करन कौहर और रिश�?ते
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 4
बेकारअति उत्तम 
समाज
रविवार , , 27 अगस्त

 

   निधि श�?रीवास�?तव द�?वारा


परसों मेरी �?क मित�?र का फोन आया। बोली, 'करन कौहर' की नयी फ़िल�?म देखने चलती हो? अब हम पतिदेव के बिना कहीं आते-जाते नहीं हैं सो म�?�?ह से निकल गया -- 'त�?म लोग जाओ। इनके बिना मैं...'। वाक�?य पूरा भी नहीं ह�?आ था कि उधर से भाषण श�?रू हो गया -- 'बस�?स! यही करना त�?म। हद�?द होती है। अरे यार जबसे नौकरी छोड़ी मिलती भी नहीं हो...�?क दिन अपने 'उन' के बिना चली जाओगी तो क�?छ हो नहीं जायेगा...खा नहीं जायेंगे हम त�?म�?हें...हमारे भी पति हैं...तो क�?या हम ख�?याल नहीं रखते..त�?म ही निराली पतिवाली हो क�?या...आदि आदि आदि'

 

पता नहीं उसकी बातों ने २१वीं सदी की 'आत�?मनिर�?भर स�?वतंत�?र नारीकी सोयी आत�?मा को �?क�?ोरा या फिर मैनें तीन घंटे की पिक�?चर को तीन घंटे के लेक�?चर से बेहतर सम�?ा, जो ह�?आ..हम चले गये मित�?रों के साथ सनीमा देखने। 

 

हमने पिक�?चर देखी। बिना इनके देखी । १५०/- र�?पये का ख़ून कर के देखी। पूरे तीन घंटे तीस मिनट देखी। चश�?मा-उश�?मा लगा के देखी। और देख-दाख के अंत में बेहद कनफ़�?यूज़�?ड अवस�?था में घर आ गये। शाम को पतिदेव घर आये...।

'अरे! आज ये शो-पीस बाहर कैसे निकल आया?'

'शो-पीस?'

'हा�?, ये चश�?मा। पूरे १८०० र�?पये फू�?क दिये और लगाती हो नहीं..शो-पीस नहीं तो क�?या ह�?आ? वैसे चश�?मा लगा के बड़ी प�?यारी लगती हो..�?कदम प�?ीलिखी!'

उनका मज़ाक ह�?आ हम क�?�? गये।

 

'अरे त�?म तो आज पिक�?चर देखने गयी थी न! क�?यू�? कैसी रही पिक�?चर?'

'पता नहीं। बिल�?क�?ल पा�?च सितारा थी पर।'

'वाओ! तो त�?म फ़ाइव स�?टार देती हो फ़िल�?म को।'

'नहीं मेरे कहने का मतलब म�?ख�?य रूप से उसमें पा�?च जगमगाते सितारे थे...बस।'

'क�?या?...अच�?छा ये कहो सबसे ब�?िया क�?या लगा पूरी पिक�?चर में... ?'

'बटर पॉपकॉर�?न। बड़े दिन बाद खाये।'

'त�?म भी ना!!'

'स�?नो..�?क बात बताओ..!' मैनें चश�?मा उतार पल�?ग पर सिरहाने रख लिया।

'हू�?...।'

 

हम अपना स�?ख-द�?ख इनसे बा�?टे बिना रह नहीं पाते। इस समय तो आत�?मिक, मानसिक हर तरह का क�?लेश था। सोचा लाओ डिस�?कस किया जाय। �?क तो यह हम दोनों का पसंदीदा टाइम-पास है और दूसरे अगर चर�?चा करने से कहानी का सार सामने आ जाये तो शायद १५० र�?पये ग�?वाने का द�?ख थोड़ा कम हो जाये। अब भैया माया का मोह हमसे छूटता नहीं। तो हमने फ़िल�?म की तर�?ज पर कहा :

 

'आज की फ़िल�?म में �?क डायलॉग था-- हिरोइन कहती है कि शादी के बाद म�?�?े मेरा सच�?चा प�?यार मिल गया तो? हीरो कहता है -- नहीं ढू�?ढोगी तो नहीं मिलेगा। कैसा लगा?

'बक़वास!'

'क�?यू�??'

'क�?यू�?कि आप प�?यार को नहीं ढू�?ढते, प�?यार आपको ढू�?ढ लेता है। त�?म�?हीं बताओ क�?या प�?रेम सोच के किया जाता है? बस हो जाता है..नहीं क�?या?

