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सागर की यादें : छुट्टियाँ
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 5
बेकारअति उत्तम 
समाज
गुरुवार , , 29 मार्च

sagar

  सागर नाहर 


 

 

 

 

 

 

  आज में जब गाँव जाता हूँ और बाजार में मोहन काका कहीं दिख जाते हैं तो मैं वहीं जब उनके पाँव छू लेता हूँ तब वे बहुत संकोच करते हैं और मुझे हाथ जोड़ने लगते हैं। मोहन काका सोचते हैं कि लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे

 

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लो फिर से मौसम में गर्मी गई, यहाँ हैदराबाद का तापमान २५ डिग्री से उपर जाने लगा है। दोपहर को सड़कें सूनी सूनी हो जाती है। तेज गर्म हवाओं के साथ धूल ऊड़ने लगी है अभी से। पर देता हूँ बच्चों को चैन नहीं, धूप हो या छांव उन्हें खेलने से रोक पाना बड़ा मुश्किल काम है। आज बैठे बैठे अचानक ही बचपन की गर्मी की छूट्टियाँ याद गई। अंतिम परीक्षा के दिन पर्चा हल होते ही मानो कैद में से छूटे। कापियाँ किताबें आले में धर कर खेलने लग जाते (वैसे भी उन्हें पढ़ते थे ही कब ?)


हमारे मोहल्ले में मेरे तीन चार दोस्त हुआ करते थे और उन दोस्तों के दोस्तों को मिलाकर दस पन्द्रह लड़के मिल जाते थे। सबसे अच्छे दोस्त थे पारस और विजयेन्द्र जिसे हम विजू कहते थे। पारस तो जैन ही था पर विजू सिंधी था। पारस उम्र में लगभग पाँच-: साल बड़ा था हमसे, पर दोस्त बड़ा गहरा था। जब मम्मी घर से बाहर नहीं निकलने देती दोपहर की तेज धूप में पारस के बुलाने पर; तो पारस हमें खेलने बुलाने के लिये नित्य नये नये तरीके ढूंढ लेता था, कभी सीटी, कभी कुत्ते की या कभी बिल्ली की आवाज निकालकर बुलाता पर पता नहीं कैसे मम्मी को पता चल जाता और हमें बाहर नहीं जाने देती। तब कुढ़ते और सोने का अभिनय करते हुए मम्मी के इधर उधर होने का इंतजार करते जैसे ही मम्मी इधर उधर हुई या सुस्ताने लगती कि हम बाहर भाग जाते।


फिर होती धमाचौकड़ी शुरु। एक ही खेल से थोड़ी देर में बोर हो जाते थे। और खेल भी हर घंटे में बदल जाते थे सात पत्थरों को बीच में कर गेंद से मारकर उन्हें फिर से जमाने वाला खेल सीतोलिया, चोर पुलिस, एक पाँव उपर रख कर और एक पाँव से दूसरों पकड़ने वाला लंगड़ी टांग, नदी पहाड, कंचे, गिल्ली डंडा आदि। गिल्ली डंडा और कंचे पापाजी नहीं खेलने देते थे पर फिर भी खेल लेते थे जब पापाजी दफ्तर में होते थे। कंचो में कई नये खेल इजाद किये थे जिसमें एक था "भूल चूक पीली माटी" जिसमे सभी खिलाड़ी अपने अपने समान संख्या में कंचे उसे देते जिसका नंबर होता था। वह उन कंचों को दूर बने एक छोटे से छेद जिसके के पास एक लाइन बनी होती थी, उस तरफ भूल चूक पीली माटी कह कर फ़ेंकता था, भूल चूक नहीं बोलने पर एक कंचे की सजा मिलती थी। अगर एक भी कंचा छेद में चला गया तो सारे कंचे उसके अगर नहीं गया तो दूसरों के कहे कंचे पर निशाना लगना होता था। निशाना सही लग गया तो ठीक वरना दूसरे का नंबर। और हाँ क्रिकेट। उसे कैसे भूल सकते हैं।

 

