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बन्धन: खण्ड 5 / अध्याय 51
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
सोमवार , , 05 मई
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



खुद डाक्टर होने की वज़ह से, अमित मानसिक बीमारी के बारे में कुछ-कुछ जानता था। मेडिकल कालेज से तमाम किताबें और जॅर'नल भी मँगवा कर पढ़े थे। धीरे-धीरे उसे काफी ज्ञान हो गया था। उसे यह तो पता चल ही गया था कि यह आज कल बड़ी आम बीमारी हो गई है। हर दूसरे नहीं तो चौथे घर में ज़रूर पाई जाती है। बस उसकी तीव्रता में फर्क हो सकता है। कारण भी इस बीमारी के बहुत सारे हैं। जहाँ एक ओर आधुनिक जीवन पद्धति प्रमुख कारण है वहीं फैमिली हिस्ट्री के कारण भी यह हो सकती है। ज़रूरी नहीं कि मानसिक रूप से बीमार माता-पिता की संतान भी बीमार हो या बीमार व्यक्ति के माता-पिता भी मानसिक रूप से बीमार ही हों। मगर संभावना ज़रूर बढ़ जाती है। इस तरह के परिवार में मानसिक रोगी का होना 10 प्रतिशत तक संभव होती है। और फिर कई रूपों में हो सकती हैं... स्ट्रेस डिसऑडर, पैनिक डिसऑडर एवं एंग्जाइटी डिसऑडर। वहीं इन सभी में सामान्यतः थॉट डिसऑडर ज़रूर होता है। कल्पना, सोच, बुद्धि का अस्थिर और अव्यवस्थित होना। किस वज़ह से निकिता को यह बीमारी हुई, कहना मुश्किल था, मगर थॉट डिसऑडर अर्थात विचार विकृति ज़रूर थी।
इस बीमारी की सबसे बड़ी परेशानी जो अमित ज़्यादा बेहतर रूप में समझता था... कि एक तो मरीज़ अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर ही विश्वास करते हुए किसी दूसरी दुनिया में ही होता है, वह इतना अंतर्मुखी हो जाता है कि डाक्टर के पास ही नहीं जाना चाहता। दूसरा समाज में हँसी का पात्र होने के कारण, संबंधित रिश्तेदार इसे छुपाते हैं और अस्पताल ले जाने से कतराते हैं। व्यवस्थित और अच्छे अस्पतालों की कमी के साथ-साथ व्यावसायिकता में यह बीमारी बिल्कुल भी ठीक नहीं हो सकती। लोग रोगी को घर पर रखते तो ज़रूर हैं मगर लाज़, शरम या व्यवस्तता के कारण इलाज़ नहीं करवाते। फिर इलाज़ लंबा और मुश्किल भी है। अमित यह भी जानता था कि उसका इलाज़ पूर्ण रूप से संभव नहीं, मगर इन्हें बेहतर जीने लायक बनाया जा सकता है। परंतु उसके लिए पूर्ण रूप से सबका सहयोग एवं समय चाहिए। वह भी तो... घर पर विभिन्न परेशानियों के कारण पहले न तो निकिता को पूरा समय दे पाता था, न ही बच्चों को। जहाँ आकांक्षा और मालती से निकिता दूर रहती थी वहीं अनिरुद्ध अपनी माँ से दूर रहने के चक्कर में लड़ता रहता था। घर का वातावरण बनने की जगह बिगड़ता ही जा रहा था। मगर अब शायद कुछ कर पायेगा। अमित को पता चला था कि बेहतर दवाइयाँ भी आ चुकी हैं। शायद वह इस बारे में अब चर्चा कर पायेगा और निकिता को डाक्टरों के पास चलने के लिए मना पाएगा।
