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बन्धन : खण्ड 2 / अध्याय 7
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
मंगलवार , , 04 मार्च
manojkumar.jpg मनोज सिंह



मास्टर जी के देहांत के समय में मालती अकेली नहीं थी। वैसे भी मास्टर जी पूरे मोहल्ले के मास्टर थे। मोहल्ले के सारे बच्चे, फिर चाहे किसी भी कक्षा के हों, किसी भी परेशानी के लिए उन्हीं के पास आते। मास्टर जी उनकी स्कूल की पढ़ाई में मदद करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। उनकी असामयिक मृत्यु में सारा मोहल्ला इकट्ठा हो गया था। मालती को न तो कुछ करना पड़ा और न ही ज़रूरत थी। तेरह दिनों तक पूरे बारह परिवार एक होकर ऐसे कर रहे थे कि मानो सभी के अपने घरों में ही कोई मौत हो गई हो। यों तो मास्टर जी के भाई भी बाहर से आए हुए थे, परन्तु पूरे मोहल्ले के प्रेम में, उनकी कोई खास उपयोगिता नहीं बची थी। मालती को उन तेरह दिनों में किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं हुई थी। न तो उसे किसी चीज़ की चिंता थी और न ही कोई काम। हाँ, खालीपन ज़रूर आ गया था। असल में वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या हुआ, कैसे हुआ, और क्या होगा। इस बारे में मन और मस्तिष्क दोनों ही काम नहीं कर पा रहे थे।
वैसे तो मास्टरजी पूर्णरूप से स्वस्थ थे। कभी कहीं कोई किसी भी तरह की बीमारी हो, ऐसा दूर से लगता नहीं था। हाँ, बेटी की तकलीफ़ और लाचारी उन्हें सदैव अंदर ही अंदर खाती रहती थी। किसी से अपने दिल का दर्द नहीं बाँटते थे। यहाँ तक कि अपनी पत्नी से भी नहीं। उसे अपने मौन के भीतर कहीं छुपाकर रखते थे। सुप्रिया बेटी के भविष्य को लेकर मालती से कभी ज़िक्र किया हो ऐसा भी नहीं। पुराने ज़माने में वैसे भी पति-पत्नी आपस में बैठकर कम ही बातें करते थे। अमित भी छोटा था। एक रात अचानक उनके सीने में दर्द हुआ। वह बाहर के बरामदे में ज़्यादातर अमित के साथ ही सोया करते थे और मालती सुप्रिया के साथ अंदर। सीने में दर्द को बहुत देर तक वह साधारण-सी बात और गैस की परेशानी समझते रहे। जब बेचैनी बढ़ी और दर्द असहनीय हुआ, पसीना आने लगा तो देर रात बारह बजे उन्होंने मालती को उठाया था। मालती भी कुछ बात न समझते हुए बस पानी का एक गिलास ले आयी और सिर दबाने लगी थी। थोड़ी देर तक वह उसे देखते रहे। देखते-देखते कब उनकी आँखें बंद हुई थीं, यह मालती को भी नहीं पता। जब थोड़ी देर तक उसने आँखों की पलकों को झपकते हुए नहीं देखा, तो पहले तो सोचा कि सो गये हैं। शरीर पर चद्दर डालने के लिए, हाथों के नीचे से चद्दर उठाने के लिए, ज्यों ही हाथों को हटाया, उसमें जान नहीं थी। पहले तो वह समझ नहीं पायी। शरीर को हिलाया तो उतना ही हिला जितना हिलाया गया था। उसमें कोई शक्ति नहीं थी। और फिर पूरे शरीर को हिलाते हुए ज़ोर से एकदम चिल्ला उठी,
''सुनिए।''
जब कोई भी प्रतिक्रिया नहीं हुई तो मालती ज़्यादा ज़ोर से चिल्ला पड़ी थी। अमित अभी छोटा था, माँ की आवाज़ से उठ बैठा था। माँ को चिल्लाता देख, वह अचानक ही बिना कुछ सोचे-समझे रोने लगा। मालती ने बेटे को सीने से एक मिनट के लिए लगाया और फिर अगले ही पल चीख पड़ी थी,
''सुप्रिया! देखना तेरे बाबूजी को क्या हुआ?''
