Thursday, January 26, 2006

रंग दे बसंती (Movie Review: Rang De Basanti)

जेसे कि मेने पिछले पोस्ट मे लिखा, मै सोच रहा था कि २६ जनवरी को केसे मनाया जाये रात को ये ब्लोग लिखने कि बजह से और J2ME पढते हुए मै ४ बजे सोया यानि २६ जनवरी की सुबह ध्वज फरकाना तो साईड पर हो गया लेकिन भारतमाता के कुछ निकम्मे बेटो कि तरह मै सुबह ११ बजह तक सोता रहा! और वो भी ज्यादा सोता अगर दोस्तो ने आधे घन्टे मे २५ किलोमीटर दूर वाले मल्टीप्लेक्स मे "रंग दे बसंती" देखने के लिये पहुंचने की नोटिस ना दी होती, और वो भी एक सूचना के साथ: स्नान कर के आना! तो चल दिया मै फिल्म देखने

खेर मै सोच रहा था कि ब्लोग मे फिल्म की पुरी कि पुरी स्टोरी लिखु लेकिन अब सोच रहा हु कि यह पढने वाले खुद ही फिल्म देखे मै तो सिर्फ एक ही शब्द प्रयोग करुंगा मेरी और मेरे दोस्तो की इस फिल्म के बाद हुइ स्थिति के बारे मे: "स्थितप्रज्ञ" बहुत ही झकास पिकचर है ये आमिर खान से लेकर हर किसी ने बढीया एकटिंग की है अरे सोहा अली खान को भी अभिनय आता है! हालाकि इन्टरवल से पहले एसा लगा कि डाइरेक्टर को शहीद भगतसिंह पर फिल्म बनानी है और थोडा बहुत पक भी गये, लेकिन कोमेडी पल हंसाते रहे लेकिन इन्टरवल के बाद मे पता चला कि यह भगतसिंह की दुसरी फिल्म हमे मुफ्त मे क्यो भेंट दी जा रही है इस फिल्म के साथ! खेर मुझे तो इस फिल्म पे आमिर, रोनी स्क्रूवाला और शर्मन जोशी कि बजह से पहले से यकिन था, लेकिन मेरे कुछ दोस्त जो फिल्म के ट्रेलर कि बजह से इसे सामाजिक फिल्म और "स्वदेश्" जेसी पकाउ फिल्म समझ रहे थे, उनकी आंखे अंत मे नर्म दिखी संगीत बहुत ही झकास है, अंत का भी दुख नहि होता जेसे दुसरी फिल्मो मे होता हे किसी हीरो के जाने के बाद

शायद्, इस फिल्म कि बजह से मेरी २६ जनवरी बच गयी, वरना पता नहि क्या करता
इसिलिये शायद मै भी २ साल से अंग्रेजी मेगेझीन शुरु करने का प्रयास कर रहा हु और पैसे ना होने के बावजुद अभी तक आस लगाये हुए हु कि मै अपने विचारो को अपने ही माध्यम से लोगो तक पहुचा सकू आज मुझे पता चला कि मै भी साला देश भक्त हू या तो फिर कोइ कोशिश कर रहा हू आमिर खान जो डाईलोग इस फिल्म मे कहेता हे वो ही मैने १ साल पहले अपने मेगेझीन के अपने पहले एडीटोरीयल लेख मे लिखा था: "There are only two ways to live happily in any system : 1. Join with the system 2. Dare to change the system as per YOUR THINKING, whatever it is!" और इसिलिये सुबह मे ११ बजे उठाने के लिये मैने अप्ने दोस्त को पीटा नहि!!

हथोडा
"१४ फरवरी और नव वर्ष मे SMS भेज कर मोबाइल नेटर्वक जाम हो जाते है, जो कि आज ज्यादा समय तक खुल्ले थे"

3 Comments:

At 1/26/2006 10:49 PM , Blogger Pankaj Bengani said...

अपनी मेगेजीन एक दिन जरूर publish होगी रविभाई. बहुत मस्त लिखा. वन्दे मातरम

 
At 1/27/2006 12:30 AM , Blogger Seema Kumar said...

कल मैंने भी 'रंग दे बसंती' देखा | एक सवाल उठाया तो गया है | समाधान विवादास्पद हो सकता है | पर सिनेमा देखने लायक है .. संगीत भी अच्छा है |

 
At 1/27/2006 5:46 AM , Blogger Atul Arora said...

रवि

इस टिप्पणी को सहज आलोचना की तरह लीजिए। इस समीक्षा का शीर्षक यह होना चाहिये था "मैने रँग दे क्यों देखी" जब्कि समीक्षा इसलिये लिखी जाती है कि लोगो को पता चले कि वह फिल्म क्यों देखे या क्यों न देखे? फिल्म की रोचकता बनाये रखने हेतु उसकी कहानी या अँत का खुलासा जरूरी नही, पर विशेष दृश्यों का उल्लेख न होना खलता है समीक्षा में। ईमानदारी की बात है, हम लोगो की समीक्षा पढ़कर कोई फिल्म देखने न देखने का फैसला नही करता , पर यह आपके विचारों को व्यक्त करने का माध्यम अवश्य है। यह सबको पता है आमिर अच्छे अभिनेता है पर जिस तरह काबुल में भी गधे मिलते है उस तरह आमिर किसी फिल्म में जबरन अभिनय कर सकते हैं। कहने का मतलब है यहाँ यह उल्लेख स्पष्ट नही हुआ कि आमिर की एक्टिंग अच्छी कैसे थी? भावप्रवण थे ? बाडी लैंगवेज का सही प्रयोग किया ? या आँखे बोल रही थी या फिर हर फिल्म कि तरह फिस्स से हँस रहे थे कि इस मुस्कान पर लड़कियाँ और सतरँगिये फिसल जायेंगे? एक समीक्षा यह भी पढ़िये http://hindini.com/hindini/?p=62 । यह कोई मानदँड नही पर "हटके" है। यह उदाहरण इसलिये दिया क्योंकि आपके चिठ्ठे का शीर्षक "हटके" है, उम्मीद जगाता है पर इस तरह कि समीक्षा वैसी ही लगती है जैसा फिल्म गुलाम में आमिर का विशिष्ट चिन्हों वाली अँगूठियाँ पहने पोस्टर। उम्मीद तो उसने भी बहुत जगायी पर कहानी टाईप्ड थी।

अँत में "हथोड़े" का शुद्धीकरण करके "हथौड़े " कर लीजिए।

 

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