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भावना कुँअर
भावना कुँअर उत्कृष्ट कवियत्री तथा हिन्दी चिट्ठाकार हैं
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अफ्रीकन सफारी दुनिया भर में प्रसिद्ध है। काफी समय से हम लोग परिवार सहित पूर्वी अफ्रीका के प्राकृतिक खूबसूरती से समृद्ध ‘युगांडा’ नामक देश की राजधानी ‘कम्पाला’ में रह रहे हैं। इसे 'सीटि ऑफ सेवन हिल्स' भी कहते हैं। मगर सफारी जाने का अवसर एक लम्बे अरसे बाद ही मिल सका। क्योंकि कभी छुट्टी नहीं मिलती तो कभी छुट्टी मिलती है तो वहाँ के होटल और कॉटेज फुल होते हैं। यूँ तो तन्जानिया और कीनिया सफारी भी बहुत प्रसिद्ध है किन्तु 'मरचीज़न फॉल नेशनल पार्क' ‘युगांडा’ की सबसे प्रसिद्ध सफारी है।
पर आखिरकार ७ अप्रैल २००७ को वह दिन आ ही गया जब हम लोगों को अफ्रीकन सफारी जाने का अवसर मिला। मैं और मेरे जीवन साथी- प्रगीत कुँअर, मेरी दोनों बेटियाँ- कनुप्रिया और ऐश्वर्या, प्रगीत जी के मित्र- हामिद जी और भूपेन्द्र जी ५ बजकर ५० मिनट पर कम्पाला से सफारी वैन में निकल पड़े। क्योंकि वहाँ अपनी गाड़ियों से जाना खतरे से खेलना होता है।
सफर शुरु हुआ तो मेरी छोटी बेटी, जो मात्र ६ साल की है, उसने अपनी प्यारी-प्यारी बातों से सबका मन मोह लिया। उसका पहला सवाल मुझसे था-
"मम्मा हम रात में ही जा रहे हैं ना?"
"नहीं ये तो सुबह हो गयी है। अब सुबह के ६ बजे हैं।"
"तो इतना अँधेरा क्यों है? और न ही आसमान में कोई कलर भी दिखाई दे रहा।"
मैंने कहा- "थोड़ी देर में कलर भी आ जायेंगे….
मेरी बात अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि वह खुद ही बोल पड़ी -
"अच्छा अभी हमारी तरफ कलर इसलिये नहीं हैं क्योंकि फेयरी इधर नहीं आई है, क्योंकि वो तो दो ही होती हैं न। वो दूसरी तरफ कलर कर रही होंगी। जब वो उधर के आसमान में कलर कर लेगीं तब हमारी साईड आकर हमारी साईड वाले आसमान में आकर कलर करेंगी। तब हमें ऑरेंज और ब्ल्यू कलर दिखाई देखा देगा और वो साथ में सन भी लेकर आयेंगी। है ना मम्मा?"
हम उसकी इन काल्पनिक बातों को सुनकर अपने बचपन में खो गये। जब हमारी दादी माँ और नानी माँ हमें फेयरी के किस्से और कहानियाँ सुनाया करतीं थी और हमेशा हमारे सपनों में फेयरी आया करती थी अपनी छड़ी लेकर। कभी वो हमें अपने साथ सुन्दर बाग-बगीचे में सैर के लिए ले जाती। जहाँ पर सारे पेड़ टॉफी और चॉकलेट से लदे होते थे, कभी हमें बादलों के पार ले जाती जहाँ की दुनियाँ तो बिल्कुल ही निराली लगती जैसे- बौनों की दुनियाँ, दूध की बहती नदियाँ, और चाँद सितारों से सजे छोटे-छोटे घर, सोने चाँदी से खेलते छोटे बच्चे और उन्हीं बच्चों में जाकर हमारी फेयरी हमको छोड़ देती और जब हम खेलते-२ थक जाते तो हम चाँद सितारों से सजे घरों में सो जाते तब फेयरी हमें लेकर वापस हमारी दुनियाँ हमारे बैड पर हमें छोड़ जाती। जब हम सुबह उठते तो खुद को फेयरी के साथ न पाकर बहुत दुखी होते पर रात भर फेयरी की दुनियाँ में बिताई रात नहीं भूल पाते और इसी तरह हर रात का बेसब्री से इन्तजार करते।
हम अपनी सोच से बाहर आये तो आसमान ने ऑरेंज कलर से खुद का श्रृंगार किया और उसके कुछ क्षण बाद ही सूरज भी अपने रथ पर सवार होकर हमसे मुखातिब होने लगा। जिसकी सुन्दरता देखते ही बनती थी। अभी सुबह के ७ बजे थे।कम्पाला से 'मरचीज़न फॉल' ४०० किलोमीटर दूर है। इस दूरी को लगभग ५ घण्टे में तय किया जा सकता है। ५ घण्टे की दूरी तय करके हमें पहले 'मरचीजन फॉल' जाना था। रास्ते में एक शहर आया जिसका नाम 'मसीन्डी' था। यहाँ हम ठीक ९ बजे पहुँच गये। युगांडा की एक बड़ी 'शुगर मिल' 'मसीन्डी' में है, जिससे यह शहर दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। यहाँ हमने एक छोटा सा ब्रेक लिया क्योंकि गाड़ी में डीजल के साथ-साथ हमें भी खुद को आगे चलाने के लिये कुछ जूस और कुछ खाने की आवश्यकता महसूस हुई, तब हमने भी कुछ खा-पीकर अपनी भूख को शान्त किया।
