|
बन्धन: खण्ड 5 / अध्याय 53 |
|
उपन्यास
|
|
बुधवार , , 07 मई |
| |
 |
मनोज सिंह
|
|
समय कहाँ, कैसे बीतता चला गया, पता ही नहीं चला। धीरे-धीरे अमित अंदर ही अंदर कमज़ोर होता जा रहा था। वह यह जान चुका था कि निकिता पूरी तरह से ठीक नहीं हो सकती, परंतु उसके बाद उसका क्या होगा? वह यह सोच-सोच कर परेशान हो जाता था। एक दिन अचानक दिल्ली ससुराल से उसे फ़ोन आया था। प्रणिता के बारे में सुना तो बेहद दुःख हुआ था। प्रणिता निकिता की जुड़वाँ बहन थी उसके जैसे ही बहुत सुंदर और आकर्षक, मगर निकिता के मुकाबले कम बोलती थी और सदैव मुस्कुराती रहती थी। अमित को उस घर से थोड़ा बहुत प्यार और अपनापन अगर कहीं से मिला तो वो प्रणिता से ही था। वह हर बार अमित से बड़ी आत्मीयता से मिली थी। उसके चेहरे पर कभी भी अमित के लिए उलाहना या तिरस्कार के भाव नहीं आए थे। अच्छे बड़े बिज़नेस घर में शादी हुई थी। लड़का भी स्मार्ट था। शादी में अमित अपने सारे उसूल और बेइज़्ज़ती को भुलाकर, निकिता के कहने पर दिल्ली गया था। मगर शादी के बाद जल्दी लौट आया था। शादी की रात भी उसे हर बात पर हीन भावना से ग्रसित कराया गया था। वह सिर्फ निकिता की खुशी और अपने फर्ज़ के लिए खड़ा रहा था जबकि उस रात भी उसका अस्तित्व नहीं के बराबर था। इस तिरस्कृत भावना का कोई कारण उसे आज तक समझ नहीं आया था। निकिता का मन रखने के लिए उसे भी सभी से मिलवाया गया था। उसके साथ ऐसा क्यूँ किया जाता है, इसका कोई भी जवाब वह नहीं ढूँढ़ पाया था। मगर फिर भी उसने अपने ससुराल से कभी किसी तरह की अपेक्षा ही नहीं की थी। हाँ, ऐसा लगता था कि निकिता के माँ-बाप को निकिता के लिए किसी बड़े घर की तलाश थी। पैसा उनके जीवन में शायद महत्वपूर्ण था।
...उस दिन मिसेज सूद, उसकी सास, खुद लाइन पर थीं। बहुत देर रोने के बाद उन्होंने बताया कि प्रणिता को उसके पति ने तलाक दे दिया है। और प्रणिता की हालत ख़राब है।
''मगर वह तो अपने घर का पूरा ख़याल रखती थी। और फिर दोनों खुश थे।'' वह पूछ बैठा था,
''हाँ, बेटा, मगर कुछ दिनों से डिप्रेशन में अधिक रहती थी। दामाद कहता है मैंने अपनी ज़िंदगी पागल के साथ नहीं गुजारनी है। हमने बहुत समझाने की कोशिश की, मगर वह समझता ही नहीं। ससुराल वाले रखने को तैयार नहीं हैं। बच्चे भी अपने पास रख लिये हैं।''
''बताइये मैं क्या कर सकता हूँ?''
''कुछ दिनों के लिए प्रणिता को अपने पास बुला लो। उसके पापा की तबीयत बहुत खराब है। सात दिनों से कुछ नहीं खाया। पानी भी नहीं पिया है। अस्पताल में एडमिट कराना पड़ा। मेरा बेटा घर में अपनी बहन को साथ रखने को तैयार नहीं। बहू कहती है हम ही घर छोड़ देगें।''
''क्यूँ पिताजी को क्या हुआ?''
