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बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 40
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
शुक्रवार , , 18 अप्रेल
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



आकांक्षा व अनिरुद्ध भावनात्मक रूप से अपनी दादी से बहुत करीब थे। परंतु दोनों को अंत तक समझ नहीं थी कि वह किस रूप में अपनी दादी से जुड़े हुए हैं। अनिरुद्ध जहाँ दादी से लड़ता, रूठता यहाँ तक कि कुछ भी कहने का हक़ रखता था वहीं दादी को उसकी लड़ाई में भी प्यार दिखाई देता।
अजीब से रिश्ते हैं, अजीब-सी पहचान और अजीब-सा एहसास। एक ही तरह की भावना, एक ही तरह के वाक्य, अलग-अलग संबंधों में अलग-अलग तरीक़े से लिये जाते हैं और महसूस किए जाते हैं। छोटी उम्र में कॉनवेंट स्कूल के सालाना सांस्कृतिक कार्यक्रम में आकांक्षा भी अब की बार हिस्सा ले रही थी। वह चाहती थी कि उसे उसका सारा परिवार देखे और उस परिवार में उसकी दादी उसका स्वाभाविक हिस्सा थी। छोटी थी, फिर बच्चे तो कभी-कभी ज़िद्द कर ही लेते हैं। आकांक्षा की यह पहली ज़िद्द थी। हटकर बैठी,
''दादी क्यूँ नहीं आएगी? पापा, दादी ज़रूर आएगी।''
''बेटा, दादी कैसे आ सकती है, उनकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती।''
''नहीं, नहीं, ठीक तो रहती है। क्यों दादी?'' उसने दादी की ओर आशाभरी निगाहों से देखकर कहा तो दादी मुस्कुरा रही थी।
''मम्मी ! दादी ज़रूर आएगी।'' और फिर माँ को देखकर बचपना कर बैठी। पहली बार उसने कोई ज़िद्द की थी। निकिता की तबीयत कुछ-कुछ ठीक चल रही थी। दवाई का असर था।
कमरे के कोने में ले जाकर दादी ने आकांक्षा को यह समझाने की कोशिश की थी। '...उसे तो अंग्रेजी समझ में आती नहीं, ऊपर से उसके दोस्त उसकी दादी को देखकर उसके प्रति रूखा व्यवहार करेंगे।' मगर आकांक्षा अपनी दादी के प्यार में अंधी थी। बस ज़िद्द करती रही।
''आप समझाते क्यों नहीं। माँ क्या करेगी जाकर? क्या घर से सब का जाना ज़रूरी है?''
निकिता की आवाज़ तेज़ी पकड़ रही थी। आँखों की सुंदरता अव्यवस्थित होने के कगार पर थी। अमित जान गया था कि निकिता का मन बिगड़ गया तो स्थिति बिगड़ सकती है। फिर सँभालना मुश्किल हो जाएगा। कम से कम वह तो स्कूल जा रही है। कहीं सारा खेल न बिगड़ जाये। निकिता के कहने पर उसने आकांक्षा को ज़ोर से डाँटा और उसके न मानने पर एक तमाचा जड़ दिया था। आकांक्षा एकदम से सहम गई थी। सारी ज़िद्द हवा हो गई थी। उसे कुछ समझ ही नहीं आया कि कहाँ ग़लती हो गई, डरी-सी चुपचाप माँ और पापा के साथ पीछे-पीछे चल दी। अनिरुद्ध साथ था। जाते-जाते अपनी दादी को डरी हुई मासूम आँखों से देखा था। अपने स्कूल के पहले और आख़िरी कार्यक्रम में ही उसका अस्तित्व खत्म हो गया था। स्टेज पर सब भूल गई थी। लोग हँसते रहे। कार्यक्रम बिगड़ गया था। रास्ते में समझाने की बजाय, निकिता ने खूब उल्टा-सीधा कहा और डाँट लगायी थी, '...मैंने तो पहले ही कहा था ऐसी बेकार लड़की मेरी हो ही नहीं सकती, तुम लोगों जैसी ही है।' आकांक्षा के अंदर हीन भावना उसी दिन घर कर गई थी। अमित कई दिनों तक सुनिश्चित नहीं कर पाया कि वह कहाँ ग़लत था। मगर तमाचे के लिए उसने अपने आप को कभी माफ नहीं किया था।
कई बार माँ स्वयं परेशानी को दूर कर दिया करती थी। मगर उस दिन सब के घर वापस आने पर उनके चेहरे पढ़ नहीं पायी। घर में आते ही आकांक्षा को सर्वप्रथम अपनी बाहों में लिया और कहने लगी,
''आज तो कमाल हो गया होगा, आज तो हर जगह आकांक्षा! आकांक्षा! आकांक्षा! हो रहा होगा।'' आकांक्षा को स्कूल में पहली बार कुछ कार्यक्रम करने का मौका मिला था। यही सोचकर वह कह रही थी। उसके बेटे, बहू और पोता-पोती बाहर कार्यक्रम से आ रहे हैं इससे बढक़र खुशी की बात उसके लिए क्या हो सकती थी। बात बढ़ाते हुए कहने लगी,
''...हीरो कौन था?''