'हू�?....अगर म�?�?े किसी से प�?यार हो जाये तो?'

'तो?'

'अरे! तोऽऽऽऽ...ये त�?म बताओ ना...क�?या करोगे?'

'किससे हो गया है?'

अभी नहीं ह�?आ, हो जाये तो?'

'तो क�?छ नहीं ...करती रहना।'

'क�?या वाहियात जवाब है। मैं सीरियस हू�?।'

'अरे तो मैं भी कहा�? मज़ाक कर रहा हू�?। पर त�?म�?हें प�?यार होगा क�?यू�??'

'�?से ही।'

'ये क�?या बात ह�?ई?'

'अरे त�?मने ये पिक�?चर नहीं देखी ना इसलिये नहीं जानते। प�?यार कभी भी हो सकता है...बिना किसी बात के भी..बस सोल-मेट मिल जाय।'

'सोल-मेट क�?या?'

'जिससे आपको प�?यार हो'

'म�?�?से नहीं है?'

' अरे है न! लेकिन सोल-मेट वो जो आपके जैसा हो, आपसे सब आदत मिलें, सब विचार मिलें...हम और त�?म तो बिल�?क�?ल अलग हैं।"

"अलग हैं इसीलिये पूरक हैं �?क दूसरे के।'

'ओफ़�?फ़ो....त�?म �?से जवाब से मेरे डिस�?कशन का कचरा कर रहे हो।...म�?द�?दा ये नहीं कि क�?यू�? ह�?आ, बस हो गया प�?यार। शादी के बाद हो गया..हो जाता है...हिरोइन को ह�?आ था आज।'

'अब हो ही जाये तो चली जाना। मैं नहीं रोकू�?गा।'

'कहा�??'

'अरे जिससे प�?रेम हो उसके साथ।'

'पागल ह�?ये हो। �?से कैसे? मैं कहीं नहीं जा सकती त�?म�?हें छोड़ के। यहीं रहू�?गी, मन-मन में प�?रेम करू�?गी उससे।'

'क�?यू�? नहीं जा सकती?'

'क�?यू�?कि त�?म तो सिर�?फ़ म�?�?से प�?रेम करते हो। मैं स�?वार�?थ के लिये �?से छोड़ के त�?म�?हें द�?:ख नहीं दे सकती।'

'अच�?छा मेरे लिये प�?यार में कमी तो हो ही जायेगी।'

'ना..ना...त�?म�?हें इतना ही चाहू�?गी, इतनी ही इज़�?ज़त करू�?गी..बस मन मन में...शायद..पता नहीं उससे या उसकी आदतों से..।

 

पता नहीं... मैं बस सोच रही थी कि मैं हिरोइन की जगह होती तो शादी बचा पाती या नहीं क�?यू�?कि जैसे वो अलग स�?वभाव के थे हम भी हैं। हमारी र�?चिया�? तो ज़रा नहीं मिलती। मैं किताबों मे जीती हू�? और त�?म�?हें देखो...कल नींद लाने के लिये साहित�?य की किताब लिये बैठे थे और हद ये कि दो लाइन के बाद किताब औ�?धी हो गयी थी। कविता सम�?ते नहीं, चित�?र बनाते नहीं। त�?म च�?प�?पे हो मैं बकबक करती रहती हू�?। फिर शादी कैसे सफल होगी?'
 

ये ह�?से दिये, बोले-- 'सफल नहीं है क�?या?'

'अब तक तो है..पर ...अगर..'

'शादी की सफलता इसमें नहीं होती कि आपको वो मिले जो आपके जैसा हो या जिससे आपको प�?यार हो, बल�?कि इस पर निर�?भर करती है कि जो आपको मिले आप उससे प�?यार करना सीख सकें। दोनों �?क दूसरे के पूरक बन कर जियें, �?क ग़लत हो तो दूसरा स�?भाले। क�?छ त�?म उससे सीखो, क�?छ वो त�?मसे सीखे, कभी त�?म �?�?को, कभी वो। बस और क�?या चाहिये।'

'ह�?म�?म�?म�?म भारत की सभ�?यता यही है।'
'
नहीं भारत की नहीं, यह तो पूरे विश�?व पर लागू होने वाली बात है। रिश�?ते स�?वार�?थ से नहीं आपसी सम�?, प�?रेम,

समर�?पण और त�?याग से बनते हैं।'
 

हाय, हम तो री�? गये। कितनें सम�?दार हैं ये।

'अच�?छा ये कहो कि भगवान न करे, पर यदि त�?म�?हारे पैर में चोट लग जाये और त�?म ज़रा सा, बिल�?क�?ल हल�?का सा, ल�?गड़ा के चलने लगो तो?'