अमित एकदम से घबरा गया था।
''अब तुमसे क्या छुपाना बेटा। इनको बहुत पहले से डिप्रेशन की परेशानी थी। मैं इन्हें कभी भी कोई तनाव नहीं होने देती थी। पूरा इलाज़ करवाया था। दवाई लेते रहते थे। ...वैसे तो ठीक ही रहते थे। बस थोड़ा-थोड़ा कभी गुस्सा ज़रूर आ जाता था और बात-बात पर लड़ने लगते थे। तुम तो जानते ही हो बाइपोलर डिसऑडर में अक्सर ऐसा होता है। प्रणिता को ऐसी हालात में देखकर उनकी हालात एकदम से खराब हो गई है और वह सॉइकोटिक स्टेट में पहुँच गये हैं और...।''
मिसेज सूद टेलीफ़ोन पर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी थीं।
अमित एकदम से सन्न हो गया था। जीवन की रीत भी अजीब है। समाज की तो ख़ैर क्या कहना। कोई भी किसी को समझ ही नहीं पाता। उसकी निगाह में तो प्रणिता और उसका पति, परिवार सहित अत्यंत खुश दिखाई देते थे। निकिता भी उसकी और उसके घर वाले की बड़ाई करते नहीं थकती थी। ससुराल में दूसरे दामाद की बहुत इज़्ज़त और पूछ थी। अमित को तो एकदम घटिया और बेकार चीज़ समझा जाता था। मगर सिक्का खोटा है या असली, दुकान पर चलने से ही समझ में आता है। दुनिया में लोग चालाकी तो बहुत करते हैं मगर दुःख किस रास्ते आ जाये पता नहीं चलता। उसे याद आ रहा था... जब वह ससुराल, निकिता के इलाज़ के लिए उसका संपूर्ण विवरण और जानकारी हासिल करने, वर्षों पहले गया था तब वहाँ से सहयोग की अपेक्षा थी, मगर दोनों सास-ससुर ने उस से गालियों से बात की थी। कहने लगे, 'कोर्ट से डायवोर्स लेना चाहता है। प्रूफ इकट्ठा कर रहा है।' ...उस दिन के बाद से वह फिर कभी नहीं गया था। प्रण तो पहले भी किया था कि ससुराल नहीं जाएगा परंतु डाक्टर के परामर्श पर ही उस बार गया था। मगर आज उनकी हालत सुनकर उसे एकदम से प्यार आने लगा था। भोला जो था। और फिर भावनाओं में बहकर आख़िर में कह उठा,
''मैं निकिता से एक बार बात कर लूँ। उसकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती है। फिर भी आप चिंता न करें, सब ठीक हो जायेगा।''
घर पर आकर उसने मौका देखकर बात की थी। पहले तो वो उसकी बात चुपचाप सुनती रही मगर जैसे ही उसने निकिता से कहा,
''हम प्रणिता को यहाँ बुला लेते हैं कुछ दिनों की ही तो बात है। मुसीबत में अपनों का साथ देना चाहिए।'' सुनते ही वह उखड़ गई थी।
''बिल्कुल नहीं, मैं मना कर देती हूँ। क्या हमनें किसी का ठेका लिया हुआ है। खबरदार बात की तो, सारे चालाकी कर रहे हैं। वो तो मम्मी-पापा की बात बिल्कुल भी नहीं सुनती थी। कहती रहती थी कि हमारे घर के मामले में दखलअंदाजी नहीं करना। देखो मैंने अपनी मम्मी की बात हमेशा मानी तो कितनी खुश हूँ। माँ बचपन से ही कहती थी, सारे सास-ससुर खराब होते हैं। मुझे याद है, इसीलिए तो मैंने सारों को मार दिया। और देखो मुझे कोई नहीं मार पाया। प्रणिता तो नहीं मानती थी। तो देखा, उसके ससुराल वाले कितने खराब निकले। अब जैसा किया वैसा भुगतना पड़ेगा। मरने दो उसको। मेरे घर में कोई और रहे मुझे पसंद नहीं। फिर तुम्हारा क्या विश्वास, उसके साथ ही मिलकर मुझको मार दो।''
निकिता का पारा चढ़ रहा था। लगातार बुदबुदा रही थी। अमित को सुनकर अजीब-सा लगा। कैसी दुनिया है इनकी। इन्हें यह भी नहीं पता, क्या सच है क्या झूठ, क्या कहना है और क्या नहीं कहना। कितने भोले हैं। इनकी दुनिया ही अलग है। अगर हम इनके साथ खिलवाड़ न करें, तो ही बेहतर है। सासू माँ, निकिता को जाने-अनजाने में भी ऐसी शिक्षा नहीं देती तो शायद बेहतर होता। अजीब दुनिया है जहाँ प्यार देने वाले हैं तो लेने वालों की कमी है, जहाँ लेने वाले खड़े हैं, वहाँ देने वाला कोई नहीं।
डाक्टर की बात भी सच निकली थी। जुड़वाँ बच्चों में एक को मानसिक रोग होने पर दूसरे में होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। प्रणिता भी निकिता की तरह मानसिक रोग से पीड़ित हो चुकी थी। बस फ़र्क इतना था कि उसकी बीमारी देर से प्रारंभ हुई थी। और अभी उसमें तीव्रता नहीं थी।
अमित को अब तक समझ में आ गया था कि निकिता डिसऑडर में सोचती कुछ और है और बात कुछ और निकल जाती है। पर एक बात साफ़ हो गई थी कि वह उसे किसी और के साथ शेयर नहीं कर सकती, उसे किसी ओर के साथ बाँट नहीं सकती। एक नये भय से उसने अपने ही घर फिर शायद कभी बात नहीं की थी। अमित मजबूर था ससुराल अब अक्सर बात कर लेता था, सांत्वना भी दे देता था, मगर वो परिवार भी अब अपने हिस्से की किस्मत की मार को झेल रहा था। सुख-दुःख पर किसी का ज़ोर नहीं।
|
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
|
|
|
|