विधवाओं का गाँव
समाज
शुक्रवार , , 16 मार्च

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  पंकज बेंगाणी 


 

 

 

 

 

 

  इस गाँव के लगभग हर घर के किसी ना किसी पुरूष सदस्य की मौत सडक दुर्घटना में हुई है. और फिर 26 जनवरी 2001 को आए विनाशक भूकंप में यहाँ के सैंकड़ो लोगों ने अपनी जान गँवा दी थी और उनमें भी ज्यादातर पुरूष ही थे. इसलिए इस गाँव को विधवाओं का गाँव कहा जाने लगा.

 

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  यहाँ हर घर के आगे एक ट्रक खड़ा मिलता है और लगभग हर घर में एक विधवा महिला रहती है. यह अनोखा गाँव है और यह गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है. इस गाँव का नाम रत्नाल है. 2000 घरों से आबाद इस गाँव में 1500 के करीब ट्रक हैं। माल ढुलाई परिवहन इस गाँव के लोगों का मुख्य पेशा है. गाँव का अमूमन हर व्यक्ति इस व्यवसाय से जुड़ा हुआ है. तीन दशक पहले यह स्थिति नहीं थी. उस समय यह गाँव भी आम भारतीय गाँवों की तरह गरीब और पिछड़ा हुआ था. लेकिन स्थिति में व्यापक बदलाव तब आया जब यहाँ गुजरात मिनरल देवलपमेंट कोर्पोरेशन GMDC की स्थापना हुई और खनिज पदार्थों का उत्पादन शुरू हुआ.


रामजी करसन इस गाँव के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अपना खुद का ट्रक ख़रीदा था. यह सन 1980 के आसपास की बात होगी. उन्होने मस्कट में काम करके कमाए अपने सारे रूपये ट्रक खरीदने के पीछे लगा दिए थे. उन्होने GMDC के लिए माल ढुलाई करना शुरू किया. जल्द ही उनकी देखा देखी कई और लोग इस व्यवसाय में जुड़ने लगे, क्योंकि वर्षा की कमी की वजह से खेती में भी कोई कमाई नही रह गई थी.

धीरे धीरे गाँव में ट्रकों का जमावड़ा होना शुरू हो गया. फिर ऐसा क्या हुआ कि इस गाँव को विधवाओं का गाँव कहा जाने लगा?

वास्तव में हुआ यूँ कि ट्रक खरीदने वाले ज्यादातर लोग आम किसान थे, जिन्हे वाहन चलाने का कोई खास अनुभव नही होता था. ये लोग बहुत गरीब थे और माल ढुलाई के लिए स्वयं ही ट्रक चलाते थे. उस समय के खराब राजमार्ग, अनुभव की कमी, तथा काम के दबाव की वजह से सडक दुर्घटनाएँ एक आम बात होती थी.

इस गाँव के लगभग हर घर के किसी ना किसी पुरूष सदस्य की मौत सडक दुर्घटना में हुई है. और फिर 26 जनवरी 2001 को आए विनाशक भूकंप में यहाँ के सैंकड़ो लोगों ने अपनी जान गँवा दी थी और उनमें भी ज्यादातर पुरूष ही थे. इसलिए इस गाँव को विधवाओं का गाँव कहा जाने लगा.

लेकिन अब स्थिति में सुधार आया है. लोग अपने ट्रकों को चलाने के लिए व्यावसायिक ड्राइवर रखने लग गए हैं. लोगों मे जागृति आई है, राजमार्गों का विकास हुआ है, और उत्पादन में बढ़ोत्तरी होने से लोगों को रोज़गार भी मिलने लग गया है.

अब लोग अन्य व्यवसायों में भी हाथ आजमाने लग गए हैं, परंतु फिर भी आज भी इस गाँव के 90% लोग माल ढुलाई का ही व्यवसाय करते हैं. लेकिन सुखद स्थिति यह है कि नए लोग अब भूलने लग गए हैं कि यह गाँव कभी विधवाओं के गाँव के नाम से कुख्यात था.


 
टिप्पणियाँ (1)add
हम्म्म!!
द्वारा प्रेषित समीर लाल , मार्च 17, 2007
पहली बार सुना इस गाँव के बारे में. धन्यवाद जानकारी के लिये.
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