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बन्धन: खण्ड 5 / अध्याय 46 |
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उपन्यास
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सोमवार , , 28 अप्रेल |
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मनोज सिंह
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''एक पीरियड पहले ही चली गई है।'' स्कूल की टीचर ने बताया था। अदिति के पूछने पर आगे बताने लगी,
''पढ़ाई में ठीक नहीं है। अब होशियार है या बुद्धू कहना इसलिए मुश्किल है कि क्लास में अटेंडेंस (उपस्थिति) बहुत कम है। कई-कई दिनों तक स्कूल नहीं आती है। थोड़ा ध्यान दीजिये।''
अदिति के बचपन की सहेली अब आकांक्षा के स्कूल में टीचर थी। उसी से मिलने के बहाने, अदिति ने आकांक्षा के बारे में पूछताछ की थी। स्कूल के बाहर सोचते हुए निकली कि क्या हो सकता है? अभी दो दिन पहले ही तो अमित अस्पताल से घर गया है। हाँ, निकिता अस्पताल में एक बार भी नहीं आई थी। सुना था तबीयत ठीक नहीं। पर अगर खराब होती तो आकांक्षा स्कूल आती ही नहीं, फिर उसे स्कूल में कैसे पता चला होगा कि घर में उसकी ज़रूरत है। ऐसा हो सकता है घर पर काम हो। दो दिन में अस्पताल के बातचीत में इतना तो अदिति समझ चुकी थी कि घर का सारा काम आकांक्षा को देखना पड़ता है। उसे यह भी पता चल चुका था कि निकिता आकांक्षा को प्यार करना तो दूर पसंद तक नहीं करती। उलटा ऊपर से कुछ न कुछ कहती रहती है। आकांक्षा ने अपनी माँ के बारे में उसे कुछ भी नहीं बताया था। यही तो उसका अपनी माँ के प्रति प्रेम और लगाव था। अमित तो वैसे भी चुप रहता था। हाँ, अनिरुद्ध ने ही थोड़ा बहुत बताया था। वह भी उसने अपनी बहन के प्रति अदिति आँटी का प्यार देखकर कहा था और फिर वह स्वयं भी आकांक्षा से बेहद जुड़ा हुआ था। अस्पताल में और अधिक अमित से बात करने का मौका नहीं मिल पाया था। उधर, वार्ड में अमित के पेशेंट को भी उसी को देखना पड़ रहा था। समय की कमी थी, आज व़क्त मिला तो स्कूल चली आई थी।
यही कुछ सोचते हुए, स्टेट बैंक के सामने से निकली और फिर रेलवे पुल के नीचे से निकलकर घर की ओर चल पड़ी थी। वह यह नहीं समझ पाई थी कि आकांक्षा की ओर वह क्यूँ आकर्षित हुई है? शायद इतने सालों का अमित का साथ और उसकी आकांक्षा के लिए परेशानी या... आकांक्षा की मासूमियत और अदिति का खालीपन, इसके दो प्रमुख कारण हो सकते थे। सदर की तरफ़ से आने वाले रास्ते के चौराहे को जैसे ही उसने पार किया तो देखा आगे स्कूटर पर आकांक्षा किसी अजनबी नवयुवक के साथ जा रही थी। अदिति ने कार का हार्न बजाया तो आकांक्षा ने पीछे मुड़कर देखा था। देखते ही वह एकदम से घबरा गई थी और कुछ आगे के नवयुवक को कहने लगी थी। अदिति को अटपटा लगा तो उसने भी गाड़ी तेज़ करके नवयुवक को देखने की कोशिश की थी। कोई बीस-बाईस वर्ष की उम्र का नवयुवक, हीरो बनने की कोशिश में हरेक