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बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 41 |
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उपन्यास
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सोमवार , , 21 अप्रेल |
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मनोज सिंह
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''पता नहीं कब छुटकारा मिलेगा।'' ये शब्द अमित के दिलोदिमाग़ को बुरी तरह से झकझोर रहे थे। स्पष्टवादिता बहुत अच्छी चीज़ है, परन्तु बहुत से सत्य बोले नहीं जाते, बहुत-सी बातों से आदमी जानकर भी अनजान बना रहता है। कहीं-कहीं भावनाओं को दिल के अंदर छुपाना भी होता है। इसी में है संबंधों की मर्यादा और विकसित समाज की नींव।
जो बंधन दिल से किए जाएँ, और अगर उसमें मन की भावनाएं जुड़ी हों, तो वो प्रेम में परिवर्तित हो जाता है। उसमें आदमी आनंद महसूस करने लगता है। जिस बंधन में ज़बरदस्ती होती है तो वो कष्टदायी होता है। फिर उसमें और कैद में कोई फ़र्क नहीं होता। बस बंधन की परिभाषा और बंधकों की सीमाएं बदलती रहती हैं।
अमित निकिता की मानसिक अवस्था जानता था और दिये गये हर दुःख, हर गम को किस्मत का दिया मानकर सहर्ष स्वीकार किया था, पर सहने की भी कोई सीमा होती है। अमित और मालती स्वाभाविक रूप से सहनशील थे। यह उनका नैसर्गिक गुण था। मगर गुण परिस्थिति, स्थान और काल पर निर्भर करता है। अन्यथा वह अवगुण बन जाता हैं। गुण और अवगुण में, दोष-अदोष में, इतना ही फर्क होता है कि वह कहाँ, कैसे और किसलिए उपयोग किए जा रहे हैं और साथ ही किस भावना से। निकिता की बीमारी सत्य हो सकती है, परन्तु क्या उसे अन्य के अस्तित्व के मोल पर स्वीकार किया जा सकता है? वह अंत तक माँ से भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाई थी। सास को माँ-बाप की तरह स्वीकार करे ऐसी उम्मीद वह नहीं करता था। मगर हर बार बीमारी में निकिता माँ को दुश्मन के रूप में ही क्यूँ देखती है। इसका भी उसके पास जवाब नहीं था। अमित आज तक नहीं समझ पाया था कि निकिता बीमारी में भी अपने घर वालों के साथ दुर्व्यवहार क्यूँ नहीं करती।
सेवा तो उसने माँ की कभी नहीं की थी, पर ठीक-ठाक ढंग से बात भी अब कम ही करती थी। परंतु आज कही गई यह लाइन तो उसके मन की भावना को प्रदर्शित करती थी। माँ की तबीयत अधिक खराब हो रही थी। बिस्तर और कपड़े दस्त से गंदे हो चुके थे। रात अधिक हो चुकी थी। पीछे से लक्ष्मी को बुलाना ठीक न समझ कर उसी ने आकांक्षा के साथ मिलकर सफ़ाई की थी और माँ के कपड़े बदलवाये थे। थोड़ा व़क्त लग गया था। निकिता को नींद नहीं आ रही थी, बिस्तर पर लेटे-लेटे ही अमित का इंतज़ार कर रही थी। उसके आते ही बड़बड़ाने लगी। परिपक्वता दिखाते हुए अमित ने इस बारे में कोई भी बात करना उचित नहीं समझा था। फिर इसका कोई फ़ायदा भी नहीं होना था। वह जानता था कि इस बात से घर में कोलाहल मच जाएगा। वैसे भी अगर सामने वाला कोई ग़लत बात कर रहा है तो उसकी बराबरी करना शायद समझदारी भी नहीं है और ऐसा प्रायः समझाया भी जाता है। निकिता की बीमारी और मानसिक अवस्था में वह इस बात को आज तक सुनिश्चित नहीं कर पाया था कि उसकी बुरी भावना का, कही गई ग़लत बातों का विरोध करना चाहिए या नहीं। क्या उन्हें सदैव चुप रहकर सहना चाहिए? पर सवाल यह भी उठता था कि जब सामने वाला आपकी बातों को सुन ही नहीं रहा, तो आपका कहना, नहीं कहना कोई मायने नहीं रखता। जब बुद्धि का विकास ज़्यादा हो जाता है या बिल्कुल भी नहीं होता, दोनों अवस्थाओं में आप दूसरों के विचारों को सुनना और समझना कम पसन्द करते हैं। और जब कोई पसंद नहीं करता तो सामने वाला कितना भी सत्य कह रहा हो, वह उसे स्वीकार नहीं करता।
