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द्वितीय विश्वयुद्ध के साथ गाजर का अनोखा संबंध |
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विज्ञान
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मंगलवार , , 22 जनवरी |
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तरकश ब्यूरो
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| ब्रिटिश वायुसेना अपने नए रडार के बारे में दूसरों को अंधेरे मे रखना चाहती थी
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जर्मन रक्षा तंत्र हैरान था कि रात के अंधेरे में इतनी अचूक बमबारी कैसे की जा रही है.
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माना जाता है कि गाजर खाने से आँखो की रोशनी तेज होती है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह मान्यता एकदम गलत भी नहीं है. लेकिन उतनी भी सत्य नही है जितना कि इसको माना जाता है. और इसके पीछे यदि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान घटी कुछ घटनाओं को जिम्मेदार माना जाए तो गलत नही होगा.
द्वितीय विश्वयुद्ध के चरम पर लडाई का पलडा कभी जर्मनी तो कभी मित्र सेनाओं के बीच झूल रहा था. जर्मन फौजें रूस तक पहुँच गई थी और इंगलैंड अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जूझ रहा था. लेकिन धीरे धीरे ब्रिटिश वायुसेना ने जर्मन ठिकानों को तबाह करना शुरू कर दिया. ब्रिटिश वायुसेना के विमान रात में उडान भरते और जर्मन ठिकानों को अपने नए विकसित किए गए उन्नत किस्म के रडारों से ढूँढ ढूँढ कर तबाह करते थे.
जर्मन रक्षा तंत्र हैरान था कि रात के अंधेरे में इतनी अचूक बमबारी कैसे की जा रही है. ब्रिटिश वायुसेना अपने नए रडार के बारे में दूसरों को अंधेरे मे रखना चाहती थी इसलिए उसने यह अफवाह फैलाई कि ब्रिटिश वायुसेना के पायलटों के लिए गाजर खाना अनिवार्य कर दिया गया है जिससे उनकी आँखें अंधेरे में भी देख पा रही हैं.
यह खबर फैलने के बाद जर्मन वायुसेना अध्यक्ष हेरमान गोरिंग ने भी अपने पायलटों के लिए गाजर खाना अनिवार्य कर दिया. लेकिन आगे चलकर जब कुछ ब्रिटिश लड़ाकू विमानों को मार गिराया गया तो उन्हे पता चला कि ब्रिटिश वायुसेना ने उन्नत किस्म के रडार विकसित किए थे. उसके बाद जर्मन वैज्ञानिक भी नए रडार विकसित करने मे लग गए, लेकिन गाजर खाने से आँखो की रोशनी बढती है यह मान्यता लोगों के दिमाग मे बैठ गई.
यह एक काल्पनिक कथा भी हो सकती है जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों मे फैली असंख्य कथाओं मे से एक है. लेकिन गाजर और तेज आँखो का संबंध एकदम काल्पनिक भी नही है. गाजर मे मौजूद बिटा केरोटिन नामक हाइड्रोकार्बन को हमारा पाचनतंत्र विटामिन ए मे बदल देता है. जो आँखो के लिए उत्तम है.
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