स्पंज वाली लाल गेंद से क्रिकेट खेलते। जब नालियों में गेंद में भीग जाती तब निकाल कर फिर खेलने लगते। तब नाली में हाथ डालने पर भी कोई हिचक नहीं होती थी। पारस तो नाली के पास ही खड़ा होकर फ़िल्डिंग करता था। हर गेंद पर छक्का लगता था और भीगी स्पंज की गेंद से जो दीवारों पर निशान बनते वे आज भी कई पुराने मकानों पर बने हुए हैं क्यों कि उन मकानों के मालिक मद्रास या बैंगलोर रहते हैं और सालों तक अपने घर नहीं आते। जब भी राजस्थान जाना होता है उन निशानों में मेरे लगाये छक्के पर बने निशान को ढूंढने की असफल कोशिश करता हूँ। असफल इसलिये कि हमारे गांव छोड़ देने के बाद भी मोहल्ले में बच्चे तो बड़े होने ही थे और उन बच्चों ने भी हमसे दीवार पर गेंद से निशान बनाने का पराक्रम सीखा था ठीक उसी तरज जैसे हमने अपने से बड़े बच्चों से सीखा था।


उन दिनों हम के श्रीकांत, अज़हर और नवजोत सिद्धू के साथ विवियन रिचर्डस के दीवाने हुआ करते थे और अपने हर चौके और छक्के पर यूं इतराते कि मानो हम भी भविष्य के के. श्रीकांत या सिद्धू होंगे, यह भूल जाते कि विपक्षी टीम में भी अपने आप को कपिल देव या गावस्कर समझने वाले खिलाड़ी हैं और फिर हमारी गेंदो की भी धुनाई होती। कोई भी बच्चा आउट होने पर नहीं मानता था कि वह आउट हो गया है क्यों कि विकेट कहाँ होते थे, दीवारों पर कोयले से तीन लकीरें खींच लेते थे। बाकायदा अंपायर भी हुआ करता था पर उसकी सुने कौन?


एक बार इसी तरह पारस अंपायर बना हुआ था और मैं बैटिंग कर रहा था, एक गेंद पर मैं आऊट नहीं था पर पारस ने मुझे आऊट घोषित कर दिया। मैने अंपायर को यानि पारस को ही पकड़ कर पीट दिया। उस जमाने में यह डर नहीं था कि अंपायर को पीटने पर खेलने पर साल दो साल का प्रतिबंध लग जायेगा। उसी शाम को पारस ने ही बदला ले लिया। चोर पुलिस खेलते समय मैं चोर बना था और पारस पुलिस....


कभी कभार जे एस साईकिल वाले से छोटॊ साईकिल जो आधे घंटे के लिये पच्चीस पैसे में किराये मिलती थी, घर से चुराये पैसों ( भाई मैं नहीं चुराता था यह सब पारस ही करता था) से ले जाकर घंटो तक करणी माता के मंदिर के पास तो कभी दशहरा मैदान में चलाते रहते। जे एस साईकिल वाले के नौकर को थोड़ी बहुत रिश्वत दे रखी थी सो समय लिखने में हनारे पक्ष में गड़बड़ कर देता था।


वर्षों बाद जब जे एस मिले तब राज का पता चला कि उन्हें सब पता था कि कौन कितनी साइकिल चलाता है और पैसे कितने देता है। उस दिन जे एस भाई ने अनुरोध किया कि मैं उनकी बड़ी साइकिल किराये पर लूं, मैने एकाद घंटे साईकिल चलाई और जब पैसे देने लगा तो उसने पैसे लेने से साफ मना कर दिया तब पता चला कि गाँवों में लोगों का एक दूसरे के प्रति कितना स्नेह है। मैं उस साईकिल वाले का कुछ नहीं लगता था पर जो प्रेम उससे मिलता था उसका वर्णन कर पाना संभव नहीं है।


