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बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 42
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
मंगलवार , , 22 अप्रेल
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



''देखना, ये दोनों आज खाना नहीं खा रहे हैं।'' माँ की प्यार भरी शिकायत बाथरूम के अंदर तक अक्सर आती रहती थी।
''दादी मुझे भूख नहीं है।''
''क्या हुआ? तुमने कल रात भी खाना नहीं खाया था।''
आकांक्षा काफी धीरे मगर प्रेमपूर्वक बोलती,
''दादी जब भूख नहीं है तो मैं कैसे खा सकती हूँ?''
''देख! मुझे बहुत काम है।''
 ''तो मैंने आपको कब रोका, मैंने तो आप से कुछ भी नहीं कहा।''
आकांक्षा, माँ और अनिरुद्ध की नोक-झोंक घर में आम सुनाई देती रहती थी। आकांक्षा कुछ-कुछ बड़ी हो रही थी और अपनी दादी से उसकी ज़िद्द बढ़ती जा रही थी। उनके कमरे में उनकी नोक-झोंक चलती रहती।
दादी अनपढ़ होने के वाबजूद, लड़कियों के इस उम्र में होने वाले स्वभाव में परिवर्तन को बहुत अच्छी तरह से जानती और समझती थी। अमित ने महसूस किया था कि माँ का आकांक्षा के साथ व्यवहार दादी-पोती की जगह एक दोस्त का होता जा रहा है। माँ जहाँ धीरे-धीरे एक अच्छे दोस्त होने का सबूत दे रही थी, वहीं पर आकांक्षा अपने युवावस्था में पहुंचने की उपस्थिति दर्ज करा रही थी। उसके स्वभाव में होने वाला परिवर्तन अमित से ज़्यादा दादी समझती थी। निकिता को तो किसी बात का होश ही नहीं था। उसकी तो अपनी अलग दुनिया थी।
हाँ, दादी का पोते के प्रति उसका लगाव, आकर्षण, और प्रेम थोड़ा अलग तरीक़े से प्रदर्शित होता,
''और अनिरुद्ध तुमने दूध क्यों नहीं पिया?''
''दादी! तुम मेरे पीछे क्यों पड़ जाती हो।''
''बेटे! देखो इससे कमज़ोरी हो जाएगी, तुम्हें कल स्कूल में क्रिकेट का मैच भी खेलना है।''
''कोई बात नहीं, मैं नहीं खेलूंगा।''
''क्या बात है? कुछ बताओगे भी तो सही।''
दादी ने दोनों बच्चों के सामने प्रेमपूर्वक समर्पित होते हुए कहा था, परन्तु दोनों टस से मस नहीं हुए थे। अमित अक्सर यह समझ नहीं पाता कि उसे इस व़क्त किस तरह का रोल अदा करना चाहिए। बचपन में अपने बलपूर्वक हठ को वह याद करता था। माँ के साथ कुछ उम्र तक वह भी ज़िद्द किया करता था, परन्तु ऐसा याद आता है कि पिता के सामने हिम्मत नहीं होती थी। उनका अनुशासन उसे आज भी थोड़ा-थोड़ा याद आ जाता था। मगर साथ ही महसूस करता कि उस अनुशासन में भी कहीं न कहीं प्रेम हुआ करता था। परन्तु आज अमित अपने आपको उनसे कुछ अलग पाता, पिता का वह रोल और रूप कहाँ रह गया। ऐसा कहते हैं, समाज ने, परिवार ने विकास किया है। परंतु विकास की परिभाषा उसके समझ से बाहर थी। आज बच्चों को उस तरह से अनुशासन में नहीं रखा जाता। लेकिन प्रेम की कमी तो उस युग में भी नहीं थी तो क्या फिर सिर्फ विचार और सोच बदल गये हैं।
''मैं अभी तेरे पापा से कहती हूँ।''
दोनों बिना डरे झट कह देते, ''ठीक है, कह दीजिए।''
दादी की प्यारभरी शिकायत पर वह अक्सर दोनों बच्चों से कहता था,
''आकांक्षा यह ज़िद्द शायद ठीक नहीं। क्या बात है बेटा? क्या परेशानी है?''
''पापा मुझे भूख नहीं, दादी ज़िद्द करती हैं।'' अनिरुद्ध बचपन से ही शैतान था। हमेशा दादी की शिकायत करने लगता।
''माँ एक काम करो, इन दोनों को आज हॉस्पिटल भेज देना। मेडिकल चैकअप करा दूँगा। सुई लगवा दूँगा।'' अमित की आवाज़ कड़क मगर आँखों से प्यार बरसता।
''देखिए पापा आप मज़ाक मत कीजिए।'' दोनों बच्चे छोटी उम्र में एक हो जाया करते थे।
 ''मैंने क्या कहा आप से, अगर इंजेक्शन नहीं लगवाना है तो दादी की बात मान लो।'' आकांक्षा ज़्यादा बहस नहीं करती और अनिरुद्ध पर पिता का थोड़ा बहुत डर, कभी-कभी अनुशासन के लिए ज़रूर पैदा किया जाता। बेटी के युवावस्था की दहलीज में कदम रखते ही, अमित आकांक्षा से कुछ भी नहीं कहता था। उसके मन में, अपनी बेटी के लिए एक विशेष मोह और प्रेम हुआ करता। जिसे कई बार चाहते हुए भी वह नहीं छुपा पाता। वहीं पर पिता होने के सबूत के रूप में अनिरुद्ध को दो-चार हाथ एक-दो बार ज़रूर जड़ दिये गये थे। वैसे दोनों बच्चों को अपनी दादी से पूरा स्नेह तथा प्यार के साथ-साथ लड़ाई और गुस्सा करने का भी अधिकार था। दादी उनके जीवन का एक अहम हिस्सा थी। उन तीनों की लड़ाई, तकरार, नोकझोंक, बहस और झगडऩे की आवाज़ें उनके कमरे से अक्सर आती रहती थीं, जो अब बंद हो चुकी थीं। दोनों बच्चों का जीवन एकदम नीरस और सूना हो चुका था। उनका बचपन, जो पहले ही घुटन भरे वातावरण में सिसकियाँ लिया करता था, दादी की अंतिम साँसों के साथ ही दम तोड़ चुका था।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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