दादी की नटखट आवाज़ ने उसको छेडऩे की कोशिश की थी। बुढ़ापा बचपन का प्रतिबिंब होता है। वैसे तो दादी और आकांक्षा अब तक अच्छे दोस्त बन चुके थे। मगर दादी अब तक समझ नहीं पाई थी कि आकांक्षा इतनी शांत और उदास क्यूँ है? वह तो सब की खुशी में शरीक होना चाह रही थी। बोलती रही,
''अच्छा चल बता, तूने क्या-क्या किया? कैसे-कैसे किया?'' बातों को सँभालते हुए दादी कह रही थी। कुछ देर सुनने के बाद निकिता अचानक अपने कमरे से आकर चिल्लाने लगी,
''यहाँ बैठकर बच्चों को यही सिखाती रहती हो। धीरे-धीरे सारे मेरे दुश्मन बना देना। वैसे ही ये तो मेरी बेटी है ही नहीं। पर तुम लोगों के खानदान की वज़ह से मेरी इज़्ज़त आज मिट्टी में मिल गयी। पड़ोस में बैठी औरत मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी। तुम्हीं लोगों ने कहा होगा उसे मेरा मज़ाक उड़ाने के लिए। बाहर खड़ा चपरासी भी मुझे घूर रहा था। तुम्हीं लोगों ने बताया होगा उसे मेरे बारे में।'' यह कहते हुए निकिता बुरी तरह से पकड़कर आकांक्षा को पीटने लगी।
मालती एकदम से सन्न रह गई थी। आकांक्षा बेहोशी की हालात तक पहुँच गई थी। उसके चेहरे और शरीर पर अपनी माँ की उंगलियों के निशान थे तो भय का प्रभाव दिल और दिमाग़ पर पक्के रूप में अंकित हो चुका था। अमित ने निकिता के पास से खींचते हुए आकांक्षा को बचाया और किसी तरह से बात सँभाली थी। आकांक्षा फिर कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाई थी और कई रात सो भी नहीं पाई थी। उसे खुशियों से डर हो गया था। अमित कई दिनों तक आकांक्षा को देख-देख कर अंदर ही अंदर रोता रहा। दादी, पोती की सहमी हुई आँखों को देखकर पूरी तरह टूट चुकी थी।
कुछ महीनों के बाद अनिरुद्ध के स्कूल में स्पोट्‌र्स होने थे। अनिरुद्ध भी उसमें हिस्सा ले रहा था। स्पोट्‌र्स के दिन अनिरुद्ध भी ज़िद्द कर बैठा था। छोटा था, बहन का हादसा समझ ही नहीं पाया था और न ही याद था। कहने लगा,
''दादी तू ज़रूर आएगी। देख, खेल में तो अंग्रेजी का चक्कर भी नहीं है। मैं दौड़ में हिस्सा ले रहा हूँ।''
''तो मुझे कौन दौडऩा आता है।'' दादी ने टरकाने के लिए धीरे से कहा था।
 ''तू देख तो सकती है कि मैं कितना अच्छा दौड़ रहा हूँ।'' अनिरुद्ध छोटा था और ज़िद्दी। ''नहीं बेटा तबीयत भी ठीक नहीं है।'' मालती आकांक्षा की हालात को भूल नहीं पाई थी। उस सदमे से निकल नहीं पाई थी। उसी रात से अब उसकी तबीयत ठीक भी नहीं रहती थी। उधर, निकिता अनिरुद्ध से बहस नहीं करना चाहती थी। वह जानती थी कि अनिरुद्ध की ज़िद्द उसके लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है। साथ ही उससे उसका, बेटों वाला स्वाभाविक लगाव भी था। अनिरुद्ध की खुशी के लिए कहने लगी,
''बच्चों की खुशी में आपको तो मज़ा ही नहीं आता, अब कह रहा है तो जाने में पता नहीं क्या तकलीफ़ है।''
माँ आज तक समझ नहीं पाई थी कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। हर चीज़ में उल्टा ही होता है। फिर उसे क्या पता कि निकिता के दिमाग़ में अब क्या चल रहा है। जबरदस्ती गई थी स्कूल। मगर कुछ भी बात नहीं कर पाई थी। पता नहीं कौन-सी बात निकिता को बुरी लग जाये और फिर उसे अव्यवस्थित और अनियंत्रित कर दे। चुपचाप बैठी रही। लौटने पर अनिरुद्ध कार में पीछे दादी और बहन के बीच में खुश बैठा था, उसके हाथ में दौड़ में हिस्सा लेने का सर्टिफिकेट था, वही उसके उत्साह को बढ़ाने के लिए काफी था। फिर घर के सब लोग साथ हों तो उसे अच्छा लगता था, निकिता आगे बैठे-बैठे खिडक़ी से झाँकते हुए बुदबुदा रही थी,
''किसी को ये भी नहीं पता कि बच्चों की खुशी में खुश कैसे होते हैं। बस मुँह सूजा कर बैठे हैं।'' माँ चुपचाप सुनती रही थीं अमित सुनकर अनसुना कर रहा था। आकांक्षा सहमी-सी थी और अनिरुद्ध को समझ कम थी, वह अपनी छोटी-सी खुशी में मस्त था।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
टिप्पणियाँ (1)add
...
द्वारा प्रेषित sumit , अप्रेल 20, 2008
what to say,i am moved with the story.the scene are so simple that it become real...great going on....
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