मैं गाँधी से मिला हूँ!!
समाज
सोमवार , , 19 मार्च

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समीरलाल


 

 

 

 

 

 

  किंतु आज यह जिंदा गाँधी. विदेश में नौकरी करता गाँधी-बिना हिले-डुले-एकदम सीधे खड़ा लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना-पुरातन गाँधी सबको जुआधर में खेलने को लुभाता गाँधी.

 

  

विशेष प्रस्तुति

 

मैं गाँधी से मिला हूँ!!

 

उस रात कुछ मित्र परिवारों के साथ जुआघर गया. सभी मित्र हिन्दुस्तानी थे. दरवाजे पर पहुँचते ही हम ठिठक गये. मेरे मित्र के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा-वो देखो गाँधी जी! एकाएक धक्का लगा-कहाँ ये जुआघर और यहाँ कहाँ गाँधी जी!

 

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फिर भी हम पलटे तो देखा लॉबी के दाँयी ओर एक मंचनुमा पत्थर पर मेनीकुइन - आदमी जो पुतला बना खड़ा रहता है, गाँधी जी के रुप में खड़ा था. कभी ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी तमाशा में गाँधी के मेनीकुइन के बारे में पढ़ा था आज साक्षात देख रहा हूँ वैसा ही माज़रा. गाँधी-जुआघर में. गाँधी-लोगों को जुआघर में आने का निमंत्रण देता, गाँधी-एक जिंदा पुतला, हिलता डुलता, बस तटस्थ भाव से सबको ताकता गाँधी. जिन अंग्रेजों को कभी अपनी चुप्पी से डरा देने वाला गाँधी- आज उनके मनोरंजन का साधन बना बेबस खड़ा गाँधी. मेरे इन्हीं कानों ने सुना पास से गुजरती उस अंग्रेज महिला की फुसफुसाहट को-लुक, हाऊ क्यूट इज दिस गाँधी!! कोई कहता-पुअर गाँधी, लुकिंग सो स्वीट!! वेरी सेक्सी! इन बातों को सुनकर भी बिना हिले डुले खड़ा लाचार गाँधी-सेक्सी गाँधी-क्यूट गाँधी. मैने यह नायाब नजारा देखा. जिस गाँधी की पाँच सौ रुपये के नोट पर तस्वीर अंकित है. लगभग उतने रुपये घंटा अर्जित करने के लिये खड़ा मजबूर गाँधी.

 

लॉबी मे हालांकि हीटींग रहती है मगर फिर भी दरवाजा बार बार खुलते बंद होते रहते के कारण काफी ठंडा रहता है वहाँ का माहौल. उस माहौल मे जैकेट और कनटोपों से ढके लोगों को लुभाता सिर्फ एक धोती पहने अर्धनग्न खड़ा गाँधी. पेट की भूख मिटाने के लिये हर कष्ट सहता गाँधी-बेचारा गाँधी.

 

शराबियों और जुआरियों का आकर्षण का केन्द्र बना गाँधी शायद सबसे पापुलर आदम पुतला है. ऐसा मैने सुना वहाँ पर. मोस्ट सेलेबल एंड इन डिमांड गाँधी. लोग उसे देख कर हँसते हैं, चुटकुला बना गाँधी. लोग आते जाते थे, थोड़ी देर खड़े होकर गाँधी जी को निहारते थे और उनके कँधे पर टंगे झोले में कुछ लोग चंद रुपये भी डाल जाते थे. चार घंटे की ड्यूटी के बाद खुशी खुशी उन पैसों को गिनता गाँधी. छद्म मगर बिल्कुल असली सा दिखता गाँधी वरना मेरा दोस्त कैसे पहचान जाता. बनावटी, पुतला मगर सांस लेता पुतला और अपनी पलकें झपकाता पुतला-बिना हिले डुले खड़ा- अविचलित गाँधी. कोई नेम प्लेट, ही वो कुछ बोलता फिर भी सब जान जाते हैं वो गाँधी है-मौन खड़ा गाँधी. गाँधी की नुमाईश लगता गाँधी.