अमित ने महसूस किया था कि... अक्सर आस-पड़ोस में रहने वालों के व्यवहार या आचरण से भी डरकर मरीज़ अंदर घर में बंद हो जाता है। बीमारी की प्रारंभिक अवस्था से ही उसे सदैव डर बना रहता है और वह लोगों का सामना नहीं कर पाता। सत्य से दूर रहता है और अपनी नकारात्मक सोच की दुनिया में बढ़ता जाता है। निकिता के लिए अनिरुद्ध को छोड़कर सुप्रिया, मालती, आकांक्षा यहाँ तक कि अमित भी दुश्मन ही नज़र आता था। और वह इस सोच की ओर बढ़ती चली गई थी। अमित इस बात को समझता था तभी तो निकिता द्वारा बोले गये शब्दों से वह थोड़े समय के लिए ही आहत होता था फिर ठीक हो जाता था। उसे आज भी निकिता से प्यार था। उसे इस बीमारी के लक्षणों के बारे में मालूम था। इनकी दुनिया ही अलग और निराली होती है। …जहाँ एक ओर पॉजीटिव सिमटम और नेगेटिव सिमटम होते हैं वही डिसऑर्गेनाइज़्ड सिमटम और डिसटार्टेड थॉट भी आते रहते हैं। पॉसीटिव सिमटम में इलुशन एवं डिलुशन दोनों ही विद्यमान होते हैं। अमित ने विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया तो पाया कि जहाँ निकिता को इलूशन था कि कुछ लोग उसे मारने वाले हैं खासकर अमित से जुड़े लोग, वहीं डिलुशन था कि आकांक्षा उसकी बेटी नहीं है, और वह सबके साथ मिलकर उसे मारेगी। निकिता को और भी बहुत से भ्रम और मिथ्या थी। नेगेटिव थॉट में उसे किसी से भी मिलना अच्छा नहीं लगता था। डिसआरगेनाइज्ड एवं डिसटार्टेड थॉट में, एक बात को बहुत देर तक सही दिशा में नहीं सोच पाती थी और उनका लॉजिकल अंत नहीं कर पाती थी। बार-बार उसका अमित से हाथ धुलवाना, जिसका इतने वर्षों में कभी अंत नहीं हो पाया था। सदैव लोगों से सामान बाएं हाथ से ही लेना उसके आत्मविश्वास की कमी को दिखाता था। जब नकारात्मक सोच बढ़ जाती तो माँ के ज़िंदा रहने पर उनसे भी कई बार हाथ धुला-धुला कर संतुष्ट नहीं हो पाती और दूसरी ओर नाराज़गी में आकांक्षा को गाली भी देती और हाथ भी धुलवाती। आकांक्षा घंटों या तो कई बार बाएं हाथ से चाय देती या दसियों बार हाथ धोती रहती और फिर घंटों रोती। अनिरुद्ध के चिल्लाकर डाँट देने से, निकिता सदैव उससे भयभीत रहती और उसका सामना कम करती थी। अमित तो उसका रोज़ शिकार होता था।
वर्षों से अमित ने निकिता में भावशून्यता भी देखी थी। सुप्रिया और माँ के देहांत पर भी वह नहीं रोयी थी। हाँ, कई दिनों तक पथराई हुई आँखों से गुमसुम होकर अगर बैठ गई तो फिर उठती ही नहीं थी। फिर अपना शरीर और कमरा सब गंदा रखती थी। बदबूदार चद्दरों को भी कई दिनों तक नहीं बदलती थी। अमित को उन गंदी चद्दरों पर ही सोना पड़ता। धीरे-धीरे बदबू में सोने की उसको आदत पड़ गई थी।
