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मिसाइल-प्रकार व कार्यप्रणाली - 2 |
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विज्ञान
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मंगलवार , , 11 सितम्बर |
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बेलेस्टिक – नॉन बेलेस्टिक मिसाइल
जैसा की पहले लेख में देखा था की उड्डयन प्रणाली, लक्ष्य की दूरी, यात्रा की रेंज, दिशाशोधक प्रणाली के आधार पर प्रक्षेपास्त्रों का वर्गिकरण किया जाता है. उड्डयन प्रणाली को देखें तो इसके आधार पर प्रक्षेपास्त्रों को दो श्रोणियों में बाटाँ गया है. बेलेस्टिक तथा नॉन बेलेस्टिक.
बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र
भारत का अग्नि-3, अमेरिका का पोसाइडन, रूस का एस.एस.-25 वगेरे लम्बे दूरी के बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र है. इन प्रक्षेपास्त्रों में निर्देश की व्यवस्था तो है, मगर पूरे मार्ग के लिए नहीं. यानी दागे जाने के बाद इसकी हजारों किलोमीटर तक की यात्रा में क्षितिज पार होने के बाद उसका मार्गदर्शन करना सम्भव नहीं होता. यह यात्रा दो चरणों में पूरी होती है. प्रथम चरण में प्रक्षेपास्त्र को उसमें लगा इंजिन उसे ऊँचाई की ओर धकेलता है, महत्तम ऊँचाई के पास पँहुचाने के बाद तय समय पर इंजिन बन्द हो जाता है. इसके बाद भी अब तक जो गति प्राप्त की होती है, उसी के बल पर थोड़ी और ऊँचाई प्राप्त करता है. फिर दूसरा चरण शुरू होता है, वॉर-हेड जो की प्रक्षेपास्त्र का अग्रभाग भाग होता है तथा उसी में बम रखा होता है, अलग हो जाता है तथा बाकी का हजारों किलोमीटर तक का प्रवास प्राप्त गतिमान के बल पर कमान जैसे ब्लास्टिक-मार्ग से पूरा करता है. यह प्रवास बिना मार्गदर्शन के पूरा होता है, इसलिए प्रक्षेपास्त्र को पहले से ही योग्य मार्ग तथा योग्य दिशा में योग्य गति से दागना अनिवार्य होता है, अन्यथा लक्ष्य तक पहूँचने से पहले ही मार्ग से भटक जाएगा. हालाकी अग्नि-3 जैसे प्रक्षेपास्त्र में ‘रडार एरिया गायडेन्स’ नामक दिशा-खोजक व्यवस्था है, मगर यह अंतिम क्षणों में ही सक्रिय होती है. इस प्रणाली के तहत वॉर-हेड का कम्प्यूटर लक्ष्य के भू भाग को स्कैन कर पहले से ही संचित भूभाग की छवि के साथ मिलान करता है तथा पंखो को स्वचालित ढ़ंग से मोड कर लक्ष्य तक के मार्ग को सही कर लेता है.
बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र अपने प्रवास की ज्यातर दूरी बिना मार्गदर्शन व ‘थ्रस्ट’ के ही पुरी करता है.
नॉन बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र
बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र के अलावा सभी प्रक्षेपास्त्र नॉन बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र की श्रेणी में आते है, ये ‘गायडेड’ प्रक्षेपास्त्र होते है. आरम्भ से अंत तक इन्हे दिशा-निर्देश प्राप्त होता है. भारत-रूस का ब्रह्मोस, भारत का नाग, अमेरीका का हार्पून, फ्रांस का मिलान वगेरे नॉन बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र है. इस प्रकार के नॉन बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र में दिशानिर्देश की व्यवस्था तो होती ही है, एक और भेद है जो इन्हे बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र से अलग करता है. बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र सेना की दूरगामी रणनीति का हिस्सा होते है. सम्भावित युद्ध को ध्यान में रख कर दुश्मन के किस ठिकाने पर कहाँ से प्रक्षेपास्त्र दागना है यह पहले से ही तय होता है, अमूमन इस रणनीति में बदलाव नहीं होता. जबकि नॉन बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र परिस्थिति अनुरूप उपयोग में लाये जाते है. जहाँ जब जरूरी हुआ इनका उपयोग किया जाता है. तभी इन्हे बेटलफिल्ड मिसाइल कहा जाता है, जबकि नॉन बेलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र स्टेटेजिक मिसाइल कहलाते है.
प्रक्षेपास्त्रों का वर्गीकरण उनकी मारक-दूरी के आधार पर भी किया गया है, जैसे 5500 किमी से 15000 किमी तक मार कर सकने वाले प्रक्षेपास्त्र ICBM यानी इंटर कोंटिनेंटल ब्लास्टिक मिसाइल कहे जाते है तो 2700 किमी से लेकर 5500 किमी तक की मार कर सकने वाले प्रक्षेपास्त्र IRBM इंटरमीडियेट रेंज ब्लास्टिक मिसाइल कहलाते है. फिर नम्बर आता है 1100 किमी से 2700 किमी तक की मारक क्षमता रखने वाले MRBM यानी मीडियम रेंज ब्लास्टिक मिसाइल का. अंत में आते है भारत के पृथ्वी जैसे प्रेक्षापास्त्र SRBM यानी सोर्ट रेंज ब्लास्टिक मिसाइल, इसकी मारक क्षमता 1100 किमी से ज्यादा नहीं होती.
प्रक्षेपास्त्रों का वर्गीकरण उनके दागे जाने के स्थान तथा लक्ष्य के स्थान पर भी किया गया है. ये चार प्रकार हैं, जमीन से जमीन पर मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र, जमीन से हवा में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र, हवा से हवा में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र और हवा से जमीन में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र.
श्रृंखला जारी.. ..
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