बन्धन: खण्ड 5/ अध्याय 59
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 3
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
गुरुवार , , 15 मई
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



नवरात्र शुरू हो चुके थे। सुबह बहुत देर तक अमित नहीं उठा था। ललन दूध देने आया तो पहली बार निकिता बहू को बर्तन हाथ में लिये दरवाज़ा खोलते देख आश्चर्यचकित हुआ था।
''ललन जी आपके साहब नहीं उठ रहे, थोड़ा देखेंगे, क्या बात है?
ललन तो समझ ही नहीं पाया था। बहू की आवाज़ एकदम शांत और सीधी थी। चेहरे पर हल्की-सी सूजन थी। बाल बिखरे हुए थे। किसी अनिष्ट की आशंका से रोने की हालत में पहुँच गया था। अंदर जाने से कतराने लगा तो ज़ोर से लक्ष्मी को आवाज़ लगायी थी। निकिता पास ही खड़ी-खड़ी सब कुछ सिर्फ देख रही थी। लक्ष्मी दौड़ी-दौड़ी आयी फिर दोनों साथ ही अंदर जाकर देखने लगे थे। अमित बिस्तर पर लेटा हुआ था और आँखें खुली हुई थीं। यूँ लग रहा था कि जैसे शायद किसी का इंतज़ार हो। शरीर हिलाया तो उसमें कोई जान नहीं थी। ललन ज़ोर से फफक कर रो पड़ा था। लक्ष्मी की आँखों में भी तेज़धार थी। निकिता घर के दरवाज़े पर पत्थर बनी खड़ी हुई थी और फिर हक़ीक़त से अनजान मासूमियत से बोल पड़ी,
''मैंने देखा था। डाक्टर साहब की नब्ज़ नहीं चल रही थी।''
आज उसकी आँखों में शून्यता की जगह उदासी थी और वे आँखें नींद में डूब रही थीं। ललन ने दौड़कर सबको इकट्ठा कर लिया था। दोपहर तक सभी आ चुके थे। निकिता को थोड़ी देर के लिए नींद में सुलाने की कोशिश की गई थी। मगर वो हर बार उठकर सिर्फ यही पूछने लगती,
''क्या हुआ?''
दर्जनी मोहल्ले के लोग भी आ चुके थे। लंदन से भी फ़ोन पूछताछ के लिए आया था। पता चला कि बच्चों को हिन्दुस्तान से एक बिना अर्थ का अटपटा ई-मेल गया था। पढ़कर अदिति को भी अजीब लगा तो उसी ने फ़ोन किया था। तभी वो अमित के देहांत के बारे में जान पाई थी। तब तक अमित का दाह-संस्कार कर दिया गया था। इतनी दूर से इतनी जल्दी बच्चों के आने की संभावना नहीं थी। उधर, देर शाम निकिता की नींद खुली तो पूछने लगी,
''डाक्टर साहब कहाँ है? मैंने उनके बच्चों को मेल कर दिया था। ...क्या वो लोग आए नहीं?''
निकिता को बहुत समझाने की कोशिश की गई थी मगर मानने का नाम ही नहीं लेती थी। कहती थी... 'अमित से कुछ काम है। उससे मिलना है।' घर का सारा ज़िम्मा दर्जनी मोहल्ले के सुपुर्द था। बच्चों के लंदन से आने में अभी व़क्त था। 'तेरहवीं तक ज़रूर पहुँचेंगे...' ऐसा अदिति ने फ़ोन पर कहा था, '...आकांक्षा सुनते ही बेहोशी की हालत में अस्पताल पहुँच चुकी है। जल्दी ठीक हुई तो पहले भी आ सकते हैं।'
मोहल्ले का दशहरा फीका हो गया था। दर्जनी मोहल्ले का एक घर जो वर्षों से बंद रहता था आज पूरी तरह उजड़ चुका था। किसी के दुःख का ऐसा अंत होगा किसी ने सोचा न था। सभी अंदर से दुःखी थे। शाम की आरती में अब वो जोश व उत्साह नहीं होता। सबकी निगाहें माता से एक ही सवाल पूछती, ''ये तेरा कैसा इंसाफ...?''
एक दिन निकिता ललन से ज़िद्द करके दर्जनी मोहल्ले में आ गई थी। कहने लगी,
''अमित यहाँ ज़रूर होंगे।'' और फिर हर घर में जाकर पूछती। दरवाज़ा खटखटाती और फिर अपने बाल खुजाती, फिर धीरे से पूछती, ''अमित है क्या...?'' अपने घर के सामने भी बहुत देर तक खटखटाती रही थी। एक नवयुवक ने ही उसे कहा था, ''अब यहाँ कोई नहीं रहता...'' और फिर उसे आगे के घर की ओर ले गया था। निकिता ने पीछे मुड़कर कई बार उस दरवाज़े की ओर देखा... कुछ याद आता मगर फिर दिमाग़ भ्रमित हो जाता। शाम तक यही सिलसिला चलता रहा,
और फिर अमित के नहीं मिलने पर मंडप में बच्चों से पूछने लगी,
''अमित अंकल को देखा, बेटा?''
एक बच्चा भोलेपन से कह गया था,
''वो तो माता के पास जा चुके हैं।''
सुनकर घंटों तक निकिता वहीं दुर्गा के मंडप में बैठी रही थी और अमित का इंतज़ार करती रही। मोहल्ले की कई औरतें उसकी हालत देख फफक कर रो पड़ती तो बुजुर्गों ने सोचा था, चलो माँ के दरबार में बैठी रहेगी।