निकिता पर दवाइयों का साइड एफेक्ट भी था। शरीर काफी फूल चुका था। एंटी साइकोटिक दवाइयाँ हैलोपरिडॉल, क्लोरपोरमजीत एवं ट्राइफ्लपैराजीन की डोज में एडजस्टमेंट न होने की वज़ह से निथरोलेप्टिक मेलिनेट सिण्डोरम, एनएमएस नाम का साइड एफेक्ट भी हो चुका था। सारी शरीर की माँसपेशियाँ जकड़ कर शरीर को कमज़ोर और दर्द से भर देती थीं। मुँह सूखना और पेट में दर्द व शौच न होने की शिकायत अत्यधिक बढ़ गई थी। खड़े होते ही शरीर काँपने और ब्लड प्रेशर में गिरावट आ जाती थी। इसके कारण अत्यधिक डिप्रेशन हो जाता और दूसरे सिस्टम भी बिगड़ जाते। इस वज़ह से फिर एंटी डिप्रेशन मेडिकेशन करना पड़ता। अधिक जानकारी न होने से दवाइयों का उल्टा असर पडऩे लगा था। अमित को शीघ्र ही डाक्टर से परामर्श करना था। उसने सुन रखा था कि क्लोजापाइन नयी एंटी साइकोटिक ड्रग मार्केट में उपलब्ध है।
इस तरह के मानसिक रोगियों को सँभालने के बेहतर तरीक़े भी हैं जिसे वह अब तक पूरी तरह से प्रक्रिया में नहीं ला पाया था। और उसी की शुरुआत करते हुए, विश्वास जीतने के लिए एक दिन बात-बात में अमित ने निकिता से कहा था,
''देखो मैंने सब को यहाँ से भेज दिया है। अब कोई भी घर पर नहीं है। सुप्रिया गयी। माँ गयी। और अब आकांक्षा भी चली गयी। अब तुम्हें कोई भी नहीं मारेगा। और हाँ, देखो, मैंने अच्छे से हाथ भी धो लिया है।''
निकिता इस तरह की बातों से अक्सर बहुत खुश हो जाती थी। जो हुक्म चलाती अमित वही करता रहता। कई बार घंटों तक निकिता उसका हाथ धुलाती और वह खड़ा होकर उसे प्यार से सँभालते हुए हाथ धोता रहता। वह नहीं थकती मगर अमित थक जाता था। मगर उसने उसका विश्वास धीरे-धीरे प्राप्त कर लिया था। वह करता वही जो वह कहती मगर धीरे से उसे वास्तविकता से भी परिचय करवाता। वह घंटों तक उसके साथ, प्यार में, बच्चों की तरह खेलती। कुछ महीनों के बाद निकिता बच्चों के जैसे उसके साथ चिपककर सोने भी लगी थी। एंटी साइकॉटिक मेडिसन के प्रभाव से सेडेशन भी रहता था। निकिता तो जल्द ही सो जाती पर अमित उसे अपनी बाँहों से अलग नहीं करता। उसके शरीर को स्पर्श का एहसास देता रहता। अपने संपूर्ण जीवन में एक ही नारी के शरीर को उसने अब तक छुआ था। उस आनंद के आकर्षण से वह आज भी बंधा था। हाँ, यह बंधन अब शारीरिक कम मानसिक ज़्यादा होता जा रहा था।
हर हफ्ते एक बार ज़रूर दोनों बच्चों को चिट्ठी लिखता। जो लिखता उसको मौका देखकर धीरे से निकिता को ज़रूर सुनाता। बच्चों की चिट्ठी को भी पढ़कर सुनाता। हाँ, आकांक्षा और अदिति की चिट्ठी को मौका देखकर ही पढ़ता था। कई बार आकांक्षा के पत्र को पढ़ता पर आख़िरी में कहता, ''देखो कितनी झूठी हैं सब ग़लत लिखती है। वह तो तुम्हें शायद मारना चाहती थी।''
कभी निकिता खुश हो जाती तो कभी इस बात पर चुप। मगर धीरे-धीरे उसकी बातें सुनने ज़रूर लगी थी।
कभी-कभी वह ठीक होती तो सुबह गेट पर उसकी विदाई करती और फिर दोपहर में उसका इंतज़ार। अगर कभी घर की सफ़ाई करती तो घंटों सफ़ाई ही करती रहती। कभी दिनभर रसोई में लक्ष्मी से बात करती और कुछ-कुछ बनाती ही रहती। कभी अच्छा और कभी बुरा। फिर अमित को सब खाना ज़रूर पड़ता था। बातें करती तो घंटों बातें करती, बच्चों की चिंता करती तो उदास होकर सो जाती। मगर हर दौर में विचार कहीं न कहीं अव्यवस्थित ज़रूर हो जाते थे। परंतु उनका समय, काल और क्रम कम होता जा रहा था। कभी-कभी बागीचे में बैठे रहती और लक्ष्मी पीछे से आवाज़ देती रह जाती। शून्य में आसमान की ओर ताकती रहती। पक्षियों से अक्सर बातें करती रहती। अब बहुत ही कम होता था जब वह अमित के काबू से बाहर होती। हाँ, वह घर के बाहर के गेट पर ज़रूर ताला लगाकर जाता कि कहीं वह बागीचे से बाहर न निकल जाए।
