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भावना कुँअर
भावना कुँअर उत्कृष्ट कवियत्री तथा हिन्दी चिट्ठाकार हैं
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पिछले अंक में आपने पढ़ा था कि हम लोग बोटिंग के लिये पहुँचे और अब पढ़िये क्या थे वो खतरे जिसमें कोई भी ज़रा सी लापरवाही से अपनी जान गवाँ सकता है-
५ मिनट बाद ही बोट चल पड़ी और हमारे इस सफ़र की शुरुआत हुई। ये सफ़र भी बहुत रोमांचकारी लगा। हम लोग बोट की छत पर चले गये जहाँ से नज़ारा ज्यादा खूबसूरत लग रहा था। दूर किनारों पर 'हिरण' परिवार अपनी दुनिया में व्यस्त थे तो वहीं 'हिपोपोटोमस' पानी में गोते लगाते तो कभी बाहर निकल आते। यहाँ बड़े-बड़े क्रोकोडाईल भी थे।
‘युगांडा' के 'नाईल क्रोकोडाईल' दुनिया में सबसे बड़े क्रोकोडाईल होते हैं, जो १०० वर्षों तक जीवित रह सकते हैं। यहाँ पर 'नाईल पर्च' नामक मछली भी पाई जाती है। इसका वज़न २०० किलो और इसकी लम्बाई २ मीटर तक हो सकती है। लोग इसको खाने में बहुत उत्सुक होते हैं, क्योंकि इनका मांस सफेद रंग का और कम काँटों वाला होता है। 'नाईल पर्च' मछली यहाँ सबसे पहले १९५० में देखी गई। यहाँ पर भी एक दुखद घटना जुड़ी है। सालों पहले यहाँ हमारी ही तरह कुछ एशियन टूर पर आये थे। उनमें एक गुज़राती परिवार अपने बच्चों के साथ इस यात्रा का आनन्द लेने यहाँ आया। यहाँ आने पर पहले ही हिदायत दे दी जाती है कि कोई भी पानी के अन्दर हाथ न डालें क्योंकि यहाँ बड़ी मात्रा में खतरनाक मगरमच्छ हैं, पर शरारती तत्व हिदायतों को दरकिनार कर देते हैं|
तो हुआ यूँ कि जब बोट बड़े मगरमच्छ के पास दर्शकों को दिखाने के लिये ले जायी जा रही थी तो गुज़राती परिवार की एक बच्ची ने अपना हाथ पानी के अन्दर डाल दिया मगरमच्छ दूर किनारे पर लेटे दिखाई दे रहे थे, पर न जाने बोट के नीचे से कहाँ से एक मगरमच्छ आया, जो बहुत बड़ा नहीं था, उसने बच्ची का हाथ पकड़ लिया। बच्ची के माता-पिता ने बच्ची को अपनी ओर खींचना चाहा और मगरमच्छ बच्ची को अपनी ओर खींच रहा था। बोट बुरी तरह हिलने लगी और सभी यात्री चीखने-चिल्लाने लगे।
कोई भी उस बच्ची को छोड़ने को तैयार न था, किन्तु मगरमच्छ भी उसको नहीं छोड़ रहा था तभी ड्राईवर ने कहा- "हमारी बोट पलटने वाली है और हम सब इन मगरमच्छों का शिकार बनने वाले हैं, ये मगरमच्छ अब इस बच्ची को नहीं छोड़ने वाला, अगर किसी पर चाकू है तो बच्ची का हाथ काटकर उसको बचाया जा सकता है" किन्तु किसी के पास कोई भी हथियार नहीं था तब सबकी जान की चिन्ता करते हुये बच्ची के माता-पिता को बच्ची को छोड़ना पड़ा, जिसको एक ही छटके में मगरमच्छ खींचकर ले गया।
यह दुखद घटना हर व्यक्ति की जबान पर होती है जो कोई भी इस टूर पर आता है। उसके माँ-बाप के मन की पीड़ा को हम अच्छी तरह समझ सकते हैं, जिन पर यह बीती और उनके ज़िगर के टुकड़े को मगरमच्छ ने अपना ग्रास बना लिया। जब हम बड़े मगरमच्छ को देखने के लिये बोट को उनके पास लेकर गये तो सब सतर्क हो गये और जिस किनारे पर मगरमच्छ होते सभी बोट के उस तरफ ही पहुँच जाते उनको देखने के लिये, जिससे बोट का झुकाव उधर ही हो जाता।