बंधन को स्वीकार करने की कई अवस्थाएं हैं। एक अवस्था जिसमें आप उस बंधन को बंधन नहीं मानते उसे अपने जीवन का एक हिस्सा मानते हैं। जब आप यह भी नहीं सोच पाते कि यह बंधन है तो आपको उसमें कोई कष्ट नहीं होता। एक बंधन वो है जिसमें आप भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। वहाँ आपको बंधन अच्छा लगने लगता है। उसमें दिल कार्य करता है, दिमाग़ काम नहीं करता। माँ-बाप के प्रति प्यार, अपनों से जुड़े हुए लोगों से प्यार और यहाँ तक देखा गया है कि बचपन का लम्बा साथ आपको भावनात्मक रूप से बंधन में बाँध देता है और वह धीरे-धीरे अपरिभाषित प्रेम में पिरवर्तित हो जाता है। एक बंधन की अवस्था होती है जब आदमी उसे बुद्धि से स्वीकार कर लेता है। उसमें भी कष्ट कम होता है, परन्तु भावनात्मक लगाव नहीं होता। आजकल के ज़्यादातर ऑफिस में, मोहल्लों में, दूर के रिश्तेदारों में इसी तरीक़े का लगाव होता है।
एक बंधन की अवस्था वो होती है, जब आदमी अपने आपको मजबूरी में बंधा हुआ महसूस करता है और उस अवस्था से सदैव निकलना चाहता है, कोशिश करता है। तो फिर बंधन, बंधन न होकर कैद हो जाता है।
निकिता का तो कोई बंधन ही नहीं था। उसका तो दिमाग़ ही उसके वश में नहीं था।
माँ का शरीर पूर्ण रूप से जवाब दे चुका था। दाँत टूट चुके थे और पाचन शक्ति ने काम करना लगभग बंद कर दिया था। धीरे-धीरे उसने बिस्तर पकड़ लिया था। कमज़ोरी के कारण कभी-कभी चिड़चिड़ाहट भी आ जाती थी। भूख खत्म हो चुकी थी।
इकलौता बेटा होने के कारण, माँ, अमित को छोड़ भी नहीं सकती थी। ऐसी हालात में कहाँ जाती, वहीं दूसरी ओर उसके कारण घर में बहुत काम बढ़ता जा रहा था। बिस्तर पर ही पतले दस्त हो जाते थे। अब तो यह रोज़ सुबह की दिनचर्या हो गई थी। अस्पताल में भी अधिक दिन रखना संभव नहीं था। कोई बीमारी हो तो उसका इलाज़ किया जा सकता है। मगर जब कोई बीमारी ही नहीं तो क्या किया जाये। मालती की इच्छा शक्ति, जीने की तमन्ना खत्म हो चुकी थी। इसीलिए शरीर ने भी साथ छोड़ दिया था। दवाइयों का असर भी नहीं हो रहा था। घर पर लक्ष्मी रोज़ सुबह आकर बिस्तर साफ़ कर देती थी। परन्तु कई बार आकांक्षा को भी यह सब करना पड़ता था। अमित डाक्टर होने के नाते, बेटा होते हुए भी, सब कुछ जानता और समझता था। परन्तु निकिता दिल से लगाव न होने की वज़ह से, ऊपर से मानसिक बीमारी के कारण कई बार ऐसी लाइनें बोल देती थी। कभी-कभी माँ की बीमारी पर भी एक नया वाद-विवाद का मुद्दा बना देती थी।
और उस दिन निकिता ने फिर से बड़बड़ाते हुए माँ के लिए कह दिया था,
''अच्छा होगा, ...अगर चले जाएं।''
जब तक माँ के शरीर में दम था तब तक निकिता ने ऐसा व्यवहार कभी नहीं किया था। अमित ने माँ में सदैव समर्पण, समझौता के साथ-साथ कभी-कभी विरक्ति भी देखी थी। पर अब उसने महसूस किया था कि माँ भी इस कष्ट से बचना चाहती थी, इस नरक से छूटना चाहती थी। अमित माँ के कष्ट को देख-देख कर दुःखी था। बचपन में उसके बीमार होने पर, माँ कैसे सारी रात बैठी रहती थी। जब तक वह पूर्ण रूप से ठीक न हो जाता तब तक उसकी सेवा करती रहती। अमित अपने भविष्य को सोच-सोच कर बहुत ज़्यादा भयभीत होता रहता था। यह विचार उसके मन में कई बार आता कि बच्चों की छोटी उम्र में माँ-बाप का जवान होना, देखभाल करना और माँ-बाप के बूढ़े होने पर बच्चों का जवान होना, शायद प्रकृति का इंतज़ाम है एक-दूसरे की देखभाल करने का। जिसे आज की आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों ने खराब कर दिया है। आज चाहते हुए भी वह अपनी माँ की सेवा नहीं कर पा रहा था। जब भी करने की कोशिश करता निकिता बोल पड़ती, '...