|
बन्धन: खण्ड 4 / अध्याय 44 |
|
उपन्यास
|
|
गुरुवार , , 24 अप्रेल |
| |
 |
मनोज सिंह
|
|
रात के 10 कब के बज चुके थे। आज तो वह पूरा एक घंटा लेट था। वार्ड ब्वॉय नीचे लंबी कुर्सी पर चादर बिछाकर सो चुका था। सिस्टर स्टाफ रूम में आराम कर रही थी। संभलते-संभलते वह डाक्टर ड्यूटी रूम में धीरे से गया था। अदिति उसे वहाँ नहीं दिखाई दी थी, आज उसी की शाम की ड्यूटी थी। शायद इस व़क्त तक जा चुकी होगी। उसकी निगाहें चारों ओर घूम रही थीं। अंदर का दरवाज़ा आधा खुला हुआ था बाहर की ट्यूबलाइट की रोशनी अंदर तक थोड़ी-थोड़ी प्रवेश कर रही थी। कुछ समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या करना चाहिए। लड़खड़ाता हुआ ड्यूटी रूम के अंदर बने हुए शयनकक्ष में घुसने के लिए उसने दरवाज़ा पूरा खोला तो उसकी आँखें एक पल के लिए ठहर गई थी। पलंग पर अदिति नींद में लेटी हुई थी उसका पल्ला सोते-सोते अपने स्थान से कुछ नीचे गिर चुका था। हल्की-हल्की रोशनी उसके शरीर की माँसलता को उभार रही थी और वही पलटकर उसके मस्तिष्क की ओर बढ़ रही थी।
मन पूरी तरह से मस्तिष्क के काबू से बाहर था। शरीर उन्मुक्त और इच्छाएं उच्छृंखल हो चुकी थीं। कदम डगमगाने लगे तो मस्तिष्क ने मन और शरीर को थोड़ा रोकने की कोशिश ज़रूर की थी परंतु वह खुद इतना कमज़ोर हो चुका था कि उसका नियंत्रण बिल्कुल समाप्त हो चुका था।
अमित जानता तो था कि वह नशे में है समझ भी रहा था मगर पूरे होश में न था। नशा अपने चरम बिंदु पर पहुँचकर कल्पनाओं की ऊँची उड़ान भरने के लिए तत्पर था। ऐसे में पैर ज़मीन पर कहाँ टिकते। जब मन वश में नहीं तो पैर भी दिल के संग डोलने लगे थे।
निकिता और उसकी कही हुई बातों से वह इस व़क्त काफी दूर था। मन किसी नये सहारे की तलाश में भटक रहा था। दिल और दिमाग़ अव्यवस्थित और पहले से ही टूटे हुए थे। भावनाएं अतृप्त आत्माओं-सी भूखी-प्यासी अंधेरी गलियों में चहल-कदमी कर रही थी। ऐसे में अदिति उसे पहली बार बहुत आकर्षक लगी थी। परंतु आज इसमें देह के सम्मोहन का समावेश था। शरीर की आग अचानक जल उठी और फिर बुझने के लिए मचल उठी। गर्मी बढ़ रही थी और इसकी तीव्रता में दिल-दिमाग़ और आदर्श की बातें बौनी साबित होने लगी। शरीर अपनी भूख को मिटाने के लिए बेचैन हो उठा। अब उसे दिल के सहारे की कोई ज़रूरत नहीं थी। मस्तिष्क तो पहले से ही चलायमान था। मन-मस्तिष्क वश में न होने से शरीर को अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर बैठे। और अगले ही पल में वह अदिति के नज़दीक था। आँखों ने मांसल शरीर को एक बार फिर देखा और उसने आग में घी का काम किया था। शरीर की इच्छाएं भड़क उठी तो इंद्रियां अनियंत्रित हो चुकी थीं। अब उसे यह नहीं पता था कि वह क्या कर रहा है। उसके हाथ और आगे बढ़कर किसी को छू पाते, इसके पहले ही अदिति की आँखें खुल चुकी थीं।
