रही हूँ।''
अदिति भावनात्मक रूप में एकदम से उसके नज़दीक आ गई थी। अच्छे इंसान की तरह भावुक होकर, दार्शनिक हो गई थी। फिर एकदम से बात बदलते हुए कहने लगी,
''...तुम्हारे बच्चे तुम्हारा भविष्य हैं, बड़े प्यारे हैं। लगता है अपनी दादी से बहुत जुड़े हुए थे। बहुत प्यार था उनसे। उन्हें याद कर रहे थे। मालती चाची थी भी बहुत अच्छी, एकदम माँ समान। शांत, प्रेम और गहराई से लबालब। उनके संदर्भ में कभी, तुमने मुझे बताया ही नहीं। ...चाहे मैं कहीं भी थी, मुझे बताना तो चाहिए था।''
यूँ ही बात करते-करते अदिति ने देखा ड्रिप खत्म हो रही थी। रात को ज़रूरत नहीं है। इसलिये निकलवाकर सिस्टर से अमित का ध्यान रखने के लिए कहा था। सुबह चाय लेकर आने की बात कहकर जाते-जाते कहने लगी,
''आराम करो और बिल्कुल मत सोचना।''

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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