साइकिल चलाने से थक जाते तो वही एक बरगद के पेड़ के नीचे प्याऊ थी जहाँ दोनो हाथों को आगे कर माई को कहते पानी पिलाने को तो माई एक जग जिसकी लम्बी नली से पानी बाहर निकलता था, को हमारे छोटे-छोटे हाथों में डालकर हमें पानी पिलाती। आधा पानी हाथों से निकल कर कोहनी से होते हुए कपड़ों को भीगोता और आधा मुंह में जाता। इस तरह पानी पीने में जो आनन्द मिलता वह आज फ्रिज के ठंडे पानी मे भी नहीं मिलता। बड़ा मन होता है प्याऊ का पानी पीने का पर अब ना तो उस जगह माई है और ना ही प्याऊ। वहीं पास में एक पान का गल्ला है जहाँ से लोग एक रुपये का पानी का पाउच खरीद लेते हैं और अपनी प्यास बुझा लेते हैं। मानो दुनियाँ की रफ्तार के साथ प्याऊ भी पिछड़ेपन का प्रतीक बन गई है।


उन दिनों पापाजी की तबियत खास ठीक नहीं रहती थी तो एक ठेले वाले हमारे यहाँ आकर गेहूँ पिसवा देते, राशन से केरोसीन और शक्कर ले आते या कोई भी छॊटा मोटा काम कर देते तेह। उनका नाम है मोहन हम उन्हें आदर से मोहन काका कहते थे। मेरे भाई बहनों की शादी का बहुत सा काम मोहन काका ने ही किया था। यहाँ तक की झूठी थालियाँ या पत्तल तक उठाने में उन्हें कोई शर्म नहीं होती था। हम भाई बहनों से बहुत को स्नेह करते थे। आज में जब गाँव जाता हूँ और बाजार में मोहन काका कहीं दिख जाते हैं तो मैं वहीं जब उनके पाँव छू लेता हूँ तब वे बहुत संकोच करते हैं और मुझे हाथ जोड़ने लगते हैं। मोहन काका सोचते हैं कि लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे कि एक जैन, एक नीची जाति के मजदूर के पाँव छू रहा है पर हम सभी भाई बहनों को कभी भी उनके पाँव छूने में संकोच नहीं हुआ। हम उनकी गोदी में खेले हैं, कई बार मैने मोहन काका के कपड़ों पर सू- सू और छी करी है, आज मैं बड़ा हो गया इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं उनके पाँव छूने से शर्म करूं।


आगे फिर कभी।

टिप्पणियाँ (15)add
badhiya
द्वारा प्रेषित pankaj bengani , मार्च 29, 2007
bahut sahi
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वाह
द्वारा प्रेषित pankaj bengani , मार्च 29, 2007
यह विडम्बना ही है कि हमारे समाज में आज भी काम और जाति प्रथा को महत्व दिया जाता है इन्सान को नही. परंतु इंसान अपने कर्मो से छोटा या बडा होता है.


आपने उदाहरण पेश किया है, साधुवाद. smilies/smiley.gif
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बहुत बढिया
द्वारा प्रेषित सुरेश चिपलूनकर , मार्च 29, 2007
हरेक के जीवन में इस तरह की बचपन की यादें होती हैं, इन्हें कलमबद्ध करना महत्वपूर्ण है, आखिर बचपन हमारे जीवन का स्वर्णिम काल होता है...बहुत बढिया लिखा है...
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सूनी-2 गलियाँ
द्वारा प्रेषित डा प्रभात टन्डन , मार्च 29, 2007
बढिया ! यादें ताजा कर गई, वह छुट्टी के दिन , शाम का इंतजार और वह क्रिकेट का जूनून । लेकिन सागर अगर आज के दौर मे देखो तो स्थिति बिल्कुत उलट दिखती है। अब गलियाँ सूनी दिखती हैं, खेल-कूद मे उत्साह नजर नहीं आता, हाँ उसकी जगह बच्चे टी वी पर चिपके रहना अधिक पंसद करते हैं।
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वो कागज की कश्ती वो बारीश का पानी !
द्वारा प्रेषित आशीष , मार्च 29, 2007
सागर भाई,

बचपन की और लौटा दिया आपने !
वैसे यदि पारसजी यदि हमे मिल जाये तो वो यही कहेंगे कि पैसे मै नही सागर चुराता था smilies/grin.gif

