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बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 43
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 0
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
बुधवार , , 23 अप्रेल
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



माँ के जाते ही अमित अनाथ हो गया था। माँ के जीते जी वह भावनात्मक रूप से मज़बूत और घर की रसोई की परेशानियों से कम से कम मुक्त रहता था। दोनों बच्चों की देखभाल और चिंता से भी दूर रहता था। दिनभर में माँ के एक दर्शन मात्र से उसे ऊर्जा प्राप्त हो जाती थी। कोई तो बड़ा है मुझसे, वह ही सब देखेगा, इस बात का एहसास रहता था। मगर अब जीवन नीरस हो चुका था। माँ की याद करते-करते कब देर रात हो गई पता ही नहीं चला। कितना मुश्किल था माँ के बिना जीवन। जीने के लिए बहुत कुछ ज़रूरी नहीं मगर कुछ तो चाहिए। यहाँ तो कुछ भी नहीं था। अमित के अंदर अभी जीवन की आग खत्म नहीं हुई थी। उसे प्यार की आवश्यकता भी महसूस होती थी। शारीरिक प्रेम जीने के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना खाना और पीना। सारे दुःख, दर्द, क्रोध, परेशानी, पानी की तरह बह जाते हैं जब स्त्री और पुरुष संभोग करते हैं। शारीरिक संबंध पति-पत्नी के बीच मज़बूत रिश्तों के बंधन के लिए अति आवश्यक है। इसके बाद मानव एकदम तरोताज़ा हो जाता है। शायद प्रकृति का एकमात्र मनोरंजन का साधन। अमित के जीवन में एकमात्र औरत निकिता ही थी। जिसके साथ उसने जीवन का संपूर्ण आनंद लिया था। उस प्यार की सुगंध से वह आज भी महक उठता था। निकिता रात-रात भर उसके बगल में एंटी सॉइकोटिक दवाई के असर से सोती रहती और वह उसके शरीर को निहारता हुआ परेशान होकर जागता रहता था।
अक्सर ऐसा होता, जब निकिता प्यार के लिए कहती तो अमित की मानसिक अवस्था उसी के प्रताडऩा की वज़ह से अक्सर ठीक नहीं होती और वह प्यार ही नहीं कर पाता। फिर निकिता आंतरिक क्षणों के बीच में भी अजीब-सी हरकतें कर जाती। ऐसा कुछ बोल देती कि अमित की उत्तेजना खत्म हो जाती और वह फिर पागल हो जाता। उस रात निकिता ने अपने पागलपन में सारी मर्यादाएं खो दी थीं। दो दिन से आकांक्षा को बेवज़ह बेहद परेशान कर रही थी और अमित को मानसिक रूप से तंग। अमित बेटी को देख-देख कर बेहद आहत था कि अचानक निकिता ने कमरे में आकर अपने पूरे कपड़े उतार दिए थे। कहने लगी 'मुझे प्यार करो'। अमित परेशान तो था ही, निकिता के नग्न शरीर ने भी उसे बिल्कुल आकर्षित नहीं किया था। आकर्षण और प्यार के लिए उपयुक्त वातावरण और अवस्था चाहिए। अमित चिड़चिड़ा कर बोल पड़ा,
''शरम नहीं आती, सो जाओ, मन नहीं है।'' सुनते ही निकिता चिल्ला उठी थी,
''करते नहीं बनता है तो ऐसा बोलो... अपनी औरत से प्यार तो करना आता नहीं और मर्द बने फिरते हो... तुम्हारे कारण तो मेरी ज़िंदगी ही खराब हो गई... मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना, नपुंसक कहीं के...''
