tarakash-universe-logo
बन्धन : खण्ड 2 / अध्याय 9
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
उपन्यास
गुरुवार , , 06 मार्च
manojkumar.jpg मनोज सिंह



उच्च, मध्यम एवं निम्न, यह तीन वर्ग हैं समाज में। समाज को इन तीन भागों में बाँटा भी जा सकता है। उच्च वर्ग, जिनके पास हर चीज़ आवश्यकता से अधिक है... सामाजिक रुतबा, रुपया, पैसा और ज़मीन-जायदाद। भावनाओं का यहाँ पर थोड़ा कम महत्व है। निम्न वर्ग जहाँ आवश्यकता और ज़रूरत से कम, दूसरे शब्दों में ग़रीब। अब जो निम्न है वो पूरी तरह से निम्न है। उन्हें और परिभाषित नहीं किया जा सकता। ग़रीब, ज़्यादा ग़रीब, भिखारी, ग़रीबी रेखा से नीचे पलने वाले लोग जिन्हें दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता... इस तरीक़े से इस वर्ग को और आगे विभाजित करना शायद ठीक नहीं होगा, न ही इसकी आवश्यकता है। उसी तरह उच्च वर्ग में भी अधिक, बहुत ज़्यादा, थोड़ा-अधिक, अति-उच्च, थोड़ा-उच्च इसे भी विभाजित करने की ज़रूरत नहीं है।

मध्यम, बीच वाला। ये बीच का वर्ग कई मायने में विशिष्ट भी होता है और कई तरह से कष्टदायक भी। इसके तीन भाग किए जा सकते हैं। उच्च मध्यम जो उच्च वर्ग में जाने के लायक नहीं है। परंतु जो सदैव इस कोशिश में लगा रहता है कि किसी तरह ऊपर के वर्ग में पहुँच जायें। मध्यम वर्ग में कहलाना उसे पसंद नहीं। इस वर्ग का बोले जाने पर उसे शरम महसूस होती है। यह वर्ग थोड़ी कोशिशों से उच्च वर्ग में पहुँच सकता है। पहुँचते भी हैं लोग। मध्यम मध्यम वर्ग, ठीक-ठीक, बीच का। परन्तु निम्न मध्यम मतलब कि थोड़ी-सी भी कमी या चूक से आदमी ग़रीबी रेखा के नज़दीक पहुँच सकता है। रोज़ कमाया, रोज़ खाया। जितनी आवश्यकता है दो वक्त की रोटी की, उतनी ही मिल रही है। उससे अधिक चाहत करने पर कठिनाइयाँ हो सकती है, तकलीफ़ हो सकती है। इसमें ज़्यादातर लोग रोज़ कमाने वाले या छोटी-मोटी नौकरी करने वाले होते हैं। मालती और मास्टर जी इसी वर्ग के थे।

मास्टर जी जबलपुर की प्राइवेट संस्था के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे। कहने को तो एक अध्यापक, समाज का प्रतिनिधित्व करता है, उसको बनाता है, उसका भविष्य सँवारता है, आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करता है। परन्तु भारत के राज्य मध्यप्रदेश में और मध्यप्रदेश के महाकौशल क्षेत्र में इस तरह के प्राइमरी स्कूलों के अध्यापकों की परिस्थितियों को बयान नहीं किया जा सकता। उनकी स्थिति एक रोज़ कमाने वाले मज़दूर से ज़्यादा कुछ नहीं होती। उन्हें उतना भी मुश्किल से मिल पाता है जिसमें वह अपना और अपने बच्चों को दाल-रोटी खिला सके। स्कूलों की संस्थाएं किस हद तक इसके लिए ज़िम्मेदार हैं, नहीं कहा जा सकता। यहाँ, इस क्षेत्र की आर्थिक परिस्थिति, सामाजिक संरचना इस प्रकार की है कि स्कूल तो जनसंख्या के कारण बहुत सारे पैदा कर दिये गए हैं। परंतु अधिकांश में कोई व्यवस्था नहीं है। मैनेजमेंट की तो शायद कमाई हो जाती हो, पर न तो छात्रों को कुछ मिल पाता है न ही शिक्षकों को।