'तो?'

'नहीं फिर घर गृहस�?थी तो मैं चलाऊ�?गी, नौकरी करू�?गी। त�?म क�?ंठित हो जाओगे या हौसला ब�?ाओगे?'

'पहली बात ...पैर की चोट से नौकरी का क�?या संबन�?ध? मैं नौकरी क�?यू�? नहीं करू�?गा?'

'अरे ..मानो त�?म फ़�?टबॉल खेलते हो। अब चोट के बाद नहीं खेल सकते ना!'

'तो? प�?ा लिखा हू�? या नहीं?'

'सो तो हो।'

'तो फिर नौकरी करू�?गा, जैसी मिले वैसी करू�?गा। विश�?वास हो, लगन हो तो सफलता मिलनी ही मिलनी है। और दूसरी बात- अगर त�?म नौकरी करती ह�?ई तो मैं क�?यू�? क�?ंठित होने लगा? यदि इतना ही असमर�?थ हू�? तो यथासंभव त�?म�?हारा हाथ बटाऊ�?गा। यहा�? बात वही प�?रानी नहीं है कि नारी घर चलाये, प�?र�?ष बाहर पैसे कमाये। गृहस�?थी की गाड़ी तो मिल के खी�?ची जाती है। हम जीवन साथी हैं, जब जैसी ज़रूरत पड़े वैसे काम करेंगे।'

'ये तो सम�?दारों वाली बात ह�?ई। प�?रैक�?टिकल बात करो। मैं फिर कहती हू�? त�?मने फ़िल�?म नहीं देखी सब इसलिये ..वरना जानते कि �?सा होता है...हीरो के साथ ह�?आ।'

'मैनें पहले ही कहा रिश�?ते सम�? पर टिके होते हैं। सम�?दारी से काम न लेना प�?रैक�?टिकल होता हो, ज़रूरी नहीं। ये सब इस बात पर निर�?भर करता है कि आप किसी रिश�?ते को बचाना चाहते हैं या नहीं। नहीं बचाना चाहते तो छोटी बात भी काफ़ी है सब ख़त�?म करने को।'

'सही कहते हो। पर इसी बात के साथ पिक�?चर की कहानी का अर�?थ ही समाप�?त हो गया।'

'क�?या कहानी थी?'

'क�?छ नहीं। दो स�?वार�?थी लोग हैं। स�?वार�?थी हैं या कनफ़�?यूज़�?ड हैं पता नहीं। शादी हो च�?की है। �?क जोड़े के �?क बेटा भी है। त�?म�?हारे प�?रिय अभिनेता भी हैं ...पता नहीं क�?यू�?। अब �?क जोड़े के पति को दूसरे की पत�?नी से प�?रेम हो जाता है। कारण ..वे अपनी शादी से ख�?श नहीं है। पति क�?ंठित है बिना बात के...मानों पत�?नी के सफलता से जल रहा हो। दूसरे की पत�?नी है, प�?यार नहीं करती पर शादी की..अब निबाहते नहीं बन रहा। निभाने की कोशिश दोनों करते ही नहीं। उनके साथी �?ड�?जस�?टिंग हैं, डिवोटड हैं...फिर भी उनको धोखा देते हैं। जब उनके साथी शादी बचाने के बारे में सोच रहे हैं, वे साथ-साथ घूम रहे हैं, प�?रेम में आकंठ डूबे हैं। फिर बड़ा अच�?छा काम करते है वे...अपने साथियों को बता देते हैं कि जी हमें तो कोई और पसंद है। ..उनके साथी उन�?हें छोड़ देते हैं। पति को  बच�?चे का ख़याल नहीं आता, मा�? का नहीं आता। उधर दूसरे की जो पत�?नी है उसे पति, जिसका पिता की मृत�?य�? के बाद कोई नहीं रहा, से सहान�?भूति तक नहीं होती। बस...चले जाते हैं...और......�?...कहा�? हो?