उधर, अदिति को सुबह-सुबह घर पहुँचने की जल्दी थी। आज अमित की तेरहवीं थी। दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरकर वहाँ से जबलपुर ट्रेन में आ रही थी। क्या करती, जबलपुर के लिए हवाई यात्रा की व्यवस्था न थी। रास्ते में ट्रेन थोड़ी लेट होने लगी तो अदिति को चिंता हुई थी। बच्चों को किसी भी तरह कम से कम अपने पिता की तेरहवीं पर ज़रूर पहुँचाना चाहती थी। अनिरुद्ध माँ के लिए चिंतित था तो आकांक्षा को अब तक ठीक से होश नहीं आया था। माँ से मिलकर खूब रोयेगी बस यही दिल में बार-बार आ रहा था। एक घंटा लेट ही सही ट्रेन ने सुबह के सात बजे जबलपुर स्टेशन में प्रवेश किया था। वहाँ उतरते ही अदिति ने बिना समय गँवाए ऑटो किया और वे चारों घर की ओर रवाना हुए थे। रेलवे बंगला पास ही था। मगर आज दूर लग रहा था। वहाँ पहुँचते ही उन्होंने देखा कि घर के बाहर बहुत भीड़ लगी थी। अनिरुद्ध ऑटो से कूदकर भीड़ में घुसने लगा तो पीछे-पीछे अदिति भी थी। पास जाकर देखा तो दोनों सन्न रह गये थे। अनिरुद्ध ने आकांक्षा को ज़ोर से आवाज़ लगाई थी। आकांक्षा बदहवास हालत में वहाँ तक पहुँचती तो मैथ्यू भी साथ था। आकांक्षा ने वहाँ पहुँचकर जो कुछ भी देखा तो तुरंत मूर्च्छित होने लगी थी। माँ रोड पर खून से लथपथ हालत में पड़ी हुई थी। उनका रोड पर एक्सीडेंट हुआ था। पुलिस पहले ही पहुँच चुकी थी। उन्हें निकिता की हाथ में एक चिट्ठी मिली थी जिस पर लिखा था,
''अनिरुद्ध, मैं तुम्हारे पापा को ढूँढ़ने जा रही हूँ। आकांक्षा को मत बताना। उनका हाथ बहुत गंदा था। उसे मुझे धुलवाना है। अगर तुम्हें मिले तो मुझे बताना।''
आकांक्षा ने पहली बार अपने आप को पूरी मज़बूती से संभाला था। और नीचे सड़क पर बैठते हुए माँ के चेहरे को पहली बार पकड़कर चूमा था। उसके हाथों और चेहरे पर माँ का खून लग गया था। जिसे आँखों से निकल रहे आसुँओं ने धोने की कोशिश की थी।
मैथ्यू माँ के अंतिम दर्शन कर पाया था। उसने आँखें बंदकर ईश्वर से प्रार्थना की थी। और वह एक नये मज़बूत बंधन में बंध रहा था। पीछे खड़ी अदिति के हाथ अनायास ही आकांक्षा और अनिरुद्ध के सिर पर थे। और वो अपने आँसुओं को एक बार फिर रोकने में सफल हुई थी।
देर शाम अनिरुद्ध ने उसी जगह माँ को अग्नि दी थी, जहाँ पर 13 दिन पहले उसके पिता को जलाया गया था। आग की लपटों को तेज़ी से निकलता देख आज वह सोच रहा था... पापा माँ के बंधन से मुक्त नहीं हो सकते और शायद माँ भी...

समाप्त
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
टिप्पणियाँ (11)add
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द्वारा प्रेषित sumit , मई 15, 2008
...i think it is the end of the novel, but i am not in a position to come out of it.
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द्वारा प्रेषित renu , मई 16, 2008
during the novel reading i felt tons of pains, eyes were full of tears.it has shaken the roots of my heart.it is a great tragic novel.
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द्वारा प्रेषित alok , मई 16, 2008
es per boolywood mai ek hit film ban sakti hai.
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द्वारा प्रेषित sumit guglani , मई 17, 2008
it was great novel i was always think about amit
really it was great job
thanks
sumit
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द्वारा प्रेषित renu , मई 17, 2008
even i think for amit,the great character developed in the novel
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द्वारा प्रेषित arun , मई 19, 2008
(AMIT, AMIT, AMIT ONLY AMIT)
really it was greate character in the novel
careing husband, loving husband, but very alone
i was shoke, kaya koi aisa bee insan ho sakta hai
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द्वारा प्रेषित संजय बेंगाणी , मई 19, 2008
अंत में दुख ही शेष रहा smilies/cry.gif ..घटनाएं दिमाग से निकल नहीं रही....

अब तक महिलाएं ही महान होती थी, उपन्यास में पहली बार कोई पुरूष सहते हुए दिखा है. सच्चाई के करीब सब कुछ.
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एक दुखद अंत
द्वारा प्रेषित SUMIT GUGLANI , मई 20, 2008
हमेशा ओरत को ही महानता का दर्जा दीया जाता हँ लेकिन अमित एक
महान नायक सब कुछ सहा उसने पर कभी भी उफ़ तक नही की
अमित को हमारा सलाम लेकिन एक दुखद अंत


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द्वारा प्रेषित लेखक , मई 24, 2008
शुक्रिया सभी पाठको को। उन पलो को सलाम जो आपने इस उपन्यास को पड़ने के दौरान बिताये।
मनोज सिंह
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for MANOJ JI
द्वारा प्रेषित sumit , मई 26, 2008
MANOJ JI WAITING FOR YOUR NEXT NOVEL WHEN YOU WILL START
PLEASE TELL ME यह ई-मेल देखने के लिये कृपया जावास्क्रिप्ट को चालू करें 9818007300 - Delhi
you are super i have no words

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द्वारा प्रेषित vikash , जून 20, 2008
I'm speechless. The way you described the psychology of a person who loves a mental patient is amazing.
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