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मरचीज़न फॉल नेशनल पार्क की यात्रा-4
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 5
बेकारअति उत्तम 
भ्रमण
गुरुवार , , 05 जुलाई

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  भावना कुँअर


 

भावना कुँअर उत्कृष्ट कवियत्री तथा हिन्दी चिट्ठाकार हैं


आप कहीं भी, किसी भी स्थान पर जायें वहाँ कुछ अच्छी और कुछ बुरी यादें जुड़ी होती हैं, किन्तु बुरी यादें दिल को झकझोर देती हैं, यहाँ तक कि रुला भी देती हैं क्योंकि सुख-दुख जीवन के दो पहलू जो ठहरे, किन्तु हममें से कोई भी इन्सान उन यादों से घबरा कर उन स्थानों पर जाना तो नहीं छोड़ देता ना। ई-मेल द्वारा लगातार पाठकों की अगले अंक की डिमांड पर प्रस्तुत है ये अंक-

पिछले अंक में आपने पढा था कि डिनर के बाद हम लोग कॉटेज़ में पहुँचे और रात कॉटेज़ में बितायी या टेन्ट में ? तो अब आगे पढ़िये-




mar-4-1डिनर के बाद हम लोग कॉटेज़ में पहुँचे कुछ देर तम्बोला, अन्ताक्षरी आदि खेला फिर बाहर घूमने का मन किया तो बाहर निकल आये और घूमते रहे। मैंने लैटर पैड उठाया और अपने साथ बिताये पलों को कैद करती चली गयी। ठीक १० बज़े सिक्योरिटी गार्ड आ गया। हमने उससे वहाँ के बारे में जानकारी ली कि यहाँ कितना खतरा है? उसने हमें बताना शुरु किया कि-"रात में यहाँ पर अक्सर लेपर्ड आया करते हैं और कभी-कभी जंगली सूअर भी।" हमने पूछा-"तो तुम्हारे पास क्या है उनसे रक्षा के लिये?" उसने कहा- "Trick" हमने पूछा वो कैसे? क्योंकि उसके पास एक रस्सी थी और एक टॉर्च, कोई गन आदि नहीं थी। वो बोला-"जब शेर आता है तो हम इस रस्सी को जमीन पर फेंककर अपनी तरफ एक खास तरीके से खींचते हैं जिससे शेर रस्सी को सांप समझकर भाग जाता है और सभी जानवरों पर एक खास स्टाईल से टॉर्च मारते हैं तो वो भी भाग जाते हैं। ठीक बारह बज़े सभी लाईटें बन्द कर दी जाती हैं।'

अब ये सुनकर भागने का मन तो हमारा हो रहा था पर कहाँ भागते अब तो भागने में भी जिन्दगी खत्म होती नज़र आ रही थी और रुकने में भी, अब मरते क्या न करते वाली स्थिति हमारी हो चुकी थी। डर अलग बात है और उत्सुकता अलग, हमारे मन में भी उत्सुकता कुछ ज्यादा गहरा गई और उसके मुकाबले में डर थोड़ा कम, ये सोचकर कि अज़ीब सी ही सही पर सिक्योरिटी तो है। ये कैसे भगाता होगा ये सब देखने की लालसा मन में बुरी तरह जाग गयी। तो हम लोगों ने फैसला किया कि हम कॉटेज़ में नहीं टेन्ट में ही सोयेंगे।

हमने उससे पूछा कि-"हम टेन्ट में रहकर ये एडवेन्चर देखना चाहते हैं, क्या तुम हमारे टेन्ट के पास रहोगे?" उसने कहा- "हाँ मैं रात भर जागता हूँ पहरा देने के लिये और यहीं आपके टेन्ट के पीछे ही बैठता हूँ। यहीं मेरी बैठने की जगह है।" हमने कहा - "ठीक है तो हम टेन्ट में रहकर ही देखेंगे।" वो बोला-"ठीक है पर एक बात का ध्यान रखना कि जब भी कोई जानवर इधर आये तो आप लोग आवाज़ मत करना और न टॉर्च ही जलाना।" हमारी टॉर्च की ओर देखकर बोला। "और हाँ बिना किसी आहट के बस चुपचाप लेटे रहना।" हमने पूछा- "लेटे रहेंगे तो देखेंगे कैसे?" वो बोला-"देखने से आहट हुई तो समस्या हो जायेगी।" हमने कहा-"ठीक है जैसा तुम कहो।"

