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हे प्रिये! तुम द्वार खोलो... |
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कविता
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गुरुवार , , 31 मई |
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समीरलाल
श्री समीरलाल उत्कृष्ट कवि, चिट्ठाकार एवं तरकश के कोर सम्पादक हैं.
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१.
देख ली सब रीत जग की, सुप्त सब हरकत नहीं
जब तलक खुद पे न गुजरे, बात में शिरकत नहीं
बीज कितनी नफरतों के , बो रहे वो हर कदम
मुझको लगता है कि उनको, प्यार की हसरत नहीं.
२.
मौन मुखरित हो गया जब, कट गई रातें सभी
आँख ही से कह गई वो, प्यार की बातें सभी
जिन्दगी के खेल में अब, चंद सांसे ही बची,
ताजमहल सा रुप धर कर, आ रहीं यादें सभी
३.
धूप सर पर इस कदर कि छुप गई परछाई भी
देख कर सूना सा आँगन,डर गई तन्हाई भी
मैं विरह की आग में यूँ, हर घड़ी जलता रहा
मातमी मौसम हुआ फिर , मूक हुई शहनाई भी .
४.
आज मैं सजदे की खातिर,उस गली में जा रहा हूँ
नाकाम अपनी हसरतों के , गीत धुन में गा रहा हूँ
मन मेरा अब भर चुका है, बेवफा इस देश से
हे प्रिये! तुम द्वार खोलो, प्यार पाने आ रहा हूँ.
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आपकी ये पंक्तियाँ तो मन को छू गईं...
ऐसा ही लेखन जारी रखें... बहुत धन्यवाद...