तत्वज्ञानी के हथौडे
Monday, March 20, 2006
  मैं भी, मैं भी: क्यों मुझे नहि पसंद मेरा धर्म (जैन / हिंदु)
यह लेखमे धार्मिक बाबतो मे टिका टिप्पणी की गयी है, अगर आप की पाचन शक्ति अछ्छी है तो ही पढे। आपकी धार्मिक मान्यता को ठेंस पहुंचे तो मै जिम्मेदार नहि हूं। चाय पीकर संयम से और खुले दिमाग से सोच कर पढे। अगर आप मेरे किसी प्रश्न का उत्तर दे सके तो मै आप का आभारी रहुंगा।

यह लेख सबसे बडा हथौडा हो सकता है। फिर भी आप यह पढे एसी प्रार्थना करता हूं।

यह लेख शोएब के यह विनम्र लेख पढने के बाद उअके जवाब और समर्थन मे लिखा गया है।
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शोएब एवं सभी वाचकमित्रो,

आपके विचार पढके मुस्लिम बिरादर ब्लोगर गुस्सा होंगे तो कट्टरवादी हिन्दु बिरादर ब्लोगर मन मे खुश होंगे और शायद आपके विचारो की तारिफ करे। वेसे तो मै भी आप से सहेमत हूं लेकिन मुझे मेरा धर्म जैन बिलकुल पसंद नहि है। आपने तो इतनी शराफत दिखायी है कि आपने धर्म को लताडा नहि है। मैने तो वह शराफत छोड दी है। हां, मै मानता हूं जिसे जो करना है वह करे इसिलिये मुझे कोइ आपत्ति नहि है कि कौन क्या करता है । शायद इसका रीज़न ये नहि है कि मै लोकशाही के अनुरुप लोगो को अपनी मर्जी से जीने देना चाहता हूं, पर शायद इसकी बजह यह है कि मुझे किसी की परवाह नहि है।

अगर कोइ मुस्लिम मानता है के बकरे को काटने से जन्नत मिलती है तो काटने दो, मेरा क्या जाता है? अगर जैन जेसे धर्म मे मानने वाले लोग यह मानते है कि चिंटी को मारने से या सांस लेने से भी पाप होता है और नर्क मिलता है तो मानो! मेरा क्या जाता है? मै मानता हूं हर कोइ अपने किये गये कर्मो को जस्टीफाइ करने की कोशिश करता है। कोइ मुस्लिम दारू पिता है और बाद मे नमाज़ पढके खुद ही संतोष व्यक्त्त करता है कि अब मेरे पाप धूल गये।

दूसरे धर्मो का पता नहि पर मैने अपने धर्मो मे इतने दंभी, स्वार्थी और बेवकूफ लोग देखे है की मुझे पछतावा है कि मै क्यूं जैन पैदा हुआ? अब जैन मे तो हर चिज़ करने मै पाप लगता है फिर भी लोगो ने अपना अर्थघटन कर लिया है। कुछ जैन संप्रदाय मूर्ति पूजा करते है तो कुछ आप मिंये लोग की तरह मूर्तिपूजा के खिलाफ है! अब एक जैन मंदिर मै जाकर लाइट चालू करके, माइक पे वंदना करके, यह संतोष व्यक्त करते है कि मुझे स्वर्ग मिलेगा तो कुछ “स्थानकवासी” जैन मानते है कि बिजली चालू करने से पाप लगता है और मूर्ति बनाने से बहुत छोटे जीव मरते है इसिलिये पाप लगता है!! यहां दोनो संप्रदाय एक ही भगवान की पूजा करेंगे लेकिन अलग ढंग से। फिर 8 दिन भूखे रहकर यह मान लेंगे कि उनका पाप मिट गया!! यानि आपने 3 खून किये हो या तो फिर लाखो लोगो के रुपिये लूंटे हो फिर भी कुछ दिन भूखे रहने से पाप मिट जायेंगे!