वैसे ये तो बताया नही कि शाम को चोर पुलीस के खेल मे क्या हुआ था ?
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सुंदर
द्वारा प्रेषित अतुल शर्मा , मार्च 29, 2007
सागर भाई, बचपन तो होता ही सुनहरा है, परंतु आपने अपने लेखन से उसे जीवंत कर दिया है।
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द्वारा प्रेषित दीपक , मार्च 29, 2007
बीते हुए लम्हो की कसक आज भी है....लेकिन सभी बन्धूओ को स्मरण करने का अनुपम कार्य किया है..साधूवाद..


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बचपन
द्वारा प्रेषित समीर लाल , मार्च 29, 2007
बहुत बढ़िया तरीके से याद किया गया है जीवन के सुंदर पलों को...बहुत खूब. smilies/grin.gif
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द्वारा प्रेषित नितिन बागला , मार्च 29, 2007
खूब याद दिलाई आपने गर्मी की छुट्टियां । मैं चूंकि कक्षा ५ से छात्रावास मे रहा, इसलिये गर्मियों की बात ही कुछ और होती थी, २ महीने की लम्म्म्बी छुट्टी ।
जाने कहां गये वो दिन ...
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मर्मस्पर्शी
द्वारा प्रेषित अफ़लातून , मार्च 30, 2007
आपके मर्म का स्पर्श करा गयीं ये यादें । आपको प्रणाम ।
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'टाइम ज़ोन'
द्वारा प्रेषित महावीर , मार्च 30, 2007
सागर जी, हमें तो बचपन के 'टाइम ज़ोन' में पहुंचा दिया। बहुत ही ख़ुबसूरत चित्रण है। 'सुदर्शन फ़ाकिर' की कुछ पंक्तियां दे रहा हूं -
कभी रेत के ऊंचे टीलों पे जाना,
घरौंदे बनाना बना के मिटाना,
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी,
वो ख्वाबों खिलोनों की जागीर अपनी,
न दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधन,
बड़ी ख़ूबसूरत थी वो ज़िंदगानी।
धन्यवाद।
महावीर शर्मा

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बहुत खूब
द्वारा प्रेषित श्रीश शर्मा 'ई-पंडित' , अप्रेल 01, 2007
अपने बचपन का आईना दिखा दिया आपने। अच्छी प्रस्तुति।

ये तो बताया नहीं आपने कि शाम को चोर पुलिस के खेल में पारस ने बदला किस तरह लिया? smilies/smiley.gif
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द्वारा प्रेषित गिरीश सिह , अप्रेल 04, 2007
बहुत अच्छा लिखा है सागरभाई। बचपन कि यादे ताजा हो गयी। आज के दौर मे देखो तो स्थिति बिल्कुत उलट दिखती है।
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बातें भूल जाती हैं यादें याद आती हैं.....
द्वारा प्रेषित Dr.Bhawna Kunwar , अप्रेल 06, 2007
अँधेरों में जो गया था खो...
आज सामने आया है वो...
बचपन, बचपन, बचपन।
देर से पढा पर समझा खूब। बातें भूल जाती हैं यादें याद आती हैं.....
बहुत खूब। बहुत-बहुत बधाई।
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समाज से खारिज होत संस्कारों का सागर
द्वारा प्रेषित sanjay patel , मई 05, 2007
अतीत के गलियारों की सैर हो गई.सागर भाई हम अतीत में ही अच्छे थे.पिछ्ले दस बरसों में हम जितना बदले हैं ...वैसे 50 बरसों में भी न बदले थे.इन द्स बरसों में हमने जो सबसे बडी ख़राबी पैदा की वो है लोन ले ले कर खुश रहने का शगल पैदा करना.मध्यम वर्ग को तो खत्म ही कर दिया इस लोन-कल्चर ने.इसी से मरने लगी भावनाएं..जज़्जात और रिश्ते.संबोधनों तक को बिगाड़ डाला हमने.. मेरा प्रिय जुमला है...क्या थे...क्या हो गये...क्या होंगे.
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