मालती और मास्टर जी को ज़िंदगी से कुछ चाहत नहीं थी, सोचा ही नहीं था। परेशानी उस समय होती है जब आदमी चाहत करता है, ख़वाब देखता है और उसे वह पूरा नहीं कर पाता। अपनी सीमाओं से ज़्यादा इच्छा करने से परेशानी ही मिलती है और आदमी कई बार ग़लत रास्ते पर भी जा सकता है। ग़लत कार्य भी कर सकता है। दोनों ही एक ही तरह के वर्ग से आए हुए थे। दोनों की सोच काफी कुछ मिलती-जुलती थी। हर हाल में खुश रहना यह उनकी प्रवृत्ति भी थी। बहुत ज़्यादा ज़िंदगी में आवश्यकताएं नहीं थी इच्छा तो फिर दूसरे नम्बर पर आती है। आवश्यकता और इच्छा दोनों ही न हो तो सुकून अपने आप आ जाता है और संतोष और सुकून हो तो घर में खुशहाली व खुशियाँ होती ही है। खुशियाँ एक अवस्था है, एक परिस्थिति है। यह किसी वस्तु से नहीं होती। मास्टर जी का परिवार कई तरह की परेशानियाँ होते हुए भी खुश था, संतुष्ट था।

अमित को याद है किस तरह साइकिल पर थैला लटकाकर वह इतवार को अपने बाबूजी के साथ गुड़ंदीं बाज़ार सब्जी लेने जाता था। मोल-भाव करके खूब सारी खेत की ताज़ी और सस्ती सब्जियाँ खरीदी जाती। कभी-कभी मौसम के सस्ते फल भी खरीदे जाते। एक आम मिल जाने से पूरा मौसम खुशबूओं से बीत जाता...। और कहाँ अब रोज़ एक आम मिलने पर भी वह खुशी नहीं होती है। अमित अपने पिता के साथ गेहूँ पिसाने, कोयला-लकड़ी लाने अक्सर जाया करता। मिट्टी का तेल (केरोसिन) थोड़ा महँगा पड़ता तो कम ही लाते। स्टोव सिर्फ चाय बनाने के लिए ही इस्तेमाल होता। सुबह और शाम को कोयले की सिगड़ी जलती। एक बार में ही जो खाना बनता वही खाया जाता। ...मगर सिगड़ी पर बने खाने का स्वाद आज के गैस के चूल्हे पर कहाँ। जीवन में उस वक्त छोटी-छोटी चीज़ों में बहुत बड़ी खुशी और संतुष्टि छुपी होती थी। वहीं आज बड़ी-बड़ी चीज़ों की खुशियाँ भी बड़ी क्षणभंगुर है। इतवार की दोपहर, सब के साथ ज़मीन पर बैठकर खाने में जो स्वाद और संतृप्ति थी, वो फिर कभी नहीं मिली। सुप्रिया भी नीचे ज़मीन पर साथ ही लेटे-लेटे खाती रहती।