आज इस दुनिया मै कोइ आदमी, कोइ बडा संत भी धर्म कि व्याख्या नहि कर सकता! अगर कर सकता तो आज एक ही साधू के लोग दीवाने होते, इतने सारे साधू की दूकाने न चलती। दर असल यह धर्म- बर्म कुछ नहि है। अगर कोइ नियमो मे इतना दम होता तो आज हर धर्म के इतने संप्रदाय न होते।

अब “जैन धर्म” (जी हा धर्म पे ही) पे मुझे शंका इसिलिये है कि यह धर्म सिर्फ मैदानी इलाको मै ही फैल पाया। क्यो भला? क्योकि आर्कटिक के इलाके मै घांसफ़ुंस मिलता ही नहि है, तो भला एस्किमो क्या खाक खाते?? यानि इस धर्म के मुताबिक बेचारे एस्किमो लोग नर्क मे जायेंगे! वेसे ही 100 करोड चीनी लोग भी। सिर्फ 50 लाख जैन लोगो के ही स्वर्ग मै जाने के चांस है।


वेसे जैनो और हिंदुओ को अकेली गाय पे ही दया आती है। और बना डालते है गाय के लिए गौशाला। क्यों? क्योकि यह बहुत ही सीधा सा जानवर है, जो दूध देता है, किसी को काटता नहि है, धार्मिक महत्व भी है। लेकिन अगर यह लोग इतने ही अंहिसावादी है तो बेचारे शेर, उल्लु, भालू, मछ्छर, गधे या घोडे का क्या कसूर? यह भी किसी ना किसी देव द्वारा उपयोग मे लिये गये थे। तो फिर सिर्फ गाय क्यो?? गाय तो फिर भी लाखो की तादाद मे है। कभी शेर, गीध, उल्लु या घोडे के लिए भी गाय की जितनी गोशाला है, उससे 25% तो आश्रयस्थान बनाओ! नहि... यह लोग उल्लु को घटिया मानते है क्योकि वह कोइ फायदा नहि कराता। अगर आप मानते है कि सांप या नाग आपके सबसे बडे देवता का वाहन है तो फिर उसे देख कर फटती क्यो है?? चलो अगर वह आपको मार ही डालेगा, तो भी खुश होना क्योकि भगवान विष्णु या शिव के पालतू आप की जान लेने वाला है, जिनकी आप पूजा करते हो हर रोज। नहि पूजा तो कुछ अछ्छा मांगने के लिए करते है, भगवान अगर जान लेना चाहे तो वह मेरा भगवान नहि!

यह हिन्दु या जैन लोग सिर्फ एक भगवान के पास मांगकर संतुष्ठ नहि होंगे। अगर भगवान बिज़ी हुए और ना सुना तो? इसिलिए वो ही शंकर के 10 मंदिर, एक ही विष्णु के 2 अवतार, राम और क्रिष्णा के 5 मंदिर जाने के बाद, एक ही पार्वती देवी के 6 रुप वाले 15 मंदिर मे जायेंगे, भीख मांगने या शुक्रिया कहेने। अगर ना मिले तो अमिताभ बच्चन की फिल्मो की तरह झगडने जायेंगे!! फिर व्रत रखेंगे , वो भी फ्लेकसिबल व्रत। फिर कहेंगे “इतना तो चलता है व्रत मे, खा सकते है!!” अब इसे घटिया किसम के दंभी नहि कहे तो क्या कहे?? अगर आप के मुख्य भगवान विष्णु है तो फिर सांइबाबा के पास क्यो जाते हो?? क्या आपको विष्णु पर से श्रध्धा उठ गयी तो एक भगवान को छोड कर साधू की पूजा ज्यादा करते हो? याद रहे, आप समजते हो कि यह साधू आपको भगवान के समीप ले जाने पर मदद करेगा तो वह बडा सट्टा है। अगर वह गलत हुआ तो?? यानि अब आपको 10 भगवान कि तरह 10 साधू के पास भी जाना चाहिये। ज्यादा सिक्योरिटी के लिए! J