ठीक २० मिनट बाद हम लोग अपने गन्तव्य की ओर बढ़ चले। पूरा रास्ता खूबसूरत गुलमोहर और अमलतास के वृक्षों से सजा था। हम मन्त्र-मुग्ध से आगे बढ़े जा रहे थे। आम के वृक्ष आमों से लदे हुये थे। बड़े-बड़े अनानास, केले, पपीते, कटहल, से लदे पेड़ बरबस ही अपनी ओर खींच रहे थे। जब तक हम पक्की सड़क पर चलते गये खूबसूरत फूलों और फलों का आनन्द लेते रहे, कुछ समय बाद ही कच्चा रास्ता शुरु हो गया, जो बहुत ही रोमांचकारी था। जंगल में बड़े-बड़े सींगों वाली गाय और भैंसे बेखौफ भ्रमण कर रहीं थी क्योंकि भय उनको नहीं हमको उनसे था। रास्ता लाल रंग की मिट्टी से भरा था, तो हमें किसी मेकअप की तो आवश्यकता ही नहीं थी। वैसे 'युगांडा' की मिट्टी की एक खासियत है कि ये बहुत उपजाऊ होती है इसीलिये यहाँ पर दुनिया भर के सभी फल और सब्जियाँ अत्यधिक मात्रा में मिलते हैं और जिनका साईज भी बहुत बड़ा होता है जो हमने भारत में कभी नहीं देखा। एक फल जो 'युगांडा' में पाया जाता है जिसे हम 'पेशन फ्रूट' के नाम से जानते हैं। यहाँ के लोग तो इसको काट कर भी खाते हैं, किन्तु ज्यादातर इस्तेमाल ये जूस में किया जाता है। इस जूस की खास बात ये है कि ये मलेरिया की रोकथाम करता है। क्योंकि मलेरिया के मरीज को यह जूस पिलाया जाता है, जिससे मलेरिया का असर कम हो जाता है और व्यक्ति के शरीर को ताकत मिलती है। यहाँ 'युगांडा' में 'मलेरिया' का प्रकोप कुछ ज्यादा ही है। अब हम लोग जगंल में प्रवेश कर चुके थे। ऐसे जंगल में जहाँ पर खतरनाक जानवर रहते हैं। यहाँ पर एन्ट्री फीस देनी होती है ‘शीलिंग’ में जो यहाँ की करेंसी होती है।
यहाँ पर हम लोग गाड़ी से नीचे उतरे कुछ फोटो आदि लेने के लिये। प्रारम्भ में ही एक 'बन्दर स्टैचू' ने हमारा स्वागत किया। यहाँ एक बड़ी हास्यास्पद, जी हाँ अब तो हास्यास्पद ही कहूँगी मगर उस वक्त तो सबके छक्के छूट गये थे। हुआ यूँ कि जब हम फोटो लेने और वी० डी० ओ० फिल्म बनाने नीचे उतरे तो मैंने अपना बैग, जिसमें सभी के, डिज़िटल कैमरे और सभी कीमती सामान जैसे लगभग ५ हजार डॉलर, ३ मिलीयन शीलिंग, हमारे आई० डी० कार्ड्स, ड्राईविंग लाईसेंस आदि कीमती सामान थे जो वजन के कारण वी० डी० ओ० फिल्म बनाने में असुविधा कर रहा था, मैंने वहीं जमीन पर घास में रख दिया। सब अपनी-अपनी धुन में थे हमने सिर्फ एक वी० डी० ओ० कैमरा और दो डिज़िटल कैमरे ही निकाल रखे थे। फोटो आदि लेने के बाद सब गाड़ी में बैठने लगे, मैं सबसे पीछे रह गयी अपने तरकश के लिये कुछ नयी सामग्री खोजती हुई। मुझे गाड़ी का हॉर्न बजा-बजा कर परेशान कर डाला। मैं दौड़कर गाड़ी पर पहुँची, अब तक मेरे हाथ में डिज़िटल कैमरा और प्रगीत जी के हाथ में वी० डी० ओ० कैमरा आ चुका था, मेरी निगाह पड़ी तो मैंने पूछा- "इसका कवर कहाँ है?" वो बोले- "नहीं मालूम।" बस मेरे तो होशो-हवाश ही उड़ गये, क्योंकि मुझे याद आ चुका था कि मैंने अपना बैग घास में रखा था।
मैं दौड़कर वहाँ गयी ये सोचकर कि वो तो अब गया, पर जैसे ही वहाँ पहुँची उसको यथा स्थान पाकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मन में एक विश्वास ने स्थान बना लिया कि चाहे यहाँ 'युगांडा' में कितनी ही गरीबी है पर अभी भी कहीं ईमानदारी बची है, वहीं पास में कुछ अफ्रीकन व्यक्ति और बच्चे भी खड़े थे, किन्तु उन्होंने उस बैग को छुआ तक नहीं था। मैं गाड़ी की ओर खुशी-खुशी बढ़ रही थी और प्रगीत जी, हामिद जी, भूपेन्द्र जी कनु, ऐश्वर्या, मेरी ओर जिनके चेहरों पर हवाईयाँ उड़ रही थीं, जैसे ही मैंने बैग दिखाया सभी में खुशी की लहर दौड़ गयी। तभी सबने वादा किया कि सब इस बैग का ख्याल रखेंगे, कहीं उतरने से पहले भी और कहीं जाने आने पर भी। अब हम लोग गाड़ी में बैठ गये।
सम्पादकीय टिप्पणी पढने के लिए यहाँ क्लीक करें आगे की यात्रा कैसी रही? क्या वाकई में सबने उस बैग का ख्याल रखा या सबने मान लिया कि दूसरा उसका ख्याल रख रहा होगा? जानने ले लिये इंतजार किजिये अगली किश्त का....
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