निकिता ज़ोर-ज़ोर से ऊट-पटांग बकते हुए आधे-अधूरे कपड़े पहनकर बिस्तर पर लेट गई थी। अमित सुनकर अंदर तक हिल गया था। थोड़ी देर में ही उसे नाइट ड्‌यूटी में अस्पताल भी जाना था। दिन में बच्चों की ज़रूरत और रात में निकिता से दूर रहने के चक्कर में वह अक्सर नाइट ड्‌यूटी लगवा लेता था। फिर अस्पताल में रात के एकांत में उसे दो पल की शांति, सुकून और थोड़ा सोने को भी मिल जाता था। ...बुरी तरह आहत, अमित यंत्रवत कपड़ा पहनने लगा था। वह उन शब्दों से दूर जाना चाहता था। 'पागल है कुछ भी कह देती है', यह सोचकर एक बार फिर दिल को तसल्ली दे रहा था। अस्पताल तो पहुँचना था लेकिन पहले से ही, रोज़ की तरह आज भी देरी हो गई थी। मगर आज तो ड्यूटी पर जाने का बिल्कुल मन न था... वही शब्द मुड़-मुड़ कर वापस आते। और वह उनसे दूर भागने के लिए बिना कुछ कहे चुपचाप घर से निकल पड़ा था। आज तक उसने कभी कोई ग़लत कार्य नहीं किया था। ऐसा नहीं कि उसके मन में ख़यालात नहीं आते थे या ज़रूरत नहीं थी या सुविधा नहीं थी। मगर कई बंधनों से बंधा हुआ था। सदैव समाज और घर की सोचता रहता... कोई ग़लत काम करने पर सबको पता चलेगा तो कैसा लगेगा? फिर जब निकिता की बातों से, हरकतों से अति हो जाती तो कुछ करने के लिए, कहीं जाने के लिए पल भर के लिए तत्पर हो जाता। आख़िरकार इंसान ही तो है भगवान तो है नहीं। परंतु तभी पहले माँ का और अब आकांक्षा का चेहरा आँखों में घूम जाता। बेटी जवान हो गई है, ऐसे में अपनी दो मिनट की मस्ती के लिए किसी बाज़ारू औरत से मिलना ठीक नहीं होगा ...ऐसे विचार उसे कोई ग़लत कदम बढ़ाने से रोक लेते थे। फिर खुद ही सोचता कि वह भी तो इंसान है। और फिर दो पल की खुशी के लिए सदैव शराब का सहारा ले लेता। शराब पीने से उसे कुछ पल की राहत मिलती थी। फिर शराब पीना अच्छा है या बुरा, इसके विश्लेषण से वह ऊपर उठ जाता। ...कम से कम समाज में बदनामी तो नहीं होगी, पीने से शरीर ही तो खराब होगा, तो हो जाने दो, ज़्यादा किसके लिए जीना है। अत्यधिक दुःख की अवस्था में अक्सर इसी भावना के तहत पी लेता, फिर जैसे-जैसे होश आता बच्चों की चिंता उसे फिर पीने से दूर कर देती। ...और उस रात भी वह अस्पताल की जगह सदर पहुँच गया था।
''क्या लेंगे?'' बैरे ने अमित को मेन्यू कार्ड देते हुए पूछा था।
''कुछ भी।''
''बीयर या हार्ड ड्रिंक्स?''
''एक लार्ज व्हिस्की।''
''सोडा या पानी के साथ?''
''मिक्स करके।''
अमित आज एक बार फिर बहुत ज़्यादा मानसिक रूप से आहत महसूस कर रहा था।
निकिता की कही गई बातें वह समझना नहीं चाहता। उसकी मानसिक अवस्था को जानते हुए भी वह कई बार दिल की गहराइयों तक टूट जाता। निकिता की ज़ुबान ने उसके मन-मस्तिष्क पर कई बार गहरी चोट पहुँचाई थी। जख़्म भी बहुत दिये थे। हर बार समय ने उसको भरने की कोशिश की थी। विभिन्न बंधनों से उसे बंधे रखने के लिए मजबूर भी किया था। कई बार निकिता की बातों में बचपना झलकता था। पर आज तो वह उसके द्वारा कहे गए कुछ शब्दों से निकल नहीं पा रहा था। मन पूर्ण रूप से आहत और दुःखी था। मस्तिष्क सोचना नहीं चाहता था। दिल समझ नहीं पा रहा था। जल्दबाजी में व्हिस्की की कई सारी घूँटों ने उसे राहत पहुँचायी थी। बहुत अधिक तो नहीं मगर जितने भी साइकॉइट्रिस्ट से परामर्श लिया था निकिता की मानसिक बीमारी सुनिश्चित नहीं हो पाती थी। कभी उसमें स्किइजोफ्रीनया के लक्षण होते, तो कभी मैनिक डिप्रेशन डिसऑडर या बाइपोलर डिसऑडर के लक्षण होते। इस कारण से कई डाक्टरों ने इसे साइको इफेक्टिव डिसऑडर का नाम भी दिया था। वास्तव में वह कभी डिप्रेशन में चली जाती और बाइपोलर डिसऑडर की तरह हरकतें करती तो कभी आकांक्षा के बारे में बोलकर अपनी नकारात्मक सोच और थॉट डिसऑर्डर को दिखाकर स्किइजोफ्रीनया के लक्षण प्रदर्शित करती। अमित यह भी जानता था कि निकिता के अंदर के मानसिक डिसऑडर में उसके और उसके परिवार के सदस्यों के प्रति सदैव नकारात्मक सोच रही है। मगर आज का बर्ताव, साथ में कही गई लाइनें, अमित को अनियंत्रित कर रही थी। चाहे उसे कोई भी बीमारी हो, क्या वह इस तरह की बातें सुनकर शांत रह सकता है? क्या वह इंसान नहीं?