वेसे अगर सहि में मुझे 84 लाख हजार अलग अलग रूप मे जनम लेने है तो मै सारे शेर, हाथी , गधे, घोडे और जो भी दूसरे जीव हाथ मै आए उनको खत्म कर देना चाहुंगा। समझ मे आया क्यो? अरे उतने जन्म कम होंगे ना मेरे!! और ज्यादा आदमी पैदा हो रहे है इसिलिये मेरे इंसान बनने की संभावनाए भी बढी है।


वेसे मेरा कर्म के सिध्धांत मे भी भरोसा नहि है। क्योकि यह सिर्फ बहाना है आपके दिल को बहेलाने का, फुसलाने का। कुछ भी घटना घटी और आपको पता नहि एसा क्यो हुआ?? है ना कर्म का सिध्धांत ! यह घटना आपके कर्मो का फल है। क्या?? आप मानते है की आपने बहुत अछ्छे कर्म किये है?? तो भी जवाब हाज़िर है: यह आपके पिछले जन्मो के कर्मो का फल है!! अभी भी कंफ्युज़?? होंगे ही ना क्योकि आपने सुना होगा की आदमी को उसके किये की सज़ा या किये हुए कर्मो का फल इसी जन्म मे मिलता है तो फिर मुझे पिछले जन्मो की सजा केसे मिली?? यही तो है कर्म! यह सब मत सोच मित्र, सिर्फ कर्म किये जा, फल की आशा मत रख ..क्यो सोचता है कि एसा फल क्यो मिला, जो भी मिला खा ले!! यह डिप्लोमेटिक, गोल-गोल बातो मे बहुत लोग गोल गोल घूमते रहेते है। अगर कर्म का सिध्धांत सेट नहि हो रहा हो, तो फिर “जेसी प्रभू की मरज़ी!!”


क्या पिछ्ले जन्मो के पाप की सजा इस जन्म मे नहि उसी जन्म मे मिल गयी थी?? सिर्फ इसी जन्म के कर्म की सजा इस जन्म मे मिलती है और मिलती “ही” है?? और आप नहि समज पाते ये कौन से कर्मो की सजा है?? तो याद रखिये, यह कर्मो की सजा नहि है: यह प्रभु की मर्जी है या तो फिर आपका नसीब है! J
यानि ओवरओल : कर्म का फल = नसीब = प्रभु की मर्जी = प्रभु

अब आप अहिंसावादी है तो याद करके यह बताये: जब लास्ट टाइम एक कुत्ते या बिल्ली ने आपके सामने किसी पंछी या चुहे को मारके खाने की कोशिश की थी तो आपने या आपके दोस्त ने क्या किया था?? शिकारी को मार के भगाया था ? या तो फिर उसे खाने दिया था??अगर शिकारी शेर होता और शिकार जंगली कुत्त्ता होता तो क्या करते?? वोही चीज़ दोहराते?? मुझे नहि सुनना आपका जवाब..सिर्फ सोचो.. क्या यह जीव अपना खाना नहि खा सकते? या आप उनको भी शाकाहारी बनाना चाहते हो?

मै नहि मानता की कोइ गलत काम करता है। जिसको जो सही लगता है वह वो करता है। और उसमे भी जानवर तो कभी पाप करते ही नहि है J! अब वो तो सिर्फ खाना खाते है, सोते है और कुछ रेग्युलर क्रिया करते रहते है। अब इसमे कहा से कर्म का सिध्धांत आया?? कोइ एसा जानवर बताओ जिसने कोइ गलत काम किया हो। क्या आप मानते है की जानवर की आत्मा और आपकी आत्मा एक जेसी होती है ? या अलग होती है? अगर एक जेसी होती है तो क्या वह भगवान मै मानते होंगे?? अगर हा तो आप केसे पता लगायेंगे कि यह गाय हिंदू है? अगर वह मुस्लिम निकली तो?? कोइ फोर्म्युला है आपके पास?? डायनासोर क्या मानते होंगे?? अभी आप सिर्फ जानवरो पे सोचते है, लेकिन मछलीयो का क्या? वाइरस?? क्या उनको भी अहिंसक होना चाहिये?? फिर से, हे कोइ फोर्म्युला?? कोइ साधू के पास क्लेरीफिकेशन?

