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हे प्रिये! तुम द्वार खोलो...
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 10
बेकारअति उत्तम 
कविता
गुरुवार , , 31 मई

sameer

 

समीरलाल


 

  श्री समीरलाल उत्कृष्ट कवि, चिट्ठाकार एवं तरकश के कोर सम्पादक हैं. 

 

 

 

 

 

 

 

sameer-love

 

१.

देख ली सब रीत जग की, सुप्त सब हरकत नहीं

जब तलक खुद पे न गुजरे, बात में शिरकत नहीं

बीज कितनी नफरतों के , बो रहे वो हर कदम

मुझको लगता है कि उनको, प्यार की हसरत नहीं.


२.

मौन मुखरित हो गया जब, कट गई रातें सभी

आँख ही से कह गई वो, प्यार की बातें सभी

जिन्दगी के खेल में अब, चंद सांसे ही बची, 

  ताजमहल सा रुप धर कर, आ रहीं यादें सभी

३.


धूप सर पर इस कदर कि छुप गई परछाई भी

देख कर सूना सा आँगन,डर गई तन्हाई भी

मैं विरह की आग में यूँ, हर घड़ी जलता रहा

मातमी मौसम हुआ फिर , मूक हुई शहनाई भी .


४.

आज मैं सजदे की खातिर,उस गली में जा रहा हूँ

नाकाम अपनी हसरतों के , गीत धुन में गा रहा हूँ

मन मेरा अब भर चुका है, बेवफा इस देश से

हे प्रिये! तुम द्वार खोलो, प्यार पाने आ रहा हूँ.

 

 

लेखक का निजि चिट्ठा

 



 



टिप्पणियाँ (13)add
क़्या बात है!!
द्वारा प्रेषित pankaj bengani , मई 31, 2007
भावों की गहराई में शायद ही कोई आपका मुकाबला कर पाए... क्या शब्द रचे हैं . वाह!!

मौन मुखरित हो गया जब, कट गई रातें सभी

आँख ही से कह गई वो, प्यार की बातें सभी


आपकी ये पंक्तियाँ तो मन को छू गईं...

ऐसा ही लेखन जारी रखें... बहुत धन्यवाद...

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बहुत ख़ूब...
द्वारा प्रेषित सिंधु , जून 01, 2007
सुंदर पंक्तियाँ... दिल को छू गईं, sir.
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दरवाजा खुला के प्य्रार
द्वारा प्रेषित अनूप शुक्ल , जून 01, 2007
दरवाजा खुला के प्यार करना। बड़ी बोल्ड प्यार है।
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वाह भाई वाह !
द्वारा प्रेषित डा प्रभात टन्डन , जून 01, 2007
शब्दों मे माँजना तो कोई आपसे सीखे !
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वाह!!!
द्वारा प्रेषित Sanjeet Tripathi , जून 01, 2007
गुरुवर बहुत बढ़िया रचना।
एक सवाल, आखिर बात क्या है आजकल एकदम से रुमानी हुए जा रहे हैं आप।
शुक्रिया इस रचना को पढ़वाने के लिए
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दिल के करीब
द्वारा प्रेषित Rajesh Roshan , जून 01, 2007
सुन्दर रचना, अलान्कारो का भी प्रयोग किया गया है
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...
द्वारा प्रेषित sunita(shanoo) , जून 01, 2007
आदरणीय मै तो आपको हास्य चिट्ठाकार ही समझा करती थी,आप तो बहुत सवेंदनशील कवितायें लिखते है,...
मान गये आपको आप सचमुच श्रेश्ठ है,मेरा प्रणाम स्वीकार करें

सुनीता(शानू)
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bahut khoob
द्वारा प्रेषित ranjana , जून 01, 2007
मौन मुखरित हो गया जब, कट गई रातें सभी

आँख ही से कह गई वो, प्यार की बातें सभी

जिन्दगी के खेल में अब, चंद सांसे ही बची,

ताजमहल सा रुप धर कर, आ रहीं यादें सभी

bahut hi sunadr laag yah...

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...
द्वारा प्रेषित Laxmi N. Gupta , जून 01, 2007
वाह, वाह। बहुत सुन्दर। ये पंक्तियाँ खास कर:
"बीज कितनी नफरतों के , बो रहे वो हर कदममुझको लगता है कि उनको, प्यार की हसरत नहीं."

किंचित सुधार लय में:

"मूक हुई शहनाई भी ."

की जगह

"मूक शहनाई हुई"

कर दें।


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...
द्वारा प्रेषित राकेश खंडेलवाल , जून 01, 2007
बीज कितनी नफरतों के , बो रहे वो हर कदम

मुझको लगता है कि उनको, प्यार की हसरत नहीं.


बहुत खूब समीर भाई. निखरते रहिये. प्यार की फ़ुहार बारिशों में बदले, यही कामना है
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खूबसूरत भाव
द्वारा प्रेषित Dr.Bhawna , जून 02, 2007
बहुत खूबसूरत भाव हैं समीर जी। इतनी अच्छी रचना के लिये ढेर सारी बधाई।
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भाइ जब चाहे आ जाओ
द्वारा प्रेषित arun , जून 02, 2007
मैं विरह की आग में यूँ, हर घड़ी जलता रहा

मातमी मौसम हुआ फिर , मूक हुई शहनाई भी .

समीर भाइ आज पता चल आप गंभीर भी होते हो,और वहा भी झंडे गाड देते हो,मुझे भी किसी की दो लाईन याद आ रही है आपको पढकर
"बोली यू विरहिन मन को मसोस कर
काहे को बसंत,बस अंत अब आयो है"
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एक प्रतिक्रिया ऐसी भी
द्वारा प्रेषित जीतू , जून 06, 2007
धूप सर पर इस कदर कि छुप गई परछाई भी

बोला था, लू मे मत निकलना, नही, भरी दोपहरिया जाएंगे, अब झेलो।

मैं विरह की आग में यूँ, हर घड़ी जलता रहा

ऊ तो जलिबे करि.... लू मे मत निकला करो।


आज मैं सजदे की खातिर,उस गली में जा रहा हूँ
नाकाम अपनी हसरतों के , गीत धुन में गा रहा हूँ
मन मेरा अब भर चुका है, बेवफा इस देश से
हे प्रिये! तुम द्वार खोलो, प्यार पाने आ रहा हूँ.

एल्लो, कनाडा वाले कम झेले है जो अब इधर वालों को परेशान करने आ रहे हो। भाई भारी भरकम शिप इधर ना भेजे जाएं।



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