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बन्धन: खण्ड 5 / अध्याय 48 |
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उपन्यास
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बुधवार , , 30 अप्रेल |
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मनोज सिंह
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''मुझे तुम से ज़रूरी बात करनी है।'' अदिति सुबह-सुबह टेलीफ़ोन पर थी। अमित हॉस्पिटल पहुँचा ही था।
''हाँ हाँ, बोलो।''
''क्या तुम मेरे कमरे में इसी व़क्त आ सकते हो?''
अदिति जल्दी में लग रही थी। कुछ सेकंड रुककर अमित ने कहा था,
''ठीक है, आता हूँ।''
अमित किसी अनिष्ट की आशंका से ग्रस्त होकर अदिति के कमरे में गया था। अदिति शांत मुद्रा में आँखें बंद करके चुपचाप बैठी हुई थी। बाहर मरीज़ों की लंबी लाइन लगी हुई थी। उसने वार्ड ホवॉय को थोड़ी देर के लिए किसी को भी अंदर भेजने के लिए मना कर रखा था।
''मुझे तुमसे कुछ चाहिए। क्या दे पाओगे?''
अदिति ने अमित के बैठते ही पूछा था।
अमित में आत्मविश्वास की थोड़ी कमी पहले से ही थी। ऊपर से समय की मार ने उसे वैसे ही खत्म कर दिया था। सोचने लगा कि उसके पास ऐसा क्या है जो वह अदिति को दे सकता है, पर अपने से अधिक अदिति पर विश्वास था। थोड़ी देर रुककर बोल गया,
''क्यूँ नहीं। मगर क्या?''
''मुझे तुम्हारी बेटी चाहिए।''
अदिति ने आँखें खोली और सीधे अमित की आँखों में झाँकते हुए कहा था। अमित ने देखा अदिति के चेहरे पर आशाओं, अपेक्षाओं के बादल उमड़ रहे थे। आँखों में अकेलापन, दर्द से लिपटा हुआ था।
''वह तो मैं पहले ही तुम्हें सौंप चुका हूँ। मगर आज इस तरह से... मैं कुछ समझा नहीं।''
अमित ने लंबी साँस लेते हुए कहा था। उसके चेहरे पर चिंताओं ने तो पहले से ही मज़बूत घर बना रखा था।
''मेरा मन अब यहाँ बिल्कुल भी रहने का नहीं है। मेरा यहाँ कोई सगा-संबंधी भी नहीं है। कोई खास दोस्त भी नहीं हैं। जबकि मेरे जानने वाले बहुत से दोस्त और प्रोफेसर लंदन में हैं। मुझे वहाँ जॉब भी मिल जाएगी। कुछ और पढ़ना-लिखना भी चाहती हूँ। जहाँ तक रही आकांक्षा की बात, मैंने उससे बात कर ली है। मगर तुम्हारी इजाजत के बिना वह मेरे साथ नहीं जाएगी। तुम्हारे घर के हालात और उस लड़के की रह-रह कर बदतमीजी को देखते हुए मुझे लगता है यही ठीक भी रहेगा। वहाँ लंदन में, मैं उसका एडमीशन अंडर ग्रेजुएट में कहीं न कहीं करवा दूँगी। यह मेरी जवाबदारी है। लेकिन पहले तुम्हारी हाँ होनी चाहिए।''
अदिति एक साँस में बोल गई थी। कुछ देर रुकने के बाद फिर कहने लगी,
''...फिर मेरे जाने का एक प्रमुख कारण और भी है। यहाँ का समाज मुझे जीने नहीं देगा। अकेले औरत का जीवन यहाँ बहुत कठिन है। मुश्किलें तो बाहर भी हैं। मगर यहाँ से कम। हमारे विचार और दिमाग़ दोनों में खुलापन नहीं है। तुम सोचते होंगे... और शायद तुमने पूछा भी है कि मैंने शादी क्यूँ नहीं की। असल में बात यह है कि अगर मैं किसी से लव मैरिज कर लेती तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। मगर प्यार का जब समय था मैं पढ़ती रही। जब अरैंज मैरिज का टाइम आया तो लोगों के कुछ सवालों का हमारे पास जवाब नहीं था और मैं देना भी नहीं चाहती थी। अब अकेले रहने पर कई सवाल उठने लगेंगे। मैं इनसे डरती नहीं मगर बेवज़ह उलझना भी नहीं चाहती। और फिर जब मेरे पास एक बेहतर विकल्प है तो मैं क्यूँ न उसका उपयोग करूँ... हमारे समाज ने सवाल तो अक्सर खड़े किए मगर जवाब नहीं दिया। ...ख़ैर, जवाब समय की धारा खुद निकालेगी। जहाँ तक रही बात आकांक्षा की शादी की ...तो तुम यहाँ पर कोशिश करते रहना। तब तक यह तुम्हारी अमानत के रूप में मेरे पास सुरक्षित रहेगी।''