क्या आप मानते है कि प्रिथ्वी की रचना ब्रम्हा ने फटाक से की थी?? या तो फिर इसाइयो कि तरह ये मानते है कि 6 दिन मे हुइ थी?? तो फिर डायनासोर थे या नहि? अगर नहि थे तो क्या सिधे आदमी पैदा हो गये?? अगर हा तो इतने सारे जीव कहा से आये? यह सब जीव के बारे में कोइ धर्मग्रंथ मे उल्लेख क्यो नहि है? अगर भगवान ने ही बनाया है तो फिर उल्लेख होना चाहिये ना?? या भगवान इंसानो को ज्यादा प्यार करते है? इसिलिये हम किसी को भी मार सकते है? भगवान भी जीव मे भेदभाव रखते है तो फिर इसका मतलब ये हुआ कि हर जीव की आत्मा अलग अलग किसम की होती है। अगर भगवान भेदभाव नहि रखते तो सबकी फिर से, यह सब जीवो का उल्लेख क्यो नहि है? देवियां क्यो सिर्फ हिमालया पे मिलते फूल लगाती है?? आर्जेंटिना मे होते फूल क्यो नहि पहेनती, अगर पुरे विश्व की रचना उनके पतिदेव ने की है तो? शिव क्यो आफ्रिका मे घूमने जाते?? क्या वहा के लोग उनके बच्चे नहि है? क्यो जब हम हिंदु आफ्रिका मे गये तब ही वहा शिव के बारे मे लोगो को पता चला? अगर ब्रम्हा ने सब निर्माण किया है तो वहा भी काले लोग क्यो उन्हे नहि पूजते?

आपको अगर इनमे से एक प्रश्न का भी उत्तर नहि पता या आप कोइ भी कंसेप्ट मे नहि मानते जेसे कि 6 दिन मे या ब्रम्हा द्वारा हम सब जीव की रचना या फिर कुछ और जादू..तो फिर आप मंदिर या चर्च जाना छोड दे। क्योकि इन्ही सिध्धांतो की बुनियाद पर पुरे के पुरे धर्म खडे है। अगर आपको कोइ भी सिध्धांत पे शक है तो आप केसे यह दावा कर सकते है की आप हिंदु, मुस्लिम या इसाइ है? आप सिर्फ स्वार्थी और दंभी है, मेरे जेसे। आपको सिर्फ आपकी या आपके लोगो के सुख का ख्याल है इसिलिये आप मंदिर मे मांगने के लिये पहुंच जाते है, और मिलने पर शुक्रिया कर के भी कहते है की हम पे क्रिपा रखना! आप इसिलिये कोइ अनदेखी ताकत मे विश्वास करते है क्योकि आपको बहुत से प्रश्न का जवाब नहि पता, और आप उसपे अपना कमझोर सा दिमाग नहि लडाना चाहते, इसिलिये न्युटन से पहले तक आप के और मेरे परदादा पेड से सेब गीरने को और सूर्यग्रहण को भगवान की करतूत मानते थे। आज भी बहुत सी करतूत के लिये हम भगवान को ही जिम्मेदार ठ्हराते है, लेकिन जेसे जेसे हमे कुछ चिज़ो का समाधान मिलेगा हम भगवान से उसका नाम बदलकर “ग्रेविटेशनल फोर्स” जेसा कुछ बना देंगे। जिससे कुछ और सवाल मिलेंगे और फिर उनका जिम्मेदार भगवान ही होगा।


मै कोइ धर्म के खिलाफ मार्केटिंग नहि करना चाहता, नहि तो मै नया धर्म खोलना चाहता हूं..क्योकि मै पहले ही बता चूका हू मेरा क्या जाता है? लेकिन मछलीओ के धर्म के बारे मे सोचना और आपकी प्रतिक्रिया मै अगर मुझे मेरे कोइ प्रश्न का हल मिले तो बहुत अछ्छा। FYI: मोरारीबापु डोल्फिन को बचाने के लिए प्रयास कर रहे है, अछछा है, कोइ तो गाय-गाय के खेल से बहार निकल कर किसी और जीव को बचा रहा है।

अस्तु।


हथौडा

इतना बडा काफी नहि है क्या??? और चाहिये?? तो ये लेख 5 बार पढो!!
 