 

मैनें इनको देखा..ये सो च�?के थे....लो बताओ! कहानी भी नहीं स�?न पाये...मैनें पिक�?चर भी देख ली और ज़िंदा हू�?..। सोच रही हू�? कि क�?या बेसिरपैर की फ़िल�?म थी। संदेश था क�?या - 'सच�?चे प�?यार की जीत होती है' या 'सच�?चा प�?यार आपको ढू�?ढ ही लेता है' या 'उससे शादी करें जो आपका सोल-मेट  हो' या 'अगर आपका साथी आपका सोल-मेट नहीं है तो तलाक़ दे कर मामला रफ़ा-दफ़ा करें'..आखिर क�?या था संदेश? आह!...तभी हाथ में क�?छ च�?भा। अपनी बेख़याली में पता ही नहीं चला कि मैं कब चश�?मे पर लेट गयी। अब ये तीन ट�?कड़ों मे ब�?ट गया है। मेरे म�?�?ह से बेसाख़�?ता निकली 'हाय राम' स�?न के ये जाग गये हैं। अभी थोड़ी देर पहले चश�?में पर ह�?�? खर�?चे का उलाहना दे रहे थे अब कह रहे हैं-'कोई बात नहीं...देखो सिर�?फ़ लेंस टूटे...फिर बन जायेगा...देखो रो न देना...प�?लीज़...क�?छ भी नहीं ह�?आ...क�?या ह�?आ रख दिया पल�?ग पे तो...जान के थोड़े किया...मत द�?खी हो।'

 

'करन कौहर' ने क�?या सोच के �?सी फ़िल�?म बनायी जिसमें संवेदनाओं का कोई स�?थान ही नहीं। संदेश ना हो न सही पर �?सी फ़िल�?म का क�?या लाभ जो भटकते ह�?�? समाज को �?क और ग़लत संदेश दे। टूटते रिश�?ते समेटने के बजाय उन�?हें तोड़ने की सलाह दे। म�?�?े यश चोपड़ा की 'सिलसिला' याद आ रही है...। मैं चश�?में को भूल के सोचे जा रही हू�?...करन कौहर को नहीं पता शायद...रिश�?ते स�?वार�?थ से नहीं आपसी सम�?, प�?रेम, समर�?पण और त�?याग से बनते हैं।
टिप्पणियाँ (6)add
looking nice
द्वारा प्रेषित Arshad , अगस्त 30, 2006
sir, articles are nice!
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करन कौहर और
द्वारा प्रेषित सीमा , सितम्बर 02, 2006
बह?त दिनों के बाद हिन?दी की कोई इतनी लम?बी रचना पढ जिसमें इतनी आनंद आया और सोचने पर भी मजबूर किया | सिनेमा का संदर?भ लेकर सामजिक ?वं व?यावाहिक जीवन पर की गई बात उनको लेकर कई सवाल सामने लाती है |
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करन कौहर और
द्वारा प्रेषित अनूप श?क?ल , सितम्बर 02, 2006
रिश?ते स?वार?थ से नहीं आपसी सम?, प?रेम, समर?पण और त?याग से बनते हैं।
यही इस कहानी का मूल भाव है। इसको बताने में लेखिका सफल रहीं।लेखन शैली ?क बार फिर बिंदास लगी। बधाई!

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द्वारा प्रेषित नितिन बागल , सितम्बर 02, 2006
'म?न?ना भाई' से मिल लीजिये ?क बार..और करण जौहर ओ भी मिलवा दीजिये...उन?हे भी पता चल जाये गा, फ़िल?म बनाने के और भी तरीके होते हैं..smilies/smiley.gif
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द्वारा प्रेषित Guest , सितम्बर 11, 2006
Well said, if i was editor of some online magzine i would paste this as my top review.
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करन कौहर और
द्वारा प्रेषित नीरज दीवान , सितम्बर 12, 2006
अच?छा होता कि मैं आपकी कहानी पढ़ने के पहले फ़िल?म देख लेता. बिना देखे कैसे कहूं. किंत? आपके निजी संवाद पढ़ने के बाद लगा कि आपको फ़िल?म से परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. दंपत?ति में विचार विमर?श चलता रहे यही स?थायित?व बनाता है. वैसे मैं इस टीप के लि? भी अधिकृत नहीं मानता क?योंकि अभी तो मैं अविवाहित हूं. हा हा

अरे हां. जॉन ग?रे के इस साइट का अवलोकन करें.. भई मेरे को तो यह बड़ा दिलचस?प लगता है. http://www.mars-venus-counselors.com/
कीबोर?ड के सिपाही
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