मन को लगाने के लिए अस्पताल में हर रोगी के साथ अमित भावनात्मक रूप से जुड़कर, खूब सेवा करता। कई बार रात को भी बिना ड्‌यूटी के वार्ड में चक्कर लगा आता था। उससे उसे खुशी मिलती और उसका दिल भी बहल जाता था। मगर हर कार्य वह निकिता को समय देने के बाद ही करता था। घर का सामान लाना हो तो अक्सर निकिता को भी साथ ले जाता। कई बार बड़ी हास्यास्पद स्थिति हो जाती पर अमित कुछ न कहता। एक बार उसने किराने की दुकान से दो किलो नमक और सौ ग्राम शक्कर आर्डर कर दिया था। अमित ने पूछा तो धीरे से बोल पड़ी,
''मुझे घर चलाना हैं तुम्हें क्या पता।''
अमित खुशी-खुशी सामान ले आया था। बाद में भी कई दिनों तक शक्कर कम ही आती रही। हाँ, अमित बाद में धीरे से अतिरिक्त शक्कर ले आया था। लोगों के सामने हँसी का पात्र बनने के बावजूद अमित ने हिम्मत नहीं हारी थी। मकसद था निकिता को व्यस्त रखना। उसके अंदर आत्मविश्वास पैदा करना।
दर्जनी मोहल्ले के लोग भी अस्पताल आते रहते थे। मोहल्ले की ख़बर मिलती रहती थी। अमित का दिल बहुत करता जाने का, महीनों वर्षों हो जाते, मगर जा नहीं पाता था। अस्पताल और निकिता से फुर्सत ही नहीं मिलती थी। फिर घर भी देखना पड़ता था। मोहल्ले के लोग अपनी बीमारी का इलाज़ कराने उसी के पास अस्पताल आ जाते थे। बच्चे और बहू के बारे में अक्सर पूछ जाते। बड़े सैनी और गुप्ता जी गुज़र गये थे। अलका आँटी की माँ भी चल बसी थी। गुरुजी के देहांत से उसे बड़ा सदमा लगा था। थोड़ी देर के लिए क्रिया में गया था, उनके घर। ललन बूढ़ा हो गया था मगर दूध बेचना नहीं छोड़ा था। हाँ, अब आता मोटरसाइकिल पर था। रोज़ हालचाल धीरे से पूछ ही लेता था। बचपन से अमित को देख रहा था, उसे उससे मोहब्बत थी। लक्ष्मी से कई बार बहू की बीमारी पर अपनी चिंता ज़रूर ज़ाहिर कर देता था। अक्सर कुछ देर के लिए बंगले की सीढ़ियों पर बैठ भी जाता था, फिर अमित से बात किए बिना या देखे बिना नहीं जाता।
अमित, जबलपुर के प्रसिद्ध साइकॉइट्रिस्ट डाक्टर पटेल और डाक्टर चौधरी से बातचीत करता रहता और नियमित चर्चा करके निकिता के लिए दवाई ज़रूर समय से लेता रहता। भुसावल रेलवे अस्पताल के डाक्टर आनंद से भी लगातार संपर्क में था। उन्हीं के कहने पर उसने हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध साइकॉइट्रिस्ट डाक्टर सिंह से भी मिलकर परामर्श लेने का कार्यक्रम बनाया था। मन में ख़यालात आते ही कि इसी बहाने वह हिमाचल देख लेगा... विशेषकर शिमला भी। और उसने जल्द ही वहाँ जाने का प्रोग्राम बना लिया था...