हमने उसको कुछ शीलिंग दिये और अपने टेन्ट में चले गये। टेन्ट को ठीक से बन्द किया यहाँ तक कि खिडकियाँ तक भी बन्द कर डाली लगा कोई शेर आदि आ गया तो हमें निवाला बनाये बिना नहीं छोड़ेगा। अब गर्मी के मारे बुरा हाल होने लगा। कहाँ तो हम सभी गर्म कपड़े आदि लेकर गये थे क्योंकि सबने बोला था कि वहाँ बहुत सर्दी होती है किन्तु यहाँ तो झुलस रहे थे। क्योंकि बारिश नहीं हुई थी। बारिश होती तो सर्दी होती। खैर अब हमारी बातों का सिलसिला चला कि कैसी होगी हमारी ये रोमांचक रात जानवरों के बीच में। सामने के कॉटेज़ में कुछ इडिंयन रुके थे, वो बाहर कुर्सी ड़ालकर अपने नन्हें बच्चे को साथ लेकर बाहर ही बैठ गये जो कि उचित नहीं था।

यही नहीं सामने वाल कॉटेज़ में बाहर एक अंग्रेज़ महिला कुर्सी पर बैठी नॉवेल पढ़ने में व्यस्त थी। हम अन्दर बैठे इन लोगों को देख रहे थे और हिम्मत जुटा रहे थे कि जब वो लोग बाहर बैठे हैं तो हम तो अन्दर ही हैं कम से कम खिड़कियाँ तो खोल सकते हैं, हमने सारी खिड़कियाँ खोल दीं तब जाकर जान में जान आई। अब दौर शुरु हुआ कहानी किस्सों का, कुछ झूठे कुछ सच्चों का, जिनमें से एक सच्चा किस्सा जो उन अंग्रेज़ महिला को देखकर याद आया वो इस प्रकार था-

कुछ साल पहले एक अंग्रेज़ दम्पत्ति यहाँ आये थे। डिनर के बाद अंग्रेज़ दम्पत्ति कॉटेज़ में पहुँचे तो महिला तो थकान के कारण कॉटेज़ में आराम करने लगी किन्तु पति महाशय को नींद नहीं आ रही थी तो बाहर ही कुर्सी डालकर नॉवेल पढ़ने बैठ गये। थोड़ी देर तक तो वो दरवाज़े के पास ही बैठे रहे पर कुछ समय बाद न जाने क्या सूझी कि अपनी कुर्सी उठाकर वो कॉटेज़ से कुछ दूर खुले में बैठ कर नॉवेल पढ़ने लगे, अभी कुछ समय ही बीता था कि वहाँ पर न जाने कहाँ से एक लेपर्ड आया और उस व्यक्ति के ऊपर कूदा और उसको गर्दन से पकड़कर ले गया। सिक्योरिटी गार्ड उसके पीछे दौड़े पर कुछ हासिल न हुआ। लेपर्ड तेज़ी से भागकर कहीं झाड़ियों में गुम हो गया।

mar-4-2बाद तक भी उस व्यक्ति की लाश तक नहीं मिली। इसीलिये अब ठीक बारह बज़े सभी लाईट बन्द कर दी जाती हैं क्योंकि बारह बज़े के बाद खतरा बढ़ जाता है। यहाँ जिस स्वीमिंग पूल में सब लोग दिन में आनन्द ले रहे थे उसी स्वीमिंग पूल में जानवर पानी जो पीने आते हैं। जंगल है तो यहाँ तो उनका ही राज़ होगा ना, जब चाहे आयें जब चाहे जायें। हम इस वृतान्त को कह सुन रहे थे कि न जाने कब बारह बज़ गये और सभी लाईटें बन्द कर दी गयीं, घुप्प अँधेरा छा गया। हमने इधर-उधर नज़र दौड़ाई टार्च से देखा तो वहाँ कोई नहीं था न वो इंडियन परिवार और न वह अंग्रेज़ महिला ही न जाने वो कब के जा चुके थे, हमें अपने किस्सों में खोये रहने से पता ही नहीं चला। अब हमने टॉर्च बन्द किया और चुपचाप लेट जाने में ही भलाई समझी क्योंकि अब हम बाहर नहीं निकल सकते थे, न जाने अँधेरे में कौन सा जानवर हमारी घात लगाये बैठा हो।