चौराहे पर खड़े नौजवान जैसी शक्ल थी। जिस तरह से नौजवान ने मुड़कर घूरते हुए अदिति को देखा वह उसे ठीक नहीं लगा था। आकांक्षा ने भी अदिति को देखकर अपने आपको छुपाने की कोशिश की थी। डर उसके चेहरे पर साफ़ झलक रहा था। चोर चोरी करते पकड़ा जाये तो ऐसे ही भाव आते हैं। अदिति कुछ-कुछ समझ गई थी। घर के थोड़ा पहले ही आकांक्षा स्कूटर पर से उतर चुकी थी। अदिति ने कार रोककर आकांक्षा से बात की और यूँ ही बात करते-करते आकांक्षा को अपनी कार में बिठाया और धीरे से अपने घर ले आई थी। बिना कुछ भी पूछे पहले उसने उसे खूब प्यार किया था। आकांक्षा काफी घबराई हुई थी। घर आकर तो रोने भी लगी।
''इसमें रोने की क्या बात है। मैंने तो तुमसे कुछ कहा ही नहीं। तुम मुझे अपना दोस्त ही समझो। मैं तुम्हारे पिताजी या भाई को कुछ भी नहीं बताऊंगी।'' और अदिति ने आकांक्षा को अपनी बाहों में लेते हुए उसका विश्वास जीतने की कोशिश की थी। इसके अलावा उसने इस संदर्भ में और अधिक बात करना ठीक नहीं समझा।
ज़्यादा बात करने से बच्चे की हिम्मत बढ़ सकती है। ज़्यादा डराने से वह छुपकर ग़लत काम कर सकता है। बातचीत से अदिति ने जान लिया था कि घर जाने में अभी आकांक्षा के पास व़क्त है। अनिरुद्ध का स्कूल भी आकांक्षा के स्कूल के पास ही था। मगर दोनों के लगने और छूटने में आधे घंटे का फ़र्क था। उस दिन अदिति ने खूब दिल से, अच्छा नाश्ता बनाया और आकांक्षा के साथ बैठकर खाया था। प्यार से बात करते हुए उसने आगे बात बढ़ाई थी,
''स्कूल से घर तुम कैसे जाती हो?''
''रिक्शे में आँटी।''
''और अनिरुद्ध?''
''आँटी वह साइकिल पर जाता है।''
''तुम्हारा स्कूल तो दो बजे छूटता है, तुम्हारे घर जाने का रास्ता भी हमारे घर के सामने से ही है। इस व़क्त तो मैं भी घर पर ही रहती हूँ। तुम अगर आते-जाते रुक जाओगी तो हमें बहुत अच्छा लगेगा। क्यूँ माँ?''
अदिति ने माँ की ओर देखते हुए कहा था। सुनीता घर पर अकेले बैठे-बैठे वैसे ही बोर हो जाती थी। झट से बोल पड़ी,
''बेटा, दादी से मिलने आ जाया करो। मेरा यहाँ अकेले मन नहीं लगता। थोड़ी देर तेरे संग बैठकर बात कर लूँगी तो दिल लग जाया करेगा। नहीं तो बेटी को डाक्टर बनाकर मैंने तो लगता है एक ग़लत काम ही कर डाला। इसके पास तो मेरे लिये व़क्त ही नहीं है।''
सुनीता ने बेटी अदिति की ओर देखते हुए मज़ाक में कहा था। सुनीता दादी के हँसमुख व्यक्तित्व और अदिति आँटी के हाथ के स्वादिष्ट नाश्ते में आकांक्षा को बड़ा आनंद आया था। अब तक उसका डर भी जा चुका था। बाद में अदिति और आकांक्षा घर के बागीचे में टहल ही रहे थे कि सामने से रास्ते में उन्होंने अनिरुद्ध को साइकिल पर जाते हुए देखा। अदिति ने अंदर घर में बुलाकर उसे भी खूब खिलाया पिलाया था। बाद में दोनों भाई-बहन इकट्ठे ही साइकिल पर घर जाने लगे, तो अदिति बोल पड़ी,
''आकांक्षा तुम घर आ जाया करो और फिर अनिरुद्ध के साथ ही चले जाया करो। क्यूँ अनिरुद्ध?''