 

gandhi2मैने पहले भी देखा है नव-धनाढ्यों को पार्टियों में आर्केस्ट्रा की धुन पर थिरकती नर्तकियों पर पाँच सौ के नोट पर सजे गाँधी को लूटता. गाँधी हवा में उड़ाया जाता है, फिर जमीन पर गिरता है और फिर उठकर उन नर्तकियों के ब्लाउज में कहीं खो जाता है. मैने यह भी देखा है कि हर बड़ी दो नम्बर डील में गाँधी ही प्रचलन में है, छोटे नोट किसी को गिनने और संजोने का समय नहीं. उन छोटे नोटों पर गाँधी भी नहीं है, वो इस प्रचलन से बाहर हैं.उन्हें गाँधी का आशिर्वाद नहीं है. मैने लिफाफों पर थूक से गाँधी को चिपकते देखा है, भारतीय डाक विभाग की टिकटों के माध्यम से. उसी गाँधी को जो बापू के नाम से जाना जाता है. उसी गाँधी की तस्वीर के नीचे बैठकर नेताओं को देश का सौदा करते देखा है.

 

किंतु आज यह जिंदा गाँधी. विदेश में नौकरी करता गाँधी-बिना हिले-डुले-एकदम सीधे खड़ा लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना-पुरातन गाँधी सबको जुआधर में खेलने को लुभाता गाँधी.

 

मैं दोस्तों के साथ जुआ खेलने जुआघर के भीतर चला जाता हूँ और यह पुतला गाँधी- मेरे मानस पटल से होता हुआ मेरे भीतर समा जाता है. मैं अपने लिये स्कॉच का एक गिलास आर्डर करता हूँ. सिगरेट के धुऐं का छल्ला बना कर उस गाँधी की याद को उड़ा देने की असफल कोशिश करता हूँ. सिगरेट के धुऐं के छल्ले में गाँधी. मगर यह गाँधी मुझ पर छाया है.  कुछ असहज सा महसूस कर रहा हूँ. घुटन से बचने को मैं वापस बाहर लॉबी में जाता हूँ. गाँधी की तरफ निगाह जाती है. उसकी ड्यूटी खत्म हो गई है. वो मंच से उतर रहा है, उसकी जगह अब सद्दाम हुसैन खड़ा है. उसके पहले उसी मंच पर चार्ली चेपलीन खड़ा था. चार्ली चेपलीन से लिया मंच सद्दाम हुसैन को सौंप कर गाँधी मंच से उतर जाता है. लोग ताली बजा रहे हैं और गाँधी मुस्करा रहा है. फिर नम्बर आता है उन लोगों का जो गाँधी के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं. हर फोटो के लिये चंद रुपये जेब में ठूंसता गाँधी. महिलाओं के साथ चिपक कर फोटो खिंचाता गाँधी, बेबस मगर मुस्कराता गाँधी.  दस मिनट फोटो सेशन के बाद गाँधी पीछे एक कमरे में चला गया. पाँच मिनट बाद निकला. अब वो जींस टीशर्ट पहने था-एक नये रुप में गाँधी. जींस टीशर्ट पहने गाँधी.

 

मैं उसके नजदीक जाता हूँ और उससे उसका नाम पूछता हूँ. वो कहता है, जावेद खान! गुजरात, भारत.  और पूछता है कि क्या आप भी भारत से हैं. मैं हामी में सर हिला देता हूँ और उसके साथ साथ बाहर जाता हूँ. वो जेब से सिगरेट निकाल कर जला लेता है. पाँच मिनट पहले का गाँधी अब सिगरेट पी रहा है. मैं उसे गौर से देखता हूँ. मुझमे कोतुहल है. मैं उससे पूछता हूँ कि यार, यह सब क्यूँ