सुप्रिया जो कि रातों को कम ही सोया करती थी। लेटे ही लेटे ऊँची-ऊँची आवाज़ करने लगी थी। मालती को कुछ समझ न आया तो बाहर दौड़ी और सीधे गीता को आवाज़ लगाने लगी थी। गीता के आने के बाद शुक्ला और गुप्ता उठे, इसके पहले कि वे कुछ समझ पाते पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो चुका था। शुक्ला जी तुरंत दौडक़र पास के डाक्टर को बुलाने चले गए थे। मोहल्ले के अधिकांश लोग उसी डाक्टर से इलाज करवाते थे। जल्द ही डाक्टर भी आ गया था। उसने नब्ज़ देखी और जाँच-पड़ताल करके मास्टर जी को मृत घोषित कर दिया था। उसके बाद न तो मालती चिल्लाई, न रोई, उसकी आँखों में बस शून्यता आ गई थी। पड़ोस की औरतों ने रोना-धोना शुरू कर दिया था। आवाज़ें तेज़ होने लगी थीं। सुप्रिया समझ नहीं पा रही थी वह भी तो छोटी ही थी। अमित माँ का पल्ला पकड़कर नज़दीक ही बैठा था। औरतों ने कहना शुरू कर दिया था कि इसे रुलाओ नहीं तो यह पागल हो जाएगी। कोई कहती,
''अब इसका क्या होगा री, कैसे हो गया?''
 कोई ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाती,
''हाय कहाँ चले गये मास्टर जी?''
कोई दहाड़े मारते हुए कहती, ''अरे, इन बच्चों को क्यों छोड़ गये?''
जो भी औरत आती, आने के साथ ही मालती को छूकर बिना कुछ कहे सबसे पहले रोती, अपना दुःख प्रकट करती। कुछ दुःख प्रकट करते हुए मालती के सामने बैठकर रोती। कोई बहू बाहर से ही, घूंघट के अंदर ही रोती हुई आती, तो कोई बाहर दरवाज़े से ही दहाड़े मार-मार कर रोना शुरू कर देती। बाहर आदमियों ने डेरा डालकर, आगे की कार्यवाही के लिए विचार-विमर्श करना शुरू कर दिया था। शुक्ला और गुप्ता दोनों ही निकट के पड़ोसी होने के नाते आगे बढ़कर काम कर रहे थे। सबसे बुजुर्ग सैनी, बंगाली और मद्रासी ने मिलकर निर्देश जारी कर दिया कि 'घरवालों के मन में बात न रहे, मास्टर जी के कम से कम छोटे वाले भाई को बुला लिया जाये।' अब, भैया का पूरा पता कहाँ से पूछे? शुक्ला के समझदार बच्चों ने मालती के पास आकर पूछताछ की। आज तक जो मालती घर के खाने के अलावा किसी भी चीज़ को नहीं जानती थी और न ही उससे पूछा जाता था, वह आज पति के जाने का गम मनाये, पड़ोसियों के रोने का साथ दे या अपने छोटे देवर का पता दे। फिर उसे तो यह मालूम भी नहीं था। वह ज़्यादा कुछ भी नहीं जानती थी। छोटा भाई आता रहता था इसलिए मोहल्ले वाले उसके बारे में कुछ-कुछ जानते थे। अपने-अपने तरीक़े से लोगों ने पता करके और फिर पास ही के टेलीग्राफ ऑफिस, हाईकोर्ट के पीछे से टेलीग्राम करने के लिए सैनी के बेटे को भेज दिया गया था।