घर से निकले तो निकिता को शिमला घूमने जाने का बहाना ही बताया था। रेलवे में अधिकारियों, कर्मचारियों को मुफ्त रेल पास की व्यवस्था तो होती ही है। सुंदर स्थानों पर गेस्ट हाउस भी बने होते हैं। सो ठहरने का सारा इंतज़ाम पहले ही कर लिया था। शिमला के अलावा धर्मपुर के पास के गेस्ट हाउस में भी कमरा बुक करवा लिया था। वैसे तो कालका से शिमला जाने के लिए छोटी लाइन की ट्रेन थी। मगर फिर डाक्टर सिंह का अस्पताल रास्ते में धर्मपुर में था। सो कालका स्टेशन पर उतरकर उसने धर्मपुर के लिए टैक्सी कर ली थी। डाक्टर सिंह के मशहूर मेंटल अस्पताल से कई लोगों को बहुत फ़ायदा हुआ है ...ऐसा उसने सुन रखा था। ...और उसके दिल में भी नयी आशाओं ने सिर उठाया था।
कालका से चलने पर परवाणु कस्बे के बाद अचानक दिखे पहाड़ों की ऊँचाइयों से निकिता बच्चों के समान खुश हुई थी। अमित भी हिमाचल की सुंदरता में डूब रहा था। सर्पिले रास्ते पर चढऩा शुरू करते ही, थोड़ी देर में ही निकिता ने गाड़ी रुकवाई और सड़क के किनारे जाकर खड़ी हो गई थी। नीचे खाई और सामने पहाड़ की ऊँचाइयों को बहुत देर तक वह ताकती रही थी। मनोरोगी में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति अधिक होती है। निकिता बात-बात पर ऐसा कहती भी थी। यही सोचकर ध्यान रखने के लिए अमित साथ-साथ ही खड़ा हुआ था। हवाओं में ठंडक थीं। तेज़ बहती हवाओं ने अमित के बालों को पूरी तरह अस्तव्यस्त कर रखा था। निकिता के दोनों ओर लटक रही लटाओं से भी वो अठखेलियां खेल रही थीं। अमित अपने बालों को हाथों से बार-बार संभालता मगर निकिता इन सबसे बेख़बर थी। पलके स्थिर मगर आँखें चलायमान थीं। अचानक बहुत देर के बाद निकिता ने सोचते हुए कहा था,
''क्या पहाडिय़ों से धक्का देकर मारने लाये हो?''
एक मिनट के लिए तो वो समझ न सका फिर हँसते हुए प्यार से कहने लगा था,
''...नहीं रे पगली हम तो हनीमून मनाने आए हैं।''
''अच्छा! यह तो तुमने मुझे बताया ही नहीं...''
बोलते-बोलते एकदम से खुश होकर निकिता ने उसका सड़क पर ही चुंबन ले लिया था। और फिर शरमाते हुए आगे कहने लगी,
''...मीठा है, हनीमून में ऐसा ही करते हैं।''
अमित ने भी कमर से उसे पकड़कर अपने नज़दीक किया और प्रेम से उसकी आँखों में झाँका था। दुनिया क्या कहेगी इस बात की चिंता अब उसे नहीं थी। हाँ, उन्हें इस उम्र में ऐसी हालत में देखकर सड़क पर जाती हुई गाडिय़ों में बैठे नये हनीमून के जोड़ों ने आपस में बहुत-सी बातें ज़रूर की थी। शायद, दूर से अपने भविष्य को देखकर, वे रोमांचित हो उठे थे। उधर, टैक्सी का ड्राइवर भी यह दृश्य देखकर मुस्कुरा दिया था। 
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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