Comments:
रवी भाई


धर्म और कर्मकांडो मे अंतर समझे ? जो भी कुछ आपने लिखा है वह सिर्फ कर्मकांडो के बारे मे है ना कि धर्म के बारे मे.

आप्को और(शुयेब) को धर्म से नही कर्मकांडो से चिढ है.

रही बात ब्रम्हांड की उत्पत्ती और धर्म की आप स्टीफन हाकिंस की "A brief History of Time" का अंतिम अध्याय पढ ले आप जान जायेंगे की धर्म और विज्ञान मे क्या संबध है.

आशीष
 
रवि,

आपके विचारों की कद्र करता हूँ कि आप जन-साधारण की मःनस्थिति व जो धर्म विरासत में मिला की सोच से हटकर सोचते हैं। कुछ बाते कहना चाहूँगा - धर्म व रिलीजन में फर्क है सोचना या पता करने की कोशिश करना खाली समय में। अपने आप को सृष्टि का केंद्र अथवा भगवान मानकर समाज, राज्य, राष्ट्र की परिकल्पना करना। देखो कुछ मूलभूत नियम लागू करनें पड़ेंगे कि नहीं। यही नियम आगे चलकर कई रूप लेते हैं। जैसे आशीष ने कहा कि बिना सोचे कर्मकांडों में पड़ना व्यर्थ है।

पंकज अंकल
 
रवि भाई,
सबसे पहले तो लीक से अलग हटकर सोचने के लिये बहुत बहुत बधाई। बहुत कम लोग ही इतना रिवोल्यूशनरी तरीके से सोच पाते है, क्यों? क्योंकि पैरों मे धर्म और कर्मकान्डों की बेडिया जो पड़ी रहती है। दरअसल धर्म का प्रमुख उद्देश्य हमे जीवन को जीने का तरीका सिखाना होना चाहिए, लेकिन कुछ स्वार्थी लोगों ने इसको पूरी तरह से भ्रष्ट कर दिया है। क्योंकि शास्त्रों मे लिखे गूढ श्लोकों का मतलब हर व्यक्ति ने अपने अपने तरीके से निकाला है। सबसे हास्यास्पद बात तो मुझे ये लगती है कि हमारे शास्त्रों के अनुसार ६५ करोड़ देवी देवता है, लेकिन भईये, आबादी कितनी है टोटल हिन्दुओं की, क्या एक एक बन्दे पर एक एक देवता है? ऐसे बहुत सारे मुद्दे है, जिनके बारे मे किसी से शास्त्रार्थ करने बैठो, तो अगला हारने के डर से आप पर आक्रमण कर बैठता है और बोलते है, तुम तो नास्तिक हो।
लेख बहुत अच्छा लिखा है, थोड़ी सी मात्राओं की गड़बड़ है, उसे दोबारा पढकर सुधार लीजियेगा।फिर से बधाई।
 
रवि भाई

मुझे एसा लगता है कि आपको "अथातो ब्रह्म जिग्यासा" यानि की ईस्वर को जानने की जिगयासा हुई है. यह बात अलग है की आपने अपना नया रास्ता निकाला है. मेरी समज में 'में ईस्वर में नही मानता' एसा कहनेवाला सबसे बडा आस्तिक है. में समज ता हुं जो ईस्वर को पा चुके है वो कुछ कहे नहि पाते, जो बहोत कुछ कहेते है वह अभी खोज में है. ईस में कुछ गलत नहीं है. शक्कर खाना ओर उसका विवरण करना दोनो ही अलग बात है. आपको कुछ ओर दर्शन ओर चिंतन करने के लीये नम्र विनंति.
 