नीचे से ड्राइवर सबको कहता- "हम सब बोट सहित पानी में जाने वाले हैं अगर आप बचना चाहते हैं तो कुछ लोग दूसरी तरफ आ जायें।" उन सब में मैं सबसे पहले दूसरी तरफ जाती फोटो या फिल्म बनाने का विचार त्याग कर। मैं सोचती कि तरकश वालों को तो पता भी नहीं है कि मैं उनके लिये कोई रोमांचक लेख लाने वाली हूँ, अगर मगरमच्छ का ग्रास बन गयी तो पता नहीं उन तक खबर जायेगी भी या नहीं, तो बेहतर है कि लेख लिखना है तो दूसरी तरफ ही खड़ा हुआ जाये।
हम लोग ३ घण्टे तक बोटिंग करते रहे और तरह-तरह के खतरनाक मगरमच्छ, हिपोपोटोमस, जंगली अफ्रीकन सूअर, भैंसे आदि की प्रतिक्रियाएँ देखते रहे। एक स्थान पर बहुत बड़ा 'वॉटर फॉल' देखा जो 'डाऊन ऑफ द मरचीज़न फॉल' के नाम से जाना जाता है। उसकी खूबसूरती देखते ही बनती थी। वहाँ नीचे पानी में इस तरह से झाग बने थे मानो सारे पानी में नमक फैला दिया हो। बोटिंग के बाद हम लोग वापस लॉज आ गये। जब हम वहाँ पहुँचे तो हमारा टेन्ट तैयार हो चुका था। हम लोग अपने कॉटेज़ में गये शावर लिया और मुझे छोड़कर सब स्विमिंग पूल में उतर गये।
चिलचिलाती गर्मी में पूल में जाकर राहत मिली। मैं हमेशा की तरह अपना कैमरा सँभाले रही। थक कर टूट चुकी थी तो पास ही पड़ी कुर्सी पर लेट गयी। अभी ५ मिनट ही हुये थे कि एक जहरीले मच्छर महाशय ने मुझे काटकर मेरा कुर्सी पर स्वागत किया। ये तो अच्छा था कि मेरे ‘Firstaid box’ में उन महाशय से लड़ने की दवाईयाँ मौज़ूद थीं। तभी तो मैंने उस लड़ाई में उन महाशय को हरा दिया, वो अपना ज़हर फैलाने में नाकामयाब रहा। सब लोग घण्टों पूल में स्वीम करते रहे, किन्तु मेरी थकान बढ़ती गयी और अब तो दिन भी ढ़लने लगा था।
मैंने शावर लेना उचित समझा। थके कदमों से शावर तक पहुँची और तैयार होकर डिनर के लिये डाईनिंग रूम में पहुँची। आज़ के डिनर में बूफे सिस्टम था जिसमें Barbeque स्वादपूर्ण था। जो इडिंयन, अफ्रीकन, कॉन्टीनेन्टल का मिला-जुला रूप था। इडिंयन खाने में एक खास बात लगी, जब Desert का turn आया तो ‘फ्रूट चाट’ के साथ-साथ जब सूजी का हलवा, जो बादाम, पिस्ते और काज़ू से सजाया गया था, देखकर हम आश्चर्य चकित रह गये। यहाँ सभी अफ्रीकन ही खाना बनाते हैं और देखरेख उन्हीं अमेरिकन मूल की महिला की रहती है, तब भी इतना स्वादिष्ट कि बयान नही कर सकते।
यही तो एक बात है जो आकर्षित करती है कि भिन्न-२ देश के व्यक्ति एक साथ होते हैं और अपनी-२ सभ्यता, संस्कृति को एक स्थान पर उपलब्ध कराते हैं और साथ-२ दूसरे देशों की सभ्यता व संस्कृति को ध्यान में रखकर खान-पान, रहन-सहन की व्यवस्था करते हैं।
डिनर के बाद हम लोग कॉटेज़ में पहुँचे और रात कॉटेज़ में बीती या फिर टेन्ट मे ? रात साधारण थी या कि कुछ भयानक? जानने के लिये कीजिये अगले अंक का इन्तज़ार…..
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Badhai