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समीक्षा
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शुक्रवार , , 26 अक्टूबर |
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दो हंसो का जोडा भले ही अलग होता हुआ लगे पर भैया हकीक़त तो यही है कि यह जोडी है कमाल की! जी हाँ मै बात कर रही हुं शाहिद और करीना की. यह जोडी बडी बबली सी है और आज रिलीज हुई फिल्म "जब वी मेट" (अब पता नही ऐसा अजीबो गरीब नाम क्यो रखा गया) में यह जोडी वाकई मे कमाल करती है. करीना प्यारी सी चुलबुली लड़की के रूप मे और शाहिद एक बेबस, दुखी व्यापारी और प्यार मे खोए खोए से इंसान के रूप मे जम रहे हैं. साधारण सी फिल्म है पर देखने लायक है.
क्या है कहानी:
मान कर चलिए कि फिल्म की कहानी नई नही है. बिल्कुल नही है. फार्मूले पुरानी फ़िल्मो से उडाए गए लग सकते हैं. परंतु फिर भी एक ताज़गी और नयापन भी है. आदित्य (शाहिद कपूर) व्यापार मे सफल परंतु प्यार मे असफल व्यापारी है. उनकी प्रेमिका उन्हे छोड़कर किसी और से विवाह कर लेती है. अपना टूटा दिल लेकर शाहिद एक ट्रेन मे सफर करते है जहाँ उनकी मुलाकात चुलबुली गीत (करीना कपूर) से होती है. फिर दोनो की नोक झोंक शुरू होती है (तो इसमे नया क्या है, कुछ भी नही).
करीना भी किसी से प्रेम करती है और अपने घर भटिंडा जाने के बाद अपने प्रेमी के पास जाने वाली होती है. अब जब शाहिद और करिना भटिंडा आते है तो घरवाले उन्हे प्रेमी समझ बैठते हैं. अब करीना अपने वास्तविक प्रेमी (सैफ नहीं!!) यानि कि तरूण अरोडा के पास पहुँच जाती है और आदित्य यानि कि शाहिद कपूर मुम्बई लौट आते हैं. जहाँ उनका मन नही लगता (यही तो होता आया है). अब करीना के घरवालों को लगता है कि करीना शाहिद के साथ है, क्योंकि वे दोनो साथ ही भटिंडा से निकले थे, और वे उससे पूछताछ करते हैं. तब हक्का बक्का शाहिद करीना को ढूंढने निकलता है. वह करीना को ढुंढता हुआ मनाली पहुँचता है और फिर शुरू होता है एक और सफर.
दीप यानि करीना का भी दिल टूट चुका होता और कहानी उलझनो और सुलझनो और फिर सुखद अंत की ओर बढती है.
देखने की वजह:
फिल्म कहानी के लिए देखें. माना कि कोई खास नयापन नही है, परंतु निर्देशक इम्तियाज ने घटनाओं को बडी सरलता से दिखाया है. करीना कपूर और शाहिद कपूर की केमेस्ट्री जमती है. फिल्म के कुछ दृश्य मसलन ट्रेन के दृश्य बहुत जानदार है. भारतीय फिल्मों मे ट्रेन के दृश्य दोहरायें हुए से लगते है. परंतु इस फिल्म मे ट्रेन का वाकई मे खुबसुरत और हटकर इस्तेमाल हुआ है.
ना देखने की वजह:
फिल्म के कुछ गीत हिट ज़रुर हुए है परंतु संगीत वैसे तो साधारण ही है. फिल्म मध्यांतर के बाद खिंचती हुई सी लगती है, जो कि कई फ़िल्मो मे होता है. एक और बात, पंजाबीयों को पता नही क्यो कुछ अजीब तरह से दिखाया जाता है फिल्मों मे. मुझे नही लगता पंजाब मे लोग ऐसे ही रहते होंगे और इतना चिल्लाते होंगे.
तो क्या है आखिरी राय:
फिल्म वही पुरानी है. पर यकीन मानिए आप शायद ही बोर होंगे. तो कार्यक्रम बनाने मे हर्ज नही है.
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