धर्म और धर्म के नाम पर किये जाने वाले आडम्बरों में बहुत फ़र्क है। समस्या यह है कि लोग प्राय: आडम्बरों को ही धर्म समझ लेते हैं और धर्म के आध्यात्मिक पक्ष की ओर तवज्जो नहीं देते हैं। यही कारण है कि कई लोग धर्म को ग़लत नज़रिए से देखते हैं। क्या खाया जाए और क्या न खाया जाए, किस देवी-देवता की पूजा की जाए; यह सब सतही चीज़ें हैं। धर्म का उद्देश्य है चरम सत्य, आत्मा या फिर उसे जिस किसी नाम से भी पुकारा जाए, उसका साक्षात्कार करना।

धर्म के विषय में अपनी राय क़ायम करने से पहले यदि धर्म का यथाविधि अध्ययन किया जाए, तो वास्तविक तत्व सामने आने की सम्भावना अधिक होगी।
 
आपके लेख से ज़ाहिर है आप ने पहली बार अपना पूरा गुस्सा उतार लिया है, ब्लॉग आप का है और आप अपने मन की सब बातें उस पर लिख सकते हैं आप अपने ब्लॉग के राजा हैं। पर मेरी आप से एक गुज़ारिश है के हमें किसी भी धर्म के खिलाफ कुछ लिखने और बोलने का अधिकार नहीं, अगर आप को अपना धर्म पसंद नहीं तो धर्म छोड दो जैसे मैं ने किया है पर धर्म की बुराई न करो। ये धर्म हमारे बुज़रगों ने बनाये थे ताकि उनका खानदान एक होकर रहे मगर उनका ख्वाब चूर चूर होगिया क्योंकि हम एक खानदान से हज़ारों में बंट गये। ये सिर्फ आप ही नहीं बलके आप के जैसे भारत में हज़ारों नौजवान हैं जो अपने धर्मों से बेज़ार हो चुके हैं, हर दिन भारत में मज़हबी फसाद से तंग आगऐ। वो दिन दूर नहीं हमारी आने वाली पीढी सब अपने धर्मों से निकल कर इनसान बनना चाहेंगे।
 
priy ravi ji
lagta hai ki aapko kisi kism ki kuntha (frustration) hai...tabhi aapne aisi galiya likhi hai...ya ho sakta hai ki bachpan me aapko karma-kand jabardasti karaye gaye honge..jisase aapke man me nafrat ghar kar gai hai...koi baat nahi...par plz hindu dharm ki aazadi ko samajhiye ki vahan aapko kisi 1 bhagwan ko manane ki badhyata nahi hai...aap marzi ho to manno aur na ho to mat mano...hindutva jaisa loktantrik dharma koi nahi...asal me jain bhi hindu ka hi 1 branch hai...lagta hai ki aap paap-punya ko bhi nahi mante...aapke liye duniya me kuchh bhi paap nahi hai...to bataiye..ki aise aadmi ke liye samaj me kya jagah ho sakti hai...mai chaahoo to aapki tarah apshabdo ka prayog kar sakta hoon...par mai aisa nahi karoonga...
 
