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बन्धन : खण्ड 2 / अध्याय 6
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
सोमवार , , 03 मार्च
manojkumar.jpg मनोज सिंह



जबलपुर, मध्य भारत के प्राचीनतम नगरों में से एक। नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ यह शहर कई कारणों से विख्यात रहा। नर्मदा नदी पर संगमरमर की चट्टानों के लिए, जबलपुर के नज़दीक भेड़ाघाट, पर्यटन की दृष्टि से आकर्षण का केन्द्र बना रहा। अंग्रेजों के जमाने से यहाँ पर सिग्नल्स के विभिन्न प्रमुख आर्मी यूनिट के केन्द्र स्थित हैं। दूरसंचार विभाग का राष्ट्रीयस्तर का प्रशिक्षण संस्थान, टेलीकॉम कारखाना, गुणवत्ता विभाग, तो साथ ही व्हीकल फैक्टरी, जो कि शक्तिमान नाम से सेना के लिए ट्रक बनाती है, का विशाल कारखाना भी यहीं स्थित है। जबलपुर के पास की पहाड़ियों में कहा जाता है कि सेना के गोला-बारूद का विशाल भंडार है और साथ ही गन कैरिज फैक्टरी और ऑर्डिनेंस फैक्टरी। सीधा-सा मतलब जनसंख्या के हिसाब से महानगर।

जबलपुर शहर संस्कारधानी के नाम से भी मशहूर है। राष्ट्रीय स्तर के इतने सारे सरकारी कारखाने, संस्थान व सेना के होने से, देश के हर भाग और कोने के विभिन्न धर्म, जाति और बोली के लोग यहाँ आकर रहते हैं और अधिकतर बस भी जाते हैं। चूँकि यहाँ पर हर त्योहार बड़े धूमधाम और उत्साह से मनाया जाता है, प्राचीन संस्कारों का अधिक बोलबाला है, इसलिए इसका नामकरण संस्कारधानी पड़ा। दीवाली, दशहरा, मोहर्रम, होली, रक्षाबंधन, क्रिसमस सभी त्योहार विस्तारपूर्वक बड़े चाव से मनाये जाते हैं। शहरों में रौनक देखते ही बनती है।
दुर्गा पूजा जबलपुर की विशेषता है। शायद पूरे भारत वर्ष में इसका दूसरा या तीसरा स्थान होगा। वह भी कोलकता जैसे महानगर के बाद। सैकड़ों दुर्गा प्रतिमाएं और नौ दिनों तक चलने वाला जबलपुर का एक महाकुंभ। पूरा का पूरा शहर, क्या ग़रीब, क्या अमीर, मानो एक साथ त्योहार मनाने के लिए सड़क पर उतर आता हो। पूरा शहर दुर्गा पूजा में नौ दिनों तक मद मस्त रहता। रात-रात भर हज़ारों की भीड़ सड़कों पर पैदल घूमते हुए बिताती। स्कूटर-कार तो छोड़िए, साइकिल चलाना भी संभव नहीं होता।

हर गली में, हर मोहल्ले और शहर के प्रमुख चौराहों पर बड़ी-बड़ी दुर्गा जी की प्रतिमाएं बड़े ही भव्य व आकर्षक सुन्दर मंडपों में सजी होती। एक मंडप की आकर्षक लाइटों का सिलसिला खत्म नहीं हो पाता कि पास के दूसरे दुर्गा जी के मंडप की सजवाट का क्रम शुरू हो जाता। इस तरह से तक़रीबन सारा शहर और उसकी तमाम सड़कें तरह-तरह की लाइटों से, उनकी श्रृंखलाओं से, उनकी लड़ियों से सजी रहतीं। हर दुर्गा पूजा की प्रतिमा की व्यवस्थाओं के लिए हर मोहल्ले में विभिन्न नामों से मंडल और समीतियाँ बनी होती। जो अपने आगे वर्षों की संख्या लिखकर अपने अधिक से अधिक प्राचीन होने का सबूत देती। हर मंडप में दुर्गा जी की मूर्तियों और हिन्दू संस्कृति की विभिन्न झांकियों के माध्यम से वर्तमान से जुड़ी हुई विभिन्न सामाजिक बुराइयां, प्रचलित घटनाक्रम या बड़ी-बड़ी विचारधाराएं दिखाई जाती। कई जगह रामलीला तो कई जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम। रोड पर लगता जैसे कभी रात हुई ही नहीं हो। कई झांकियाँ, कई मंडल व दुर्गा समीतियां तो दशकों पुरानी हैं। कई जगहों पर तो दुर्गा की इन समितियों के द्वारा पक्के चबूतरे तक बना दिये गये। जो कि वर्षों से हर साल बार-बार प्रयोग में आते रहते हैं। ऐसा नहीं कि अब इनमें कोई कमी आ रही हो, उलटे हर वर्ष इन की संख्या, इसकी व्यवस्था, इसकी रौनक, इसकी चकाचौंध बढ़ती ही चली जा रही है। कानून व्यवस्था की कोई परेशानी नहीं, छिटपुट घटनायें तो स्वाभाविक है, अन्यथा सारा शहर स्वयं व्यवस्थित हो भरपूर आनंद लेता है।

दर्जनी मोहल्ला कैसे पीछे रहता। यहाँ भी वर्षों से दुर्गा पूजा बाकायदा मनायी जाती। सोनकर और सैनी जहाँ इसकी बाहरी व्यवस्थाओं से जुड़ते, तो बंगाली परिवार दुर्गा जी की पूजा-अर्चना में रहता। ये तीनों परिवार पूर्ण रूप से नौ दिनों तक दुर्गा जी के मंडप में ही रहता। इस कार्यक्रम में, इस समिति की पूजा में, पूरे मोहल्ले में जितना सामंजस्य या समन्वय होता, वह देखने लायक होता। कोई भी हो, हर परिवार अपनी शक्ति एवं अपनी-अपनी समझ से जो भी काम कर रहा, वर्षों से करता चला आ रहा है। और हर साल और अधिक बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता। हाईवे की रोड से नीचे मोहल्ले तक की गली में लड़ियों का काम, मोहल्ले का हर बच्चा खुद करता। आने वाला हर नया, किसी भी घर का मेहमान एक ही वर्ष में इस आयोजन का हिस्सा बन जाता। और यहाँ से जाने वाला कोई भी सदस्य, किसी भी परिवार का, दुनिया में कहीं भी गया हो, इन नौ दिनों के कार्यक्रम में आने की सदैव कोशिश करता। इस उत्सव में पूरा मोहल्ला एक परिवार की भाँति इस कार्यक्रम को अंजाम देता। दूसरे त्योहारों में फिर होली हो या दीवाली सब मिलकर मनाते। एक घर की मिठाई सब घरों में जाती। विशेषकर होली अपने-अपने घर न मनाकर नल के नीचे ही मना ली जाती। ऐसा नहीं कि सिर्फ सुख में ही सब एक साथ होते, दुःख में भी सभी परिवार एक साथ इकट्ठा हो जाते थे।
यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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