अमित रोते-रोते जब थक गया तो शांति से बैठ गया था। चिड़ियों की चहचहाट ने आज मालती का ध्यान आकर्षित नहीं किया था, मगर सुप्रिया की आवाज़ ने उसको चौंकाया तो वह सब कुछ भूलकर उसको शौचालय ले गई थी। पड़ोस की औरतों ने घर की रसोई संभाली, आदमियों ने बाहर का काम। सुबह होने पर तुरन्त बड़े बुजुर्गों ने अपने अनुभव से दाह-संस्कार के सामान की व्यवस्था शुरू कर दी थी। और फिर सब तैयारी करके छोटे भाई का इंतज़ार करने लगे थे। मगर फिर कोई भी समाचार न मिलने पर दोपहर बाद अमित के हाथों से अग्नि-संस्कार कराने के लिए पास के ही श्मशानघाट पर चल दिए थे। सब कुछ जलाकर वापस जब तक लौटते शाम होने लगी थी और सभी तुरंत घर में घुसकर नहाने धोने लगे थे। इस बीच पड़ोस की सभी औरतें दिनभर अपने-अपने घर में बारी-बारी से आती जाती रही थीं।
अमित अपनी बाल्य अवस्था में ही था। उसे कुछ न तो ज्ञान था, न ही समझ पा रहा था। जैसा उसे बताया जाता वह वैसा ही करता। बस उसे इतना पता ज़रूर चल गया था कि उसके बाबूजी का देहांत हो गया है। और यह सोचकर कि अब वो वापस नहीं आयेंगे, उसे अचानक ही बार-बार रोना आ जाया करता था। सारे पड़ोस के चाचा, अंकल उसे प्यार से संभाल रहे थे। जो-जो उसे बताया गया वह वैसा ही करता चला गया। कब आग की लपटों में उसके बाबूजी विलीन हो गये उसे पता ही नहीं चला। सब कुछ आग को भेंटकर, घर आते ही फिर माँ से लिपटकर, पल्ला पकड़े-पकड़े बहुत देर तक रोता रहा था। सुप्रिया के लेटे-लेटे ही रोने पर वह उससे भी लिपट कर रोया था।
कुछ चंद घंटों में ही मालती की सारी ज़िंदगी बदल चुकी थी। पर वह अब तक वास्तविकता नहीं समझ पा रही थी। क्या हुआ, कैसे हुआ, क्या होगा यह विचार उसके मन में अब तक नहीं आया था। देर रात छोटे देवर के आने के बाद सब कुछ घर के अन्दर भी व्यवस्थित होता चला गया। तेरह दिन तक मालती सभी के साथ कार्य करते-करते यह भी नहीं सोच पाई थी कि आगे क्या करना है। उसे आने वाली विपत्ति का एहसास नहीं था। हिन्दू संस्कृति में यह बहुत अच्छा है कि तेरह दिन की चहल-पहल में आदमी धीरे-धीरे कुछ-कुछ भूल जाता है। इन सबके बावजूद मालती सुप्रिया का बराबर ध्यान रखती थी। सुप्रिया वैसे भी रोने के अलावा और क्या कर सकती थी। लेटे-लेटे ही लोगों का आना-जाना देखती रहती और पंडितों के प्रवचन को सुनती रहती। इन प्रवचनों ने उसे ज़्यादा कुछ तो नहीं समझाया, स्वर्ग-नरक व पाप-पुण्य का ज्ञान तो नहीं करवाया, पर यह ज़रूर एहसास करवा दिया कि बाबूजी अब उसे कभी भी प्यार से आकर सिर पर हाथ नही फेरेंगे। हाँ, अमित उसके पास ज़रूर लगातार बैठा रहता और बीच-बीच में माँ का पल्ला पकड़कर लोगों की बातें सुनता रहता। इस तरह से 13 दिन कहाँ बीत गए पता ही नहीं चला और इसके बाद शुरू हुआ जीवन का नया सिलसिला और उसमें छुपा था,
'अब क्या होगा?'

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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