माँ है, औरत हैं तुम्हें शरम नहीं आती।' इस तरह की बातों से घर का माहौल भारी-भारी सा हो जाता था। चूंकि अनिरुद्ध भी दादी के प्यार में बड़ा हुआ था, इसलिए दादी के पास हमेशा जाना चाहता, परंतु सदैव सफ़ाई और बीमारी का बहाना बनाकर निकिता उसे थोड़ा दूर ही रखने की कोशिश करती थी। फिर भी वह कभी-कभी दादी के पास ज़िद्द करके चला ही जाता। कई बार दादी को अपने पोते को प्यार करने की इच्छा बलवती होती, परंतु जब वह पास नहीं आ पाता, तो कुछ कह तो नहीं पाती पर आँखों के आँसू अपना काम कर जाते।
आकांक्षा ने भरपूर सेवा की थी। दादी के पास सदैव साये की तरह रहती। बच्चों के जैसे उनकी देखभाल करती। दादी ने आकांक्षा के लिए उसके बचपन में जो किया यह उसका पुनरागमन था सिर्फ रोल बदल गये थे। मालती, जब भी आकांक्षा को अपने दस्त से सने कपड़े और शरीर को साफ़ करते असहाय रूप में देखती, तो जी भरकर दुआ देती। धीरे-धीरे बिस्तर से उठने की ताकत भी खत्म हो गई थी। आकांक्षा के स्कूल जाने पर दादी को बहुत तकलीफ़ होती थी। निकिता के डर से कुछ बोलती तो नहीं मगर उसकी अंतड़ियों को निकिता का कोई डर नहीं था। वे तो अपना काम कर जाते। घंटों आकांक्षा के आने तक मालती को उसी तरह दस्त में लेटे रहना पड़ता। पढ़े-लिखे होने का हवाला देते हुए भावनात्मक रूप से अमित ने इस बात की कई बार निकिता से चर्चा करने की कोशिश की थी... 'किसी वार्ड ब्वॉय को घर पर रख लेते हैं' परन्तु निकिता ने हर बार इस बात को टाल दिया था और कुछ भी करने या कहने से इंकार कर दिया था। निकिता की मानसिक अवस्था इस बात को मानने को तैयार ही नहीं थी कि इस प्रकार की परेशानियाँ उसे भी हो सकती हैं। अमित दिल से नहीं चाहता था कि किसी और को भी यह परेशानियाँ भुगतनी पड़े। परन्तु यह ज़रूर चाहता था जीवन में हर एक को दुःखों का एहसास ज़रूर होना चाहिए। साथ ही साथ उसके मन में यह प्रश्न भी उठता कि दुनिया में जाने से ठीक पहले ही इस तरह के दुःख क्यों आते हैं? यह दुःख जीवन के आरंभ में क्यों नहीं आते? अगर ये कष्ट पहले ही आ जायें या पता लग जाये तो दूसरों को दुःख देने की इंसान की प्रवृत्ति में शायद कुछ कमी आ जाएगी। कम से कम दूसरों की परेशानियों को इंसान बेहतर समझ पाएगा।
निकिता की अपनी सास के लिए पूर्वाग्रह की कोई भी वज़ह अमित को समझ नहीं आई थी। निकिता के लिए उसके माँ-बाप ने जो भी किया होगा वह प्राकृतिक था, मगर सास मालती ने जो कुछ भी किया वह सामाजिक दायित्व से बढक़र था। मालती ने सदैव बहू और पोता-पोती को अपने बच्चों के जैसे पाला था। अमित को इसका कोई भी जवाब नहीं मिलता था कि एक पढ़ी-लिखी औरत भी एक साधारण औरत के जैसा क्यूँ बर्ताव करती हैं? फिर अगर उसका दिमाग़ अव्यवस्थित है, बीमार है तो फिर उसकी अपने सास के प्रति नफरत क्यूँ नहीं अव्यवस्थित हो जाती? वह कैसे साधारण अन्य लोगों की तरह ही तीव्र और तीक्ष्ण है।
माँ द्वारा कभी-कभी कहना कि मुझे इस कष्ट से किसी भी तरीक़े से छुटकारा दिलवाओ। वह, उनकी इस असीम पीड़ा को उनके आँखों से गिरने वाली आँसू की बूँद से समझने लगा था। डाक्टर होते हुए जानता था समझता था, मगर बेटा होते हुए मान नहीं पाया था कि अब माँ का यहाँ से, इस दुनिया से चले जाना, उनके खुद के हित में है। वह उनको अपने मोह के बंधन से छोड़ पाता इसके पहले ही वह खुद, बेटा बहू से ज़्यादा पोता-पोती के मोह के बंधन से छूटना चाहती थीं ...और एक दिन वह मुक्त हो गईं।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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