अदिति ज़िंदगी के हर मोड़ पर, हर अग्नि परीक्षा में, मुसीबतों से लड़ते हुए अकेली जी रही थी। आज तक उसे कभी भी किसी सहारे की आवश्कता नहीं हुई थी। उसने दूसरों को सदैव प्यार दिया था, परंतु कभी किसी से कोई चाहत नहीं की थी। ऐसा नहीं कि उसे प्यार की आवश्यकता नहीं थी मगर वह उसे साफ़-सुथरे ढंग में चाहती थी। दूसरों को सदैव सहारा दिया था। परंतु ज़िंदगीभर बड़ी से बड़ी मुसीबत में भी कभी किसी का सहारा नहीं लिया था। ऐसा नहीं कि वह बहुत महान थी। परंतु शायद ईश्वर ने उसको कुछ ऐसे ही गुण दिये थे कि वह अपने आप ही आत्मसम्मान और स्वाभिमान से जीने की आदी हो चुकी थी। पहली बात तो यह कि उसके व्यक्तित्व, उसके प्रभाव क्षेत्र से ही उसके इतने नज़दीक आने की आज तक किसी ने हिम्मत नहीं की थी। दूसरी, जब वह विक्रमजीत जैसे अमीर और प्रभावशाली छात्र को, जबकि तब वह मेडिकल कालेज की एक साधारण छात्रा ही थी, सरेआम फटकार और जलील कर सकती थी, तो फिर अब तो वह एक परिपक्व महिला थी। अच्छे-अच्छे यहाँ तक की विदेशों में भी लोग उसके पास फटकने से डरते थे। मज़बूत इरादों वाली थी। वह ज़िंदगी के उद्देश्य, किसी भी सवाल-जवाब, किसी भी भावना, किन्हीं भी बातों पर दूर-दूर तक किसी भी तरह से भ्रमित नहीं थी। वह हर बात बिल्कुल शुद्ध, साफ़ और अच्छी तरह से समझती थी। अपने जीवन के साथ हुए मज़ाक को उसने अपनी ज़िंदगी की हक़ीक़त मानकर स्वीकार ज़रूर कर लिया था, मगर किसी और को कभी उस पर हावी नहीं होने दिया था। वह ईश्वर का दिया स्वीकार करते हुए ज़िंदगी को सकारात्मक रूप में पूरी तल्लीनता से जी रही थी। वह बंधन रहित ज़रूर थी परंतु उच्छृंखल नहीं।
कमरे में कदमों की आवाज़ से उसकी आँख खुली थी और जब खुली तो एक मिनट के लिए खुली की खुली रह गई थी। किसी के हाथ खूनी पंजा बनकर उसे दबोचकर निचोड़ने के लिए आगे बढ़ रहे थे। उन हाथों से जुड़े हुए शरीर और चेहरे पर नज़र गई तो वह हैरान हुई थी। वह कोई और नहीं अमित था। एक मिनट लगे थे उसे समझने में और फिर कोई स्पर्श उसे अपवित्र कर पाता वह हड़बड़ाते हुए छिटककर दूर जा खड़ी हुई थी। अगले ही पल उसने अपने साड़ी के पल्ले को ठीक किया और मन-मस्तिष्क को अपने नियंत्रण में करते हुए दाँतों को चबाते हुए बोल पड़ी,
''तुम जब होश में आ जाओ तो बात कर लेना। अच्छी तरह समझा दूँगी।''
सख्त आवाज़ में सच्चाई के साथ-साथ गहराई भी थी। रही-सही कसर उसकी आँखों से बयां हो रही थी। और फिर मज़बूत कदमों से तेज़-तेज़ चलते हुए वह दरवाज़े तक पहुँची थी। पीछे मुड़कर एक बार फिर घूरकर अमित को देखा और तुरंत कमरे से बाहर निकल चुकी थी। तेज़ आवाज़ से बंद हुए दरवाज़े ने अमित के मस्तिष्क पर दस्तक दी थी और उसका नशा एक झटके में उतर चुका था। इतने दिनों की शराफत शराब के साथ बह गई थी और अब वासना आत्मग्लानि बनकर दिल दिमाग़ को झकझोर रही थी।
|
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
|
|
|
|