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मरचीजन फॉल्स नेशनल पार्क की यात्रा - 2 |
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भ्रमण
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शनिवार , , 12 मई |
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भावना कुँअर
भावना कुँअर उत्कृष्ट कवियत्री तथा हिन्दी चिट्ठाकार हैं
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पिछले अंक में आपने बैग के बारे में तो पढा ही था और आप सब जानने को उत्सुक भी होंगे कि क्या वह बैग सही सलामत रह पाया जी हाँ बिल्कुल सही सलामत रहा, क्योंकि सब खाना भूल जाते, पानी पीना भूल जाते, किन्तु बैग को तो इतना याद रखा गया कि जवाब देते-देते मेरी तो जबान ही थक गयी। तो चलिये अब आगे देखिये क्या-क्या हुआ !!
अब हम लोग आगे बढ़े जा रहे थे। रास्ते में एक अलग तरह का वृक्ष देखा जिसे ‘Sausage Tree’ के नाम से जाना जाता है। हम १० बजकर ४० मिनट पर 'मरचीज़न फॉल' के 'टॉप ऑफ द हिल' पर पहुँचे।
यहाँ का नज़ारा देखते ही बनता है। यहाँ पर पानी का इतना जबरदस्त फॉल है कि अगर व्यक्ति गिर जाये तो इक सेकेन्ड भी न लगे उसकी जान जाने में। पानी का तेज़ बहाव और बड़े-बड़े पत्थर जिन पर पैर रखने पर पैर फिसलने लगते ये सब बड़ा खतरनाक मँज़र लगा।
कुछ चीज़े बहुत खूबसूरत भी थीं जो मुझे बहुत पसन्द आई जैसे- जिस जगह पर पानी बहुत जोरों से उछल रहा था वहाँपर एक बहुत ही खूबसरत इन्द्रधनुष बन रहा था, जिसकी सुन्दरता देखते ही बनती थी।
वहीं पानी के इतने तेज़ बहाव में लग रहा था कि एक चिड़िया बैठी है जो आश्चर्य जनक था, किन्तु वास्तव में वह चिड़िया न होकर एक छोटा सा सूखा हुआ पेड़ था जो चिड़िया जैसा दिखता था। यहाँ के नज़ारों और खतरों को कैमरों में कैद करके हम लोग वहाँ से निकल पड़े "सांबिया रिवर लॉज़" की तरफ।
"सांबिया रिवर लॉज़" पहुँचने पर सभी बुरी तरह थक चुके थे। गर्मी अपने पूरे चढाव की तरफ थी और दूसरी तरफ भूख से भी बुरा हाल था। यहाँ अकर हमने कुछ लोकल लोगों को बुलाया और उनको टेन्ट लगाने के लिये कहा। जब वो लोग टेन्ट लगाने लगे हम लोग स्नान के लिये चले गये। स्नान के बाद हम लोग लंच के लिये रेस्टोरेंट पहुँचे। रेस्टोरेंट बहुत ही खूबसूरती से सज़ाया हुआ था। अन्दर जाकर हम भूल ही गये कि हम जंगल में हैं।
यह लॉज 'मरचीज़न फॉल्स नेशनल पार्क के बीच स्थित है। इसमें Bnadas And cottages भी हैं। हीटर, शावर, एमरजेंसी लाईट और अन्य सुविधायें भी हैं। "सांबिया रिवर लॉज़" के ऑनर एक एशियन मूल के कीनियन व्यक्ति श्री 'परवेज़ मलिक' का है जो १९९५ में स्थापित किया गया था। परवेज़ मलिक की पत्नी अमेरीकन मूल की महिला हैं जो कि ३० साल से कीनिया में स्थान्तरित हैं। वह महीने में तीन-चार बार यहाँ आती हैं और यहाँ की व्यवस्था बखूबी सभाँलती हैं। यह एक खूबसूरत पाँच सितारा लॉज़ है। यह लॉज लकड़ी से बना है। बायें हाथ पर प्रारम्भ में रिस्पेशन है। दायें हाथ पर बैठने की व्यवस्था है। आगे चलकर एल गैलरी है, जिसके साईड़ में लकड़ी से ही मकड़ी की आकृति बनाई गयी है।
आगे चलकर गैलरी में ही दो छोटे-२ कमरे हैं, जिनको खूबसूरती से अफ्रीकन पेंटिग और स्टैचू आदि से सज़ाया गया है। आगे जाकर बड़ा सा हॉल है, जिसमें कुर्सी और मेज़ की व्यवस्था है, जिन पर खाने-पीने की व्यवस्था की जाती है। जब आप एक बार अपने खाने की बुकिंग करा देते हैं तभी से आपकी एक मेज़ फिक्स कर दी जाती है।
सभी मेज़ों पर कॉटेज़ नम्बर, टेन्ट का नाम आदि लिख दिया जाता है।आगे चलकर एक तरफ बड़ा रसोईघर है और दूसरी तरफ एक बार है। चार सीढियाँ उतरने के बाद आधुनिक सोफों से सज़ाया गया है। छोटा सा दरवाज़ा पार करके कुछ लॉन जैसा बनाने का प्रयास किया गया है, वहाँ पर भी खाने-पीने के लिये कुर्सी मेज़ की व्यवस्था की गयी है। आप बाहर बैठकर भी खाने का आनन्द ले सकते हैं। हम लोग ड्राईवर सहित ७ लोग थे हमारी मेज़ प्रारम्भ में ही गेट के पास लगाई गई थी। हम लोग उन महिला से परिचय लेने के बाद अपनी मेज़ पर जा बैठे जो हमने यहाँ आते ही बुक करा दी थी।
लंच का मेन्यू बड़े से बोर्ड पर लगा था। हम लोग जूस, पानी, स्नैक्स बहुत बड़ी मात्रा में अपने साथ ले गये थे कि हमारी पसन्द का खाना जंगल में तो नहीं मिलेगा। जब मैन्यू पढ़ा तो आश्चर्य हुआ कि भारतीय खाना कैसे मिल सकता है, पर जब लिखा है तो मिलेगा तो जरूर, किन्तु स्वाद से परे ही होगा, यही सोचकर मरे मन से इन्तज़ार करने लगे। खाना लग चुका था। बुझे मन से पहला चम्मच खाया तो सब एकदूसरे की तरफ देखने लगे। खाना इतना स्वादिष्ट था कि हमें लगा हम दिल्ली में ही किसी रेस्टोरेंट में खाना खा रहे हों। चावल, आलू मटर की सब्ज़ी, मिक्स सब्ज़ी, रायता, सलाद आदि और भी जंगल में हमारे आश्चर्य का ठिकाना न था। थोड़ी देर बाद ही ताज़ा कटे फल- आम, तरबूज़, केले आदि। बच्चों के लिये खाना पैक कराया क्योंकि अब हमें गाड़ी लेकर 'बोटिंग' के जाना था, जहाँ अगर पहुँचने में देर हो जाये तो बोट छूट जाती है और फिर ५ घण्टे बाद ही बोट उपलब्ध होती है वहाँ दिन में दो बार ही बोट जाती है।
हम लोग १ बज़कर १५ मिनट पर लॉज से निकले और १ बज़कर ४५ मिनट पर 'नाईल रिवर' पर बोटिंग के लिये पहुँचे। यहाँ पर डॉलर में टिकिट खरीदना होता है। हम सबने टिकिट लिया और अन्दर जाकर अपनी-अपनी सीट पर कैमरा सभाँल कर बैठ गये।
बोट में बैठने के बाद हमें किन-किन खतरों से गुज़रना पड़ा, जानने के लिये मिलते है अगले अंक में !!
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