रवि भाई
सुहैब भाई के ब्लोग पढ कर आप को सुहैब बनने की तमन्ना हुई है परन्तु हर कोइ सुहैब जैसा ईमानदार नही हो सकता. सुहैब ने अपने ब्लोग मे कहीं पर इस्लाम को बुरा नहीं कहा परन्तु आपने तो अपनी अकल बेच खाई है, एक जगह तो आपने मियें जैसा घटिया शब्द प्रयोग किया है.
जैसा विवेक भाई ने कहा आपको किसी किस्म की कुंठा है वरना आप भी सुहैब की तरह शालनीता से अपने विचार व्यक्त करते न कि गाली गलौज कर के. जैन धर्म के बारे में आपके विचार बडे ही घटिया है, जैन धर्म के बारे में आप कुछ नही जानते क्यो कि यह वास्तव मे कोई धर्म ही नहीं हे, यह मात्र एक जीवन जीने का तरीका है ओर किसी भी सम्प्रदाय का व्यक्ति इसे अपना सकता है, राजस्थान के संत सौभाग्य मुनि महाराज ने वहां के कई खटीक ( कसाई) लोगो को उनका पशु वध करने के काम से मुक्ति दिलवा कर जैन बनाया तो क्या इस जगह जैन धर्म / संप्रदाय गलत है. माना कि ब्लोग आपका है आप इस के मालिक हे आप चाहे जो लिखें परन्तु किसी भी धर्म को बुरा ना कहें जबकि आपके पास उसको कोसने या गाली देने के तर्क भी पर्याप्त ना हों . जैसा आपने लिखा आपको दंभी लोगो से चिढ है तो क्या कुछ लोगो से सारा समाज, धर्म, या संप्रदाय बुरा हो गया ओर वेसे भी आपने अन्त में जिन मोरारी बापु की तारीफ़ करी परन्तु शायद आप नही जानते कि उनसे बडा दम्भी कौन होगा जो विदेश में प्रवचन करने जाने पर भी पानी गंगा का ही पीते हें ओर उनके ओर भी दंभी भक्त गंगा जल भारत से मंगवा भी देते हैं.
खाली गाली देने से कोइ तत्व ज्ञानी नही हो जाता पहले हमें सभी को सम्मान से देख पाने की मानसिकता बनानी पडती हे, गालियां देना बहुत आसान काम हे,
भगवान के होने या ना होने के बारे में खुद मुझे भी सन्देह है परन्तु मे भगवान को गाली नही देता. धर्म के नाम से मुझे भी चिढ है क्यो कि में इन्सानियत को सबसे बडा धर्म मानता हुं ओर " मां" को सबसे बडा भगवान. "मां" आपको सदबुद्धि दे ........ अस्तु
 
रवि भाई,

आपका लेख जोश में लिखा गया है लेकिन आपने जो साहस दिखाया है उसकी दाद देनी पड़ेगी। कुछ दोस्तों ने लिखा है कि आप कर्मकांड का विरोध कर रहे हैं, धर्म का नहीं। कुछ हद तक उनका आकलन ठीक है। लेकिन यह भी सच है कि आम व्यक्ति का धर्म से संबंध कर्मकांडों के माध्यम से ही अधिक है। हममें से कितने लोग हैं जो धर्म के दार्शनिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और परामानवीय पहलुओं के भीतर झांकने का समय निकाल पाते हैं। व्यक्ति उस पर प्रतिक्रिया करता है जिसे वह भोगता है।

आपकी भाषा जरूर आक्रामक और निराशाजन्य आक्रोश से भरी हुई है लेकिन उसके कारणों को समझे बिना आपकी निंदा किए जाने को मैं उचित नहीं मानता। आपके लेख पर आई कुछ प्रतिक्रियाओं में जिस तरह का उबाल देखने को मिला है वह आपकी सफलता है। आपने लोगों को उद्वेलित तो किया वरना धर्म के संवेदनशील मुद्दे पर खुलेआम अपने मन की बात कहने की आजादी कितने लोग ले पाते हैं?
 
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कोइ मानता ही नहि के मेरे पास दिमाग हे इसिलिये खुद्को तत्वज्ञानी घोषीत करता हु!वैसे हु मैं गुज्जु Engineer.Magazine भी शुरु कर रहा|हु पर हु एक टपोरी|तो ये हे टपोरी का तत्वज्ञान् और हथौडे भी|हेल्मेट पहेन लो|

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Name: Ravi Kamdar
Location: Ahmedabad, Gujarat, India

A computer engineer by education, working in media field, "preaching" companies on technology and Business Stretegies and also earning bread from it. In short,I sell ideas and also execute them. This blog is personal thing not reflecting my profession.



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