अदिति ने धीरे-धीरे मगर पूरे विश्वास के साथ बात चबा-चबा कर कही थी। अमित के पास कहने के लिए कुछ नहीं था। बेटी को खोने का गम था। रोकने का पूरा अधिकार था उसे। मगर किस मुँह से और किसके लिए रोकता। वह तो कई-कई दिनों तक उससे बात भी नहीं कर पाता था। निकिता को कब उससे परेशानी हो जाये, पता नहीं रहता था। वैसे भी सुनीता आँटी के देहांत के बाद से, आकांक्षा का घर में रहना निकिता ने दूभर कर दिया था। उसे रोज़ रूलाती थी।
''ठीक है, फिर भी एक बार आकांक्षा से बात कर लूँ।''
अमित ने उठते हुए बिना नज़र मिलाते हुए कहा था। दोपहर में घर जाकर उसने आकांक्षा से जब पूछा, तो उसने निगाहें नीचे करते हुए, बड़े ठंडे मन से कहा था,
''पापा जैसा आप ठीक समझें।''
अमित समझ चुका था। बेटी को बचपन से जानता था। उसे इस तरह से जाने का कोई शौक नहीं होगा। परंतु इसी में सभी की भलाई है। अन्यथा वह कभी भी अपने माता-पिता को छोडऩे के लिए तैयार नहीं होती। अमित को भी बात ठीक लगी थी। अपनी ज़िम्मेदारी से भागना नहीं चाहता था। मगर पत्नी की तबीयत खराब होने पर न तो उसे ठीक से देख पाता, न ही बच्चों को, ऊपर से स्वयं मानसिक रूप से परेशान रहता था। फिर अदिति के रूप में आकांक्षा को माँ के जैसा प्यार मिल गया था। इससे अधिक क्या चाहिए। दिल पर पत्थर रखकर अमित ने अदिति को हाँ कह दी थी। अदिति ने आकांक्षा के बीए प्रथम वर्ष की परीक्षा होने तक सभी इंतज़ाम कर लिये थे। आकांक्षा का टूरिस्ट वीज़ा ही लग पाया था। वह वहाँ जाकर आगे की व्यवस्था कर लेगी। बहुत जान-पहचान है। इतने साल के संबंधों की आज उसे ज़रूरत थी। उसे विश्वास था। फिर वह एक नये बंधन में बंधने जा रही थी, एक जवाबदारी के साथ। उसे अपनी नयी ज़िम्मेदारी का एहसास था। सारा सामान पैक करके दर्जनी मोहल्ले में रख दिया था। कुछ सामान ज़रूरतमदों में बाँट दिया था। आकांक्षा के लिए उसने नये कपड़े सिलवा दिये थे। वहाँ नयी जगह एकदम से कहाँ भागेगी। डाक्टर एल्बर्ट वरिष्ठ प्रोफेसर थे, लंदन में। उन्होंने सारी व्यवस्था कर ली थी। अदिति के काम से बड़े खुश थे।
अमित के पास निकिता को समझाने के लिए कोई और चारा नहीं था। उसकी आवश्यकता भी नहीं थी। बस इतना ही कह पाया था,
''आकांक्षा को बाहर भेज रहा हूँ। हमेशा के लिए। अब तुम्हें तंग नहीं करेगी। और फिर तुम्हें मार भी नहीं पायेगी।'' कुछ देर गुमसुम रहने के बाद लगा कि उसके मन में माँ की भावनाओं का दर्द उठा है मगर मस्तिष्क के चलायमान और अव्यवस्थता ने उसकी भावनाओं को जल्द ही बहका दिया था और वह खुश हो गई थी। उस रात बच्चों के कमरे में अमित गया तो दोनों भाई-बहन को बिछुडऩे का गम था। दोनों भावुक हो रहे थे। अनिरुद्ध उससे लड़ रहा था। आकांक्षा उसकी हर तरह की लड़ाई को चुपचाप प्यार में ही लेती थी। बहन थी, अनिरुद्ध के प्यार करने का तरीक़ा जानती थी। जब अनिरुद्ध लड़ चुका तो कहने लगी,
''तू पापा का ध्यान रखना, ...और पापा, आप खुद भी समय पर दवाई लेना ...और तुम दोनों मिलकर माँ का ख़याल रखना। ...अनि तू माँ से बिल्कुल भी नहीं लड़ेगा। खाना खुद अपने हाथों से लिया करना। पापा को परेशान मत करना। ...वैसे मैंने लक्ष्मी को खाना बनाने के लिए बोल दिया है।''
आकांक्षा धीरे-धीरे बोल रही थी। उसकी अदाओं में बड़प्पन का पुट आ गया था। अमित उसे बहुत देर तक देखता रहा था। सब कुछ सुनने के बाद ही कह पाया था,
''तू खुश तो है बेटा?''
''क्यूँ नहीं, अब मेरे पास पापा, माँ और भाई के अलावा माँ जैसा प्यार देने वाली अदिति आँटी भी हैं। बिल्कुल माँ... हाँ, उन्हीं के समान लगती हैं। उन्हीं के साथ तो जा रही हूँ। फिर कोई हमेशा के लिए तो जा नहीं रही। पढ़ने जा रही हूँ। आप मेरी चिंता मत कीजियेगा। फिर माँ जैसी, हाँ, माँ... सी आँटी साथ में हैं तो।'' आँखों में आँसू छुपाते हुए, आकांक्षा बोल रही थी।
मासी अदिति के लिए नया सम्बोधन था। जिसका अर्थ आकांक्षा महसूस करती थी और अमित अब समझ सकता था। अदिति बिना अमित से जुड़े, उसके बच्चे की माँ के रूप में नये बंधन में बंध चुकी थी। अदिति और अमित के बीच नये संबंध की परिभाषा बन चुकी थी। उन दोनों के बीच वर्षों पुराने बंधन रहित संबंध में अब एक नयी और मज़बूत कड़ी थी आकांक्षा की। कोई भी संबंध बिना बंधन के संभव नहीं। बंधनों से ही संबंधों की परिभाषा शुरू होती है। मामा हो या नाना, चाचा हो या बुआ सभी संबंधों में बंधनों की मज़बूती है और इन्हीं भावनाओं से हमारे परिवार और समाज की नींव पड़ी है अगर बंधन नहीं तो संबंध नहीं और फिर परिवार और समाज नहीं।
सुबह स्टेशन जाने से पहले आकांक्षा अपने पापा से लिपट कर रोई थी। माँ सो रही थी। सोते-सोते पैरों को छूकर उसने आशीर्वाद लिया था। अनिरुद्ध स्टेशन तक गया था। घर वापस आने पर हर कोने में आकांक्षा उसे दिखाई दे रही थी। जैसे मासूम नज़रों से उसे देख रही हो। अनिरुद्ध बिना कुछ कहे बिस्तर पर जाकर खूब रोया था। उधर, अमित पर क्या बीत रही थी यह तो सिर्फ उसका दिल ही जानता था। वह तो रो भी नहीं सकता था। अदिति आकांक्षा को लेकर लंदन रवाना हो चुकी थी। निकिता ने देर सुबह उठते ही तहक़ीक़ात की थी। शुरू-शुरू में उसके चेहरे पर यह जानकर खुशी आई थी कि आकांक्षा जा चुकी है। पर थोड़ी देर में ही पत्थर-सी गुमसुम हो गई थी। डिप्रेशन के दौर में अक्सर ऐसा होता था। और फिर कई दिनों तक जड़वत ही रही। उसके दिमाग़ में क्या अव्यवस्थित विचार घूम रहे होंगे अंदाज लगाना मुश्किल था। परंतु हाँ, उसने फिर कई दिनों तक आकांक्षा का नाम भी नहीं लिया था।
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यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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