सारा मोहल्ला ही निम्न मध्यम वर्गीय था। सभी की परिस्थितियाँ तक़रीबन एक जैसी थी। फ़र्क़ सिर्फ इतना था, जो सरकारी नौकरी में चतुर्थ श्रेणी में काम करते थे, उनके हालात आर्थिक रूप से बेहतर थे। जिस परिवार में एक से अधिक कमाने वाले थे, जैसे पिता के साथ-साथ बेटा भी कमा रहा है, उन घरों की परिस्थितियाँ तो और बेहतर थी। यहाँ तक की किसी-किसी ने मोपेड भी ले ली थी। एक-दो घरों में रिकार्ड प्लेयर भी आ गया था। सैनी के घर के म्यूजिक सेट पर मालती भी कभी-कभी गाना सुन आती थी। बहुत अधिक तो उसे समझ नहीं थी, परन्तु हाँ पुराने गाने सुनने में ज़रूर अच्छा लगता। गीता के घर में भी हर तरह की सुख-सुविधाएं धीरे-धीरे जुट रही थीं। अच्छी रसोई भी थी। दूध भी खूब आता था। मालती के यहाँ तो दूध भी सिर्फ दोनों वक्त आधा किलो ही लिया जाता। उसी में दो वक्त की चाय दोनों पति-पत्नी के लिए बन जाती। उनके लिए यह कोई शरम की बात नहीं थी। उनकी आवश्यकता ही इतनी थी। माँ के दूध के बाद फिर दूसरे दूध की आवश्यकता कहाँ हो सकती है, अमित प्रकृति के इस नियम, इस सिद्धांत पर चल रहा था। शरीर को चलाने के लिए, विकसित करने के लिए रोटी सब्जी से उसे तमाम ऊर्जा मिल जाती थी। शरीर को वैसे भी तो प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और विटामिन वगैरह ही तो चाहिए। वो किसी भी खाने के सामान में मिल सकता है। उसके लिए महँगा होना ज़रूरी नहीं। वैसे भी वो दाल और रोटी में भरपूर होती है। जो उन्हें भर पेट मिला करता। ज़िंदगी ठीक कट रही थी। परन्तु परिस्थिति, ईश्वर, भाग्य कुछ न कुछ तो मायने रखते ही हैं और मास्टर जी का देहांत अचानक हो गया था। मालती निम्न मध्यम वर्ग से निम्न वर्ग की और जाने के लिए मुँह बाय खड़ी हुई थी। परिस्थितियाँ बहुत खराब हो चुकी थीं। मास्टर जी को ईश्वर के पास गये महीनों बीत चुके थे। घर में आय का कोई साधन नहीं रह गया था। उनके पास कहाँ कोई बैंक बैलेंस था। एलआईसी के पैसे से खर्च कब तक चलता। और एक दिन ललन से दूध लेने के लिए उसने मना कर दिया। ललन समझदार था, कहने लगा,
''पाइया ले लिया कर, कोई आए-गए के लिए चाय तो बन जाएगी, पैसा फिर दे देना।''
साहू किराने वाला, अब नाक-मुँह बनाने लगा था। जो इस दौर से गुज़र चुका हो वही इसकी तीव्रता को समझ सकता है। सुनीता इस दौर से गुज़र चुकी थी। वह थोड़ा-थोड़ा मालती के चेहरे को आते जाते पढ़ लेती। एक दिन अचानक घर पर आकर उसको पैसे देने लगी। मालती को इस तरह से पैसे लेना अच्छा नहीं लगा था। और उसके मना करने पर सुनीता कहने लगी,
''तू क्या सोचती है, मैं तेरे ऊपर एहसान कर रही हूँ। या तुझे लगता है कि मेरे पैसे भी खराब हैं। क्या मैं बदचलन हूँ? देख इनके मरने के बाद मैंने दूसरी शादी तो नहीं की, लेकिन एक ही आदमी के पल्ले सें बंधी हूँ। दुनिया चाहे मुझे कितनी भी बदचलन कहे, परन्तु तू क्या सोचती है कि मैं रोज़ नये आदमी बदलती हूँ। ...लड़की मुझे भी पालनी है। ड्राइवर की औरत ड्राइवरी तो कर नहीं सकती, बर्तन मैं माँज नहीं सकती, भीख मैं मांग नहीं सकती। दूसरी शादी किसी ने की नहीं। अब जिस आदमी ने मेरे सिर पर हाथ रखा है, मैं उसे अपना पति मानती हूँ। मेरी बेटी को वह पाल रहा है। यह क्या कम है। मैं तेरी हालत को समझ सकती हूँ। मैं इस दौर से गुज़र चुकी हूँ। इसलिए तेरी मदद करने आई हूँ। तुझे लेना है ले, मैं दिनभर मनाने नहीं आऊँगी।'' 

मालती को यह बात बुरी तरह से चुभ गई थी। सीधी-सादी तो थी। थोड़ा-थोड़ा समझती भी थी, पर परिस्थितियों ने उसे ज़्यादा समझदार बना दिया था। आज वह सुनीता को ज़्यादा बेहतर समझ सकती थी। उसे अब यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह आगे क्या करे। जीवन बीमा के पैसे से, तेरहवीं में होने वाले खर्चे का कर्जा और इन चार-पाँच महीनों का खर्च ही हो पाया था। लोगों की बातों से यह तो उसे पता चल चुका था कि उसका कम पढ़ा-लिखा होना उसके लिए एक अभिशाप हो रहा है। उम्र के इस मोड़ पर और कोई भी संबंधी या संबंध न होने के कारण नौकरी मिलना भी इतना आसान नहीं था। अमित बहुत छोटा था कुछ भी नहीं कर सकता था। उधर, सुप्रिया बोल तो नहीं पाती थी, परन्तु अब कुछ-कुछ समझने लगी थी।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
टिप्पणियाँ (0)add
टिप्पणी लिखें
quote
bold
italicize
underline
strike
url
image
quote
quote
smile
wink
laugh
grin
angry
sad
shocked
cool
tongue
kiss
cry
smaller | bigger

busy
 

बंधन: सभी प्रकाशित खण्ड






Subscribe Newsletter

हमारे बारे में : About Us

Tarakash Universe Ideas

Copyright 2007-08 Tarakash.com, All Rights Reserved | Tarakash Universe is powered by: Chhavi Media Services