कहते सुना था और देखा भी था, कि दुःख में शराब पीना, यह एक फ़िल्मी अंदाज़ होता है। परन्तु हक़ीक़त में भी ऐसा होता है अमूमन यकीन करना मुश्किल होता है। फ़िल्में भी हमारे जीवन के आसपास घूमती हैं। उनमें थोड़ा-सा नाटकीयपन हो सकता है, परन्तु वास्तविकता के काफी हद तक नज़दीक होती हैं। जैसा कि आज उसके साथ शराब पीने से हो रहा था। मस्तिष्क ने कुछ घूँटों के बाद किसी एक बिंदु पर केंद्रित होने से मना कर दिया था। अनियंत्रित हो रहा मन, मस्तिष्क के विचलित होने से राहत महसूस करने लगा था। इसी उलटफेर में उसने व्हिस्की का पहला पैग जल्दी से खत्म कर दिया था।
''साहब, रिपीट करूँ?''
''हाँ, एक और ले आओ।''
अमित ने कालेज के जमाने में फाइनल प्रौफ में, दोस्तों के बीच खासकर श्याम के कहने पर, पहली बार होली पर शराब ली थी। बाद में दोस्तों के साथ कभी-कभी बैठ जाता था। पर इस तरह से बैठकर अकेले पीने की मजबूरी शादी के बाद ही हुई थी। पता नहीं अब इसमें कितना अच्छा था या कितना बुरा। ग़लत हो या सही, परन्तु जो समय पर काम आये, वो ही असल है और ठीक है। मानसिक रूप में बीमार लोगों का मूड डिसऑडर हो या थॉट डिसऑडर, पर साधारण आदमी भी अपना मानसिक बैलेंस खोने के लिए ही पीता है। पीकर मानसिक अवस्था डिस्टर्ब अर्थात अनियंत्रित हो जाती है। अमित अक्सर शराब पीकर सोचता कि इससे तो मानसिक रूप से बीमार लोग ही अच्छे हैं। बिना पिये हुए ही अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं। उन्हें कोई तकलीफ़ तो नहीं होती। होती भी है तो सिर्फ दूसरों को। शायद यही एक बीमारी है जिसमें इंसान स्वयं कम कष्ट भोगता है दूसरा साथ वाला ज़्यादा। घूंट पीते ही अमित भी अब मानसिक रूप से अस्थिर हो रहा था। अजीब-अजीब ख़यालात आने लगे थे। पीते ही उसे कोई अफसोस भी नहीं रहता था और कम से कम इस बात का तो कतई नहीं कि वह अकेले बैठकर इस तरह से पी रहा है।
''कुछ साथ में लेंगे साहब?''