''जैसा आप ठीक समझें, आँटी।''
अनिरुद्ध की बात से अदिति को सहारा मिला था। अन्यथा अब तक वह आकांक्षा से घर आते रहने का वादा नहीं ले पाई थी।
...और इस तरह से धीरे-धीरे अदिति ने आकांक्षा को स्कूल से वापस जाते व़क्त रोज़ अपने घर बुलवाना शुरू कर दिया था। आकांक्षा जल्दी ही उससे और उसकी माँ से हिल-मिल गई थी। सुनीता आँटी को तो दादी भी कहने लगी थी। अक्सर अनिरुद्ध भी घर आ जाता था। सुनीता का भी दिल लगने लगा था। अदिति भी अस्पताल से घर समय पर आने लगी थी और फिर रोज़ ही अच्छी-अच्छी खाने की चीज़ें बनाने लगी थी। जब तक वह रसोई में कुछ बनाती, तब तक आकांक्षा और माँ बागीचे में बात करते रहते। कई बार तब तक अनिरुद्ध भी आ जाता था फिर चारों बैठकर खूब मज़ा करते। कई बार तो अदिति स्कूल से ही आकांक्षा को कार में ले आती थी। अदिति के सामने उस नौजवान की, आकांक्षा से बात करने की हिम्मत नहीं हो पाती थी। मगर वह अपने चेहरे से अदिति को अपनी नाराज़गी दिखाने में सफल रहा था। अदिति ने आकांक्षा से इस संदर्भ में अधिक बात नहीं की थी इसलिये आकांक्षा भी अदिति आँटी के सामने उस नौजवान से बात करने में हिचकिचाती थी। अदिति यह जान गई थी कि बात बहुत आगे अभी नहीं बढ़ पाई है। इसे अभी संभाला जा सकता है। प्यार और विश्वास से आकांक्षा का भी दिल धीरे-धीरे अदिति के पास लगने लगा था। अदिति को यह समझने में बिल्कुल भी देर नहीं लगी थी कि अमित सब कुछ जानता है।
कुछ दिनों बाद अमित के अस्पताल लौटने पर उसने बड़े गुस्से से उससे पूछा था,
''कब से चल रहा था यह चक्कर? ...तुमने कुछ किया क्यों नहीं?''
''मुझे, कब से का तो नहीं पता, पर कुछ दिन पहले मैंने भी उसे स्कूल से किसी के साथ आते देखा था। पता भी लगवाया था। पास ही किसी बंगले के आउट हाउस में रहता है। लड़का ठीक नहीं है।'' अदिति से अब कुछ भी छुपाने के लिए नहीं था उसके पास।
''फिर आगे कुछ किया क्यों नहीं?''
''क्या करता? लड़की का मामला है। बाप होने की वज़ह से सीधे समझा भी नहीं सकता था। फिर कुछ कर पाता इसके पहले ही अस्पताल पहुँच गया। निकिता को बताना बेकार था, किसी और से बाँट नहीं सकता था, ...सोचता हूँ तो दिमाग़ पागल हो जाता है... अंदर ही अंदर घुटन होती है...''
उसकी आँखें झुक चुकी थी। फिर भी ज़ुबान धीरे-धीरे बोल रही थी,
''फिर इसमें आकांक्षा का क्या दोष। घर में माहौल ऐसा हो, बच्चे को प्यार न मिल पाये, वह भी माँ का, तो बाहर तो...''
अमित अस्पताल में ही रो न पड़े, उठकर उसके केबिन से निकल पड़ा था। अदिति सारी बात समझ चुकी थी। पैसे, खाने-पीने की कमी और ग़रीबी, बच्चों को उतना कष्ट नहीं देती जितनी प्यार की कमी। बच्चा भावनात्मक रूप से कमज़ोर होकर, प्यार बाहर ढूँढ़ने लगता है। फिर उसे इसका ज्ञान ही नहीं होता कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। उस स्कूटर वाले नौजवान की ग़रीबी परेशानी नहीं थी। उसका कैरेक्टर और आकांक्षा से संबंध बनाने की नीयत, अमित की परेशानी का कारण थी। अदिति इस बात को जान चुकी थी। अदिति ने आकांक्षा को धीरे-धीरे अपने प्यार में, अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की थी। उसकी हर बात में रुचि लेती। उसने रोज़ आकांक्षा को अपने घर लाना शुरू कर दिया था। उसी बहाने अनिरुद्ध भी अक्सर घर आ जाया करता था। सुनीता भी दोनों बच्चों को प्यार देने में नहीं चूकती थी। अदिति में अंदर ही अंदर आकांक्षा और अनिरुद्ध के प्रति प्यार, लगाव और अपनापन बढ़ रहा था। उसके पास एक नयी मंज़िल थी, सुनीता अपनी बेटी में यह सब परिवर्तन देखकर बहुत खुश थी। प्यार की कमी हो तो जहाँ से मिले वहीं से आदमी लेना शुरू कर देता है। दोनों बच्चों के जीवन में प्यार की बहुत ज़्यादा कमी थी। प्यार लेते-देते कब दोनों बच्चों और सुनीता के बीच दादी और पोते का रिश्ता हो गया उन्हे खुद भी नहीं पता चला। हाँ, अदिति इस नये बंधन की, रिश्ते की, मज़बूत कड़ी थी।
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यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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