अब ये सब बातें सुनकर बच्चे बुरी तरह डरने लगे, हमने बड़ी मुश्किल से उनको समझाया बुझाया और अपने सीने से लगाकर सुलाया, क्योंकि बच्चों के कारण हम भी डरे हुये थे और पछता रहे थे कि हम कॉटेज़ में क्यों न रहे, किन्तु अब क्या हो सकता था। अब तो रात आँखों में ही काटनी थी सो हम धीरे-धीरे बहुत मध्यम स्वर में बात करने लगे, सब तरफ सन्नाटा छाया हुआ था जो बहुत भयावह लग रहा था और सच बात तो ये कि हम भी बुरी तरह डर रहे थे, पर हम एडवेन्चर रात जो देखना चाहते थे तो हमें अब डरना नहीं चाहिये था, पर ऐसा नहीं हुआ एक तो घुप्प अँधेरा उस पर सन्नाटा और उस सन्नाटे में झींगुरों, मच्छरों की अज़ीब-अज़ीब सी आवाज़ें रात को भयावह बना रही थी। तभी भूपेन्द्र जी तो सपनों की दुनिया में खो गये, भले ही उन सपनों में वो शेर और लेपर्ड के साथ थे।

जागने वालों में-मैं, प्रगीत जी और हामिद जी ही बचे थे। तीनों बातें करके रात बीतने का इन्तजार करने लगे, कुछ देर बाद हामिद जी भी नींद से विजय न पा सके। अब मैं और मेरे पति महाशय अपने बच्चों को खुद से चिपकाये बस घड़ी में समय ही देखते रहे अब तो बात करने की ताकत भी नहीं बची थी। कहाँ तो दिनभर के थके कहाँ यह "एडवेन्चरस रात"।

समय देखा तो रात के २ बज़ चुके थे। तभी सामने से भयावह आवाज़ें आने लगीं। आवाज़ें इतनी डरावनी थी कि शरीर से पसीना छूटने लगा। ये आवाज़ें जंगली सूअरों और लेपर्ड की थीं। अब आवाज़ें धीरे-धीरे पास आने लगीं तो उनकी तीव्रता और बढ़ने लगी तभी भूपेन्द्र जी और हामिद जी भी चौंककर उठ गये। हम बुरी तरह डर भी रहे थे और उनको पास से देखना भी चाहते थे तो सब उठकर खिड़कियों के पास आ गये। वो हमारे टेन्ट की तरफ बढ़ रहे थे अब हमारी साँसे रुकने लगीं क्योंकि वो हमारी तरफ जो आ रहे थे और हम पर चाँद की रोशनी तो पड़ ही रही थी तो हमने तुरन्त अपना-२ स्थान बदला और चुपचाप लेट कर भगवान से आज़ की रात जान बख्शने की दुआ माँगने लगे।

अब तो आवाज़ें बिल्कुल ही पास आ गयीं थीं बिल्कुल हमारे टेन्ट के पास, यहाँ तक कि उनके कदमों की आहटें भी, अब तो कोई हमें नहीं बचा सकता यही सोचकर हम सिक्योरिटी गार्ड को भी कोसने लगे कि कितनी बड़ी-२ बातें कर रहा था मैं यहीं रहूँगा टेन्ट के पीछे ही, ये करूँगा वो करूँगा। लगता है वह तो पैसा लेकर गायब हो गया और किसी कॉटेज़ में पड़ा सो रहा होगा। हम सब यही सोच रहे थे कि आज तो हम इन भूखे जानवरों की भूख शान्त करने को ही यहाँ आये हैं। बच्चे बेखबर सो रहे थे। जब हम टेन्ट में जा रहे थे तो उस गार्ड ने बोला था कि हम सब अपने जूते अन्दर रख लें वरना जानवर सूँघ कर टेन्ट पर हमला करेगा, अच्छा हुआ हमने उसकी बात मान ली पर अब हमला करने में देर ही कहाँ थी वो बस अब टेन्ट को हिलाने वाले हैं अब गिराने वाले हैं और सोचते-२ टेन्ट को एक तीव्र छटका लगा बस अब तो सब खत्म, लगा मेरा तो हार्ट फेल हो गया, साँसे उखड़ने लगीं, सारा रोमांच धरा का धरा रह गया, बस मन में एक ही बात कि मुझे चाहे ले जाये पर मेरे बच्चों को और किसी को कुछ न हो, अब तो बॉबी फिल्म का वो गाना भी याद नहीं आ रहा था -" हम तुम एक टेन्ट में बन्द हों और लेपर्ड आ जाये, लेपर्ड से मैं कहूँ मुझे ले जाये सबको छोड़ जाये, हम तुम…. लेकिन ये क्या अचानक भगवान कहाँ से आ गये अपने सोने चाँदी के रथ पर सवार होकर, उनकी सोने चाँदी की चमक से बाहर भगदड़ मच गयी, आवाज़ें भी दूर जाने लगीं, धूल उड़ाते जानवर भागने लगे झाड़ियों की तरफ, हम उस रथ को देखने के लिये बैठ गये, तो सामने अपना रथ लिये भगवान हमारे टेन्ट के सामने खड़े थे, मन हुआ कि चलकर उनके पैरों में गिर जायें पर हिम्मत नहीं हुई, बस उनको दूर खड़े निहारते रहे, आँखों में आँसू भरकर, दया के आँसू , अगर आज़ हमारे भगवान न आते तो हम तो बस ऊपर ही होते। हमने मन ही मन अपने भगवान का शुक्रिया अदा किया कि हमने बेकार में ही उन पर शक किया। जी हाँ हमारे गार्ड महाशय ही तो हमारे भगवान बनकर हमें बचाने आये थे। वो कहते हैं न कि भगवान किसी न किसी रूप में आपके पास ही रहते हैं, अब इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया था।

