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बुरान: एक अंतरीक्ष यान की अकाल मौत |
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तकनीक
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गुरुवार , , 21 जून |
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पंकज बेंगाणी
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जब मैं यह लिख रहा हुं तब भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में 6 महीने का लंबा सफर गुजार कर वापस धरती की ओर रवाना हो चुकी है तथा समस्त विश्व की निगाहें इस ओर टिकी हैं कि क्या उनका यान सफलता पूर्वक धरती के वातावरण में प्रवेश कर जाएगा.
कल्पना चावला की आकस्मिक मृत्यु के बाद सुनीता की सुरक्षित घर वापसी के लिए भारत में पूजा पाठ और दुआओं का दौर शुरू हो चुका है. सुनीता इस समय जिस अंतरिक्ष यान में बैठकर धरती की तरफ लौट रही हैं, वह अमरीका का अत्याधुनिक अंतरिक्ष यान है. यह थ्री-इन-वन कहा जाने वाला यान स्पेस शटल लॉन्चर भी है, अंतरिक्ष यान भी है और साथ ही साथ विमान भी है.
लोंचिंग के समय इसके तीन इंजन प्रति सेकंड 3000 लीटर प्रवाही हाइड्रोजन का दहन करके भरपूर दबाव बनाते हैं तथा अपने अन्य बूस्टर रॉकेट की मदद से तेजी से अंतरिक्ष की तरफ कूच शुरू करते हैं. 45 किलोमीटर के सफर के बाद इसके बूस्टर रॉकेट इससे अलग होकर पेराशुट की सहायता से धरती पर वापस लौट आते हैं, और अपने पुनः उपयोग के पहले मरम्मत करवाने पहुँचा दिए जाते हैं. लेकिन यह यान अंतरिक्ष की अपनी यात्रा जारी रखता है. अपनी ध्रुवीय कक्षा की यात्रा पुरी करने के बाद यह यान अंतरिक्ष यान में बदल जाता है तथा अपने साथ गए अंतरिक्ष यात्रियों का घर बन जाता है. अंतरिक्ष का मिशन पूरा होने के बाद यह वापस धरती की ओर अपना सफर शुरू कर देता है, और अंत में किसी यात्री विमान की तरह 4.5 कि.मी. लम्बे रन वे पर उतर कर अपना सफर समाप्त करता है.
आज अमरीका के अलावा चीन के पास भी इस तरह का (इससे कम विकसित) यान है. लेकिन इससे बहुत पहले सिर्फ सोवियत संघ ही अमरीका के टक्कर के यान बनाने की क्षमता रखता था. पूर्व सोवियत संघ ने 80 के दशक में अपनाअंतरिक्ष यान बनाया था, जिसका नाम रखा गया " बुरान" यानि हिम वर्षा. यह देखने में और कद काठी में अमरीकी स्पेस शटल जैसा ही था. लेकिन इसकी कार्य प्रणाली काफी अलग थी और कई मायनों में यह अमरीकी अंतरिक्ष यान से बेहतर भी था.
बुरान वास्तव में अंतरिक्ष यान तो था परंतु लॉंच व्हिकल नहीं था. यानि की उसे अंतरिक्ष तक का सफर अपने साथ फिट की गई बूस्टर रॉकेटों द्वारा पूरा करना पडता था. अमरीकी यानों की तरह 45 कि.मी. के बाद का सफर अपने बुते करने की क्षमता उसमें नहीं थी. बूस्टर रॉकेटों द्वारा पृथ्वी के वातावरण से बाहर पहुँचा दिए जाने के बाद यह यान अपने दो इंजनों की सहायता से अपनी भ्रमण कक्षा में स्थापित हो जाता था तथा अपने अन्य असंख्य थ्रस्टर इंजनों की सहायता से दिशाएँ बदलता रहता था.
लेकिन इस यान की मुख्य ख़ासियत यह थी कि रूस ने इसे ऑटोपायलट तकनीक से लैस किया था, यानि इस अंतरिक्ष में जाने तथा भ्रमण करने के लिए किसी अंतरिक्ष यात्री की जरूरत नहीं पडती थी. इसकी दूरसंचार प्रणाली पुरी तरह से स्वयं संचालित थी. परंतु यदि अंतरिक्ष यात्री भी सफर करना चाहें तो इसमें 70 घन मिटर की कॉकपिट का भी प्रावधान था.
अपने अंतरिक्ष प्रवास के बाद धरती के वातावरण में लौटने के बाद बुरान 2000 कि.मी. तक आकाश में विचरण कर सकता था. यानि कि यदि रन वे बहुत दूर हो तो भी उसे कोई फर्क नहीं पडता था, और लैंडिंग का कार्य भी वह अपने आप कर सकता था. यानि कि अमरीकी यान के मुकाबले इसकी तकनीक अधिक आधुनिक थी.
इस अंतरीक्ष यान ने अपना पहला प्रवास नवम्बर 15, 1988 को किया और यह प्रवास उसका अंतिम प्रवास भी था. यह यान अपने निर्धारित समय पर बिना किसी चालक की सहायता के आकाश में गया, पृथ्वी की दो प्रदक्षिणाएँ की तथा रूस के बैकानुर कोस्मोड्रोम पर सफलता पूर्वक उतर गया. यह सोवियत संघ के लिए एक बडी कामयाबी थी.
लेकिन इसके बाद इसके नसीब में और कोई यात्रा नहीं लिखी थी. इसके बाद सोवियत संघ का विघटन शुरू हो गया और यह देश अनेक छोटे छोटे देशों में बँट गया. इसकी आर्थिक और राजनैतिक स्थिति डावाँडोल हो गई. लेकिन रूस ने इसके बाद भी बुरान परियोजना को लम्बे समय तक जीवित रखने का प्रयास किया. इसके बाद दो और बुरान यान बनाने का प्रोजेक्ट शुरू किया गया लेकिन पैसों के अभाव के चलते यह प्रोजेक्ट कभी पुरा नहीं हो सका. इसके बाद सन 2001 में बुरान प्रोजेक्ट को फिर से शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया. लेकिन यह बात आगे चले उससे पहले ही मई 12, 2002 को बुरान के घर के रूप में काम कर रहा भीमकाय हेंगर मरम्मत के अभाव में गिर पडा और बुरान नामक अंतरिक्ष यान नष्ट हो गया.
इस तरह से इस क्रांतिकारी यान का दुखद निधन हुआ, जो अपने समय में समय से आगे का यान था.
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बहुत सही जानकारी मिली पढ कर.
मुझे इसी तरह की चीज़े पढने का शौक है.
उम्मीद है आगे भी ऐसे ही पढने को मिलता रहेगा.