''नहीं... अच्छा कुछ थोड़ा-सा सलाद दे दीजिए। ...एक मिनट सुनिए एक काम कीजिए, दो अंडे बुआयल्ड भी साथ ले आइये।''
व्हिस्की का एक पैग लेने के बाद अमित को हल्की-सी भूख महसूस हुई थी। पिछले दो दिनों से उसने खाना ठीक से नहीं खाया था। वह अक्सर निकिता के थोड़ा ठीक होने का इंतज़ार करता था। वो स्वयं भी दो-तीन दिन में ठीक हो जाया करती और फिर बेहद प्यार देती। मगर जो कुछ भी वह कर चुकी होती उसे भूल जाती थी। फिर अमित का ऐसे में खाना खाने का मन भी नहीं करता था। वह तंग दिल नहीं था, उसे बीवी से अभी भी प्यार था। परन्तु अपने ज़ख़्मों पर मरहम ज़रूर चाहता था। तभी तो निकिता के द्वारा दिये गये थोड़े ही प्यार से, आज भी स्वयं को सम्पूर्ण समर्पित कर देता। यह उसकी कमज़ोरी नहीं उसका स्वाभाविक गुण था।
मगर आज जो हुआ तो वह आह किए बिना न रह सका। आज उसने जाते-जाते बच्चों को भी नहीं देखा था। खाना पूछना तो फिर बहुत दूर की बात थी। ...पता नहीं दोनों ने सुबह से क्या खाया होगा? ...लेकिन अगले ही पल आज उसे विरक्ति हुई थी। क्या ज़िंदगी है? कुछ भी तो नहीं। अब बीयर बार में बज रही ग़ज़ल उसके दर्द को सहला रही थी। क्या जीवन में ऐसा भी होता है? दूसरे पैग के बाद शराब में मिठास आने लगती है और वह निकिता की आवाज़ का तीखापन और रूखापन भूल रहा था। थोड़ी ही देर में दिल समझाने लगा। अगर ग़लती से बोली गई लाइन जल्दी ही क्षमायाचना के लिए कह दी जाए, तो चीज़े खत्म हो जाती हैं, परन्तु अगर उसे बढ़ाया और बहुत देर तक उसी तरह का रूखा व्यवहार किया जाए, तो दिल में गाँठ बन जाती है और निकिता ने तो...। यह सोचते ही वह फिर से क्रोधित हो रहा था। बेयरा तीसरा पैग लाने लगा तो वह मना नहीं कर पाया। तीसरे पैग की पहली घूँट ने दिल को राहत पहुँचाई थी। दिमाग़ के किसी कोने से आवाज़ उठी थी... निकिता की बीमारी लाइलाज़ है सिर्फ काम चलाने लायक ठीक किया जा सकता है वह भी लगातार दवाइयों द्वारा। क्या बेकार ज़िंदगी है...।
तीसरे पैग के खत्म होने से पहले सिगरेट की इच्छा हुई थी। अजीब संबंध है शराब और सिगरेट का। शराब के अंदर जाते ही, अक्सर लोगों को सिगरेट की इच्छा होने लगती है। ...यह शरीर रखकर भी वह क्या करेगा। किसी काम तो आना नहीं। कम से कम पीने से थोड़ा सुकून और मस्ती तो मिल जाती है। ...और तीसरे पैग के साथ अमित ने सिगरेट भी सुलगा ली थी। उसके मन में कहीं अब भी थोड़ा जीने का मोह था। अक्सर एक ही सिगरेट लेकर पिया करता। मगर बार में एक सिगरेट मिलती ही नहीं। बीयर बार वाले भी चतुर होते हैं, शराब पीने वाले को सिगरेट का पैकेट दे दो, वह ज़रूर पी जायेगा। अमित भी मजबूरीवश पूरी सिगरेट की डिホबी ले चुका था। पैग खत्म होने तक दो सिगरेट ने भी अपना कमाल दिखाया था। नशा पूरा हो चुका था। ड्‌यूटी पर वह जा पायेगा? उसने सोचा ही नहीं। तीन पैग लगाने के बाद अमित अच्छे सरूर में आ चुका था और शराब अब उसे मस्ती दे रही थी। नशा, किसी न किसी चीज़ का नशा, हर इंसान को होता है। इस व़क्त उसे शराब का नशा था। मन अधिक की मांग करने लगा। मस्तिष्क अब उसके वश में नहीं था। उसने तीसरा पैग सिगरेट के साथ कुछ यों ही जल्दी से पी लिया था। मस्तिष्क का मन और मन का मस्तिष्क पर कोई नियंत्रण नहीं था और मन-मस्तिष्क, तन के साथ-साथ सम्पूर्ण आज़ाद हो चुके थे। उसने पैसे बिल पर रखे और गाड़ी की ओर चल पड़ा था। दरवाज़ा खोलने में थोड़ा मुश्किल हुई थी फिर उसे यह भी होश नहीं था कि कौन से गियर में गाड़ी चल रही थी। और वह पहले ही गियर में हॉस्पिटल पहुँच चुका था।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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