अब रात के ३ बज़ चुके थे, ये घण्टे जिंदगी और मौत के बीच कैसे बीते, अब खतरा टला देखकर आँखे बोझिल होने लगीं और सोने की तीव्र इच्छा भी और हम सब न जाने कब सो गये। ठीक पाँच बज़े आँख खुली क्योंकि अलार्म चीख-चीखकर हमें जगा रहा था। हम डरते-डरते उठे और अपनी टॉर्च गार्ड की तरफ डाली वह हमारा इशारा समझकर हमारी तरफ आ गया और वो हमें हमारे कॉटेज़ तक ले गया। अभी तक लाईटें भी ऑन नहीं की गयीं थीं, अभी अँधेरा भी नहीं छटा था। हम अपने कॉटेज़ में गये राहत की साँस ली और स्नान करके तैयार हो गये अगली यात्रा के लिये।

ठीक ६ बज़े हमारा ड्राईवर आ गया, हम गाड़ी में बैठकर और रेंजर को भी साथ लेकर, जिसको हमने रात में ही बुक कर दिया था, निकल पड़े अगले एडवेन्चर यानि "पारा नेशनल पार्क"के लिये।



अब अगले और अन्तिम अंक में पढ़ियेगा कि "पारा नेशनल पार्क" की यात्रा कैसी रही क्या वहाँ किसी जंगली जानवर ने हम पर हमला किया कि बख्श दिया……?





 

 

टिप्पणियाँ (8)add
डरावनी
द्वारा प्रेषित समीर लाल , जुलाई 05, 2007
बड़ी ही डरावनी रात बीती-चलिये अंत भला तो सब भला. बड़ा एडवन्चर्स आलेख रहा. अब अगली कड़ी का इन्तजार है.
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bahut khub
द्वारा प्रेषित Dr.Sanjay , जुलाई 06, 2007
Dr. Bhawna ji kafi samaya bad lekh ka 4th ank padhne ko mila.jo bahut hi dil hila dene vala raha aisi yatrayen to vastv men bhulaye nahi bhul sakti.bahut ache lekh ke liye bahut bahut badhai.agli kadi ka intjar rahega jaldi bhejiyega is bar itna intjar mat kariyega.thanks
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badhiya lekh
द्वारा प्रेषित L Kumar , जुलाई 06, 2007
Aapne achchha lekh likha hai Bhawna ji. Yatra ke romanch ka anubhav ise padh kar kiya jaa sakta hai. lekh ke liye aapko badhaai. yadi badlaav sambhav ho to Leopard ki jagah hindi shabd Cheeta likha jaae to zyada achchha rahegaa. Shubhkaamnaao sahit.
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best
द्वारा प्रेषित sapna dhwaz , जुलाई 06, 2007
bhawna ji apka lekh to bahut jabardast hai, jungle mein cheetah to dikhne ko hot par real life mein to aap cheetey hein,jo ki cottage hone ke baad bhi tent mein rahne ka man banaya, aap cheetey hain sach mein
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Lekh ka liya badhai
द्वारा प्रेषित Smt. Sneha Aggrawal , जुलाई 06, 2007
Priya Bhawna, Is bar ka lekh to sabsa jyada romanchak raha. Tumha iska liya bahut bahut badhai.
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Thanks
द्वारा प्रेषित Nirmala Pandya , जुलाई 07, 2007
Bhawna ye ank bahut acha raha.aapne hamari mail ki prarthna ko suna bhale hi der se khusi hui uske liye thanks.aapko badhai is ank ki saflta ke liye.agle ank ki besabri se prateeksha rahegi.
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Super
द्वारा प्रेषित Nazrana , जुलाई 07, 2007
Your article is very very very very very very very very nice
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good / bad
द्वारा प्रेषित nischal , जुलाई 08, 2007
Bhabi ji

aap ka lekh bahut hi accha aur dravana tha. pur mujhe ek bat nahi acchi lagi vo .. gana jo apne socha.
kyoki aap ko le ja kar lepard ko kya milta pur mere dost ka to sub kuch kho jata phir kyo aisa sochti hai
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