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'मरचीज़न फॉल नेशनल पार्क' की यात्रा
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 14
बेकारअति उत्तम 
भ्रमण
बुधवार , , 02 मई

bhavna_kunwar

  भावना कुँअर


 

भावना कुँअर उत्कृष्ट कवियत्री तथा हिन्दी चिट्ठाकार हैं


300by300अफ्रीकन सफारी दुनिया भर में प्रसिद्ध है। काफी समय से हम लोग परिवार सहित पूर्वी अफ्रीका के प्राकृतिक खूबसूरती से समृद्ध ‘युगांडा’ नामक देश की राजधानी ‘कम्पाला’ में रह रहे हैं। इसे 'सीटि ऑफ सेवन हिल्स'  भी कहते हैं। मगर सफारी जाने का अवसर एक लम्बे अरसे बाद ही मिल सका। क्योंकि कभी छुट्टी नहीं मिलती तो कभी छुट्टी मिलती है तो वहाँ के होटल और कॉटेज फुल होते हैं। यूँ तो तन्जानिया और कीनिया सफारी भी बहुत प्रसिद्ध है किन्तु 'मरचीज़न फॉल नेशनल पार्क'  ‘युगांडा’ की सबसे प्रसिद्ध सफारी है।


पर आखिरकार ७ अप्रैल २००७ को वह दिन आ ही गया जब हम लोगों को अफ्रीकन सफारी जाने का अवसर मिला। मैं और मेरे जीवन साथी- प्रगीत कुँअर, मेरी दोनों बेटियाँ- कनुप्रिया और ऐश्वर्या, प्रगीत जी के मित्र- हामिद जी और भूपेन्द्र जी ५ बजकर ५० मिनट पर कम्पाला से सफारी वैन में निकल पड़े। क्योंकि वहाँ अपनी गाड़ियों से जाना खतरे से खेलना होता है।



300by300-2सफर शुरु हुआ तो मेरी छोटी बेटी, जो मात्र ६ साल की है, उसने अपनी  प्यारी-प्यारी बातों से सबका मन मोह लिया। उसका पहला सवाल मुझसे था-
"मम्मा हम रात में ही जा रहे हैं ना?"
"नहीं ये तो सुबह हो गयी है। अब सुबह के ६ बजे हैं।"
"तो इतना अँधेरा क्यों है? और न ही आसमान में कोई कलर भी दिखाई दे रहा।"   


मैंने कहा- "थोड़ी देर में कलर भी आ जायेंगे….
मेरी बात अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि वह खुद ही बोल पड़ी -
"अच्छा अभी हमारी तरफ कलर इसलिये नहीं हैं क्योंकि फेयरी इधर नहीं आई है, क्योंकि वो तो दो ही होती हैं न। वो दूसरी तरफ कलर कर रही होंगी। जब वो उधर के आसमान में कलर कर लेगीं तब हमारी साईड आकर हमारी साईड वाले आसमान में आकर कलर करेंगी। तब हमें ऑरेंज और ब्ल्यू कलर दिखाई देखा देगा और वो साथ में सन भी लेकर आयेंगी। है ना मम्मा?" 


हम उसकी इन काल्पनिक बातों को सुनकर अपने बचपन में खो गये। जब हमारी दादी माँ और नानी माँ हमें फेयरी के किस्से और कहानियाँ सुनाया करतीं थी और हमेशा हमारे सपनों में फेयरी आया करती थी अपनी छड़ी लेकर। कभी वो हमें अपने साथ सुन्दर बाग-बगीचे में सैर के लिए ले जाती। जहाँ पर सारे पेड़ टॉफी और चॉकलेट से लदे होते थे, कभी हमें बादलों के पार ले जाती जहाँ की दुनियाँ तो बिल्कुल ही निराली लगती जैसे- बौनों की दुनियाँ, दूध की बहती नदियाँ, और चाँद सितारों से सजे छोटे-छोटे घर, सोने चाँदी से खेलते छोटे बच्चे और उन्हीं बच्चों में जाकर हमारी फेयरी हमको छोड़ देती और जब हम खेलते-२ थक जाते तो हम चाँद सितारों से सजे घरों में सो जाते तब फेयरी हमें लेकर वापस हमारी दुनियाँ हमारे बैड पर हमें छोड़ जाती। जब हम सुबह उठते तो खुद को फेयरी के साथ न पाकर बहुत दुखी होते पर रात भर फेयरी की दुनियाँ में बिताई रात नहीं भूल पाते और इसी तरह हर रात का बेसब्री से इन्तजार करते। 


300by300-1हम अपनी सोच से बाहर आये तो आसमान ने ऑरेंज कलर से खुद का श्रृंगार किया और उसके कुछ क्षण बाद ही सूरज भी अपने रथ पर सवार होकर हमसे मुखातिब होने लगा। जिसकी सुन्दरता  देखते ही बनती थी। अभी सुबह के ७ बजे थे।कम्पाला से 'मरचीज़न फॉल' ४०० किलोमीटर दूर है। इस दूरी को लगभग ५ घण्टे में तय किया जा सकता है। ५ घण्टे की दूरी तय करके हमें पहले 'मरचीजन फॉल' जाना था। रास्ते में एक शहर आया जिसका नाम 'मसीन्डी' था। यहाँ हम ठीक ९ बजे पहुँच गये। युगांडा की एक बड़ी 'शुगर मिल' 'मसीन्डी' में है, जिससे यह शहर दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। यहाँ हमने एक छोटा सा ब्रेक लिया क्योंकि गाड़ी में डीजल के साथ-साथ हमें भी खुद को आगे चलाने के लिये कुछ जूस और कुछ खाने की आवश्यकता महसूस हुई, तब हमने भी कुछ खा-पीकर अपनी भूख को शान्त किया।


ठीक २० मिनट बाद हम लोग अपने गन्तव्य की ओर बढ़ चले। पूरा रास्ता खूबसूरत गुलमोहर और अमलतास के वृक्षों से सजा था। हम मन्त्र-मुग्ध से आगे बढ़े जा रहे थे। आम के वृक्ष आमों से लदे हुये थे। बड़े-बड़े अनानास, केले, पपीते, कटहल, से लदे पेड़ बरबस ही अपनी ओर खींच रहे थे। जब तक हम पक्की सड़क पर चलते गये खूबसूरत फूलों और फलों का आनन्द लेते रहे, कुछ समय बाद ही कच्चा रास्ता शुरु हो गया, जो बहुत ही रोमांचकारी था। जंगल में बड़े-बड़े सींगों वाली गाय और भैंसे बेखौफ भ्रमण कर रहीं थी क्योंकि भय उनको नहीं हमको उनसे था। रास्ता लाल रंग की मिट्टी से भरा था, तो हमें किसी मेकअप की तो आवश्यकता ही नहीं थी। वैसे 'युगांडा' की मिट्टी की एक खासियत है कि ये बहुत उपजाऊ होती है इसीलिये यहाँ पर दुनिया भर के सभी फल और सब्जियाँ अत्यधिक मात्रा में मिलते हैं और जिनका साईज भी बहुत बड़ा होता है जो हमने भारत में कभी नहीं देखा। एक फल जो 'युगांडा'  में पाया जाता है जिसे हम 'पेशन फ्रूट' के नाम से जानते हैं। यहाँ के लोग तो इसको काट कर भी खाते हैं, किन्तु ज्यादातर इस्तेमाल ये जूस में किया जाता है। इस जूस की खास बात ये है कि ये मलेरिया की रोकथाम करता है। क्योंकि मलेरिया के मरीज को यह जूस पिलाया जाता है, जिससे मलेरिया का असर कम हो जाता है और व्यक