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बन्धन: खण्ड 5/ अध्याय 50
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
शुक्रवार , , 02 मई
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



अनिरुद्ध घर से निकल चुका था। निकिता का दिमाग़ चाहे जितना भी रोगी हो मगर मन ही मन बेटे से प्यार था। इस बात को तो वह कम से कम समझ ही गई थी कि अब अनिरुद्ध घर में उस तरह से नहीं रह पाएगा जैसे अब तक रहता था। उसका बेटा अब एक नये जीवन की तलाश में, एक नयी मंज़िल की ओर, नये रास्ते पर निकल चुका था। वह अब बड़ा हो चुका है। फरवरी का महीना, सर्दी का मौसम अपने आख़िरी पड़ाव पर था। फिर भी सुबह की धूप अच्छी लगती थी। निकिता बागीचे में, आराम चेयर पर अपनी आँखें बंद करके बैठी हुई थी। धूप में आगे के सफेद बाल आज कुछ ज़्यादा ही चमक रहे थे, और दर्शाने की कोशिश भी कर रहे थे कि निकिता जीवन के किस मोड़ पर पहुँच चुकी है। अमित अनिरुद्ध को छोडऩे स्टेशन गया हुआ था। जबलपुर से दिल्ली ट्रेन फिर वहाँ से लंदन के लिए हवाई जहाज। घर पर निकिता अकेली थी। घर पर नयी व्यवस्था का आगमन हो चुका था। जिस संबंध के बंधन में निकिता आज तक थोड़ी बहुत जुड़ी हुई थी वह आज मुक्त होते दिख रहे थे। अजीब समाज और प्रकृति का नियम है। आज वह बंधन मुक्त नहीं, बंधन रहित थी। उसकी कोई मंज़िल नहीं थी। उसके पास तो सिर्फ अब एक इंतज़ार था। कब उसकी आँख लगी उसे होश ही नहीं था। हवा की ठंडक धूप में मिलकर शरीर को एक सुखद अनुभूति दे रही थी। जैसे कि मानो सब कुछ समझ रही हो। उसने निकिता को छूने की भी कोशिश की थी।
गाड़ी की आवाज़ से निकिता की नींद खुली थी। अमित कार बंद कर बाहर निकला तो निकिता को बागीचे में बैठा देखकर उसे आश्चर्य हुआ था। निकिता अब भी आँख बंद किए हुए बैठी थी। वह उठकर अमित को देखती इसके पहले ही अमित ने पास पहुँचकर धीरे से उसके सिर को प्यार भरा स्पर्श दिया था। इस व़क्त निकिता का दिमाग़ दिशाहीन था। उसके पास खोने और उलझने के लिए, अब कुछ भी नहीं था। अव्यवस्थित और नकारात्मक दिमाग़ इस व़क्त शांत था। उस स्पर्श में उसे आज डर की अनुभूति नहीं हुई। उसने आँखें खोली तो देखा, अमित अब तक उसकी तरफ़ देख रहा था। निकिता की आँखों में प्यार और भावनाओं की तृष्णा थी। अनिरुद्ध को जितनी निकिता याद कर रही थी उतना ही अमित भी उसकी कमी को महसूस कर रहा था। अमित की आँखों ने अनिरुद्ध की दूरी और कमी को दर्शाया था और उसके हाथ निकिता के सिर पर प्यार से पड़ रहे थे।
अमित निकिता को इस भाव में देखकर यकीन नहीं कर पा रहा था। हाँ, उसे यह ज़रूर महसूस हो गया था कि आज वह भावविहीन शून्य मगर सकारात्मक दिशा में है। उसे आज उसकी शून्यता पर प्यार होने लगा था। आज पहली बार वह एक नये रूप में प्रविष्ट कर रही थी।
''क्या आप चाय लेगें?''
निकिता ने उठते हुए, पहली बार बहुत मासूमियत से अमित की आँखों से आँखें चुराते हुए पूछा था। अमित इन प्यार भरी लाइनों को सुनने का वर्षों से इंतज़ार कर रहा था। इससे पहले कि वह कुछ कह पाता, उसकी आँखों ने बहुत कुछ कहने की कोशिश की थी। निकिता कुर्सी से उठकर रसोई की ओर चल पड़ी थी। अमित इस दृश्य को देखकर हैरान था, मगर अंदर से बहुत खुश। उसका नया जीवन, आज से शुरू हो चुका था। उधर, निकिता अंदर पहुँचकर रसोई की जगह अपने शयनकक्ष में चली गई थी। अकेलेपन के साये उसे फिर से घेर चुके थे वह फिर अपनी दुनिया में लीन हो चुकी थी।
औद्योगीकरण और व्यावसायीकरण के कारण वैसे ही परिवार का एकल होना स्वाभाविक हो गया है। उसी की समाज को देन है कि पति पत्नी जहाँ से शुरू करते हैं वहीं पहुँच जाते हैं। बच्चे तो बीच में अतिथि के रूप में कुछ वर्षों के लिए आते हैं। अधिक से अधिक पंद्रह से बीस वर्ष। ध्यान से देखें तो आदमी अकेला आता है बाद में भी अकेला रह जाता है। अन्यथा आधुनिक युग में वैसे भी बस, ट्रेन, ऑफिस हर जगह अकेला ही होता है। पति-पत्नी दोनों आख़िरी दिन तक जीवित रहें ज़रूरी नहीं। कौन पहले चला जाये पता नहीं, फिर सदैव साथ-साथ रहें वह भी तो ज़रूरी नहीं।
दोनों बच्चों के जाने के बाद, उस रात अमित उनके कमरे में जाकर घंटों अकेले बैठा रहा था। दोनों बच्चों के बिस्तर पर अंधेरे में कुछ ढूँढ़ने की कोशिश करने लगा। एहसास तो हुआ पर कोई स्पर्श नहीं था। यादें तो थीं मगर कमरे में कोई हलचल नहीं थी। अपने फैसले पर उसे खुशी थी तो बच्चों से दूर होने का गम भी था। अंदर ही अंदर घबराहट हुई कि पता नहीं अब उन्हें देख पायेगा भी या नहीं। ये रिश्तों के बंधन भी अजीब हैं, साथ रहते हैं तो दुःख देखे नहीं जाते, दूर होते हैं तो दुःख देने लगते हैं। कष्ट दोनों परिस्थितियों में ही था। क्या वे उसके बिना रह लेंगे? क्या वह रह पायेगा? तकलीफ़ तो होती है पर रहना पड़ता है। सभी को एक दिन जाना है। हम साथ आए भी तो नहीं थे।
अमित ने अपनी धुंधली यादों को साफ़ करने की बहुत कोशिश की, कब दोनों पैदा हुए, कब बड़े हुए, कुछ याद नहीं, और अब दूर भी हो गये। चेहरे याद आते, मस्तिष्कपटल पर उभरते, मगर आँखों के आँसू उन्हें धुंधला कर रहे थे। उसे आज इस बात का अत्यधिक गम था कि वह बच्चों का बचपन देख नहीं पाया, उनके साथ जी नहीं पाया, उनका बचपना महसूस नहीं कर पाया। जीवन के इस आनंद से, पिता होने के एहसास से वंचित ही रहा।
उसके लिए इस उम्र में एक नये जीवन की शुरुआत थी। शायद उसने ठीक ही फैसला लिया है। यहाँ बच्चे न तो जी पा रहे थे न ही वह उन्हें कोई खुशी दे पा रहा था। दूर होंगे पर अपना जीवन तो जी लेंगे। फिर इधर वह निकिता को भी पूरी तरह नहीं देख पाता था। वह ठीक से समय पर दवाई नहीं लेती तो तकलीफ़ बढ़ जाती थी। किसी के साथ भी न्याय नहीं कर पा रहा था। उसने अब निकिता पर पूरा ध्यान केन्द्रित कर दिया था। समय पर दवाई, समय पर नाश्ता, खाना, नहलाना। बच्चों के जैसी देखभाल करता। अस्पताल ड्यूटी पर जाने से पहले सब कुछ करके जाता था। लक्ष्मी बाई थोड़ी मदद कर दिया करती थी। माँ के ज़माने से थी। सब समझती थी। दयालु स्त्री हो तो कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं होती। अमित की अनुपस्थिति में दूर से ही मगर निकिता का पूरा ध्यान रखती थी। वैसे अक्सर बंगले के पीछे आउट हाउस में ही रहती अपने बच्चों के साथ। हाँ, बीच-बीच में अमित हॉस्पिटल से टेलीफ़ोन पर हालचाल ज़रूर पूछ लेता था।
अमित ने उस हार्ट अटैक के बाद धीरे-धीरे सिगरेट छोड़ दी थी। अदिति और फिर आकांक्षा ने बोल-बोल कर विदेश जाने से पहले ही पूरी तरह छुड़वा दी थी। बाहर से भी अक्सर लिखते रहते थे। अमित पर उनकी प्यार भरी चेतावनी का पूरा असर था। मगर शराब, थोड़ी कम मात्रा में ही सही, कभी-कभी बहुत मानसिक परेशानी में ले लेता था। क्या करता, जीवन में कुछ तो चाहिए...
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
टिप्पणियाँ (2)add
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द्वारा प्रेषित संजय बेंगाणी , मई 02, 2008
अंतिम भाग के बाद एक उदासी सी शेष रह गई. पता ही नहीं चला कब पूरा हुआ. smilies/sad.gif

यह उपन्यास लम्बे काल तक पढ़ा जाता रहेगा.
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द्वारा प्रेषित manoj singh , मई 02, 2008
thanks for comments sanjay, still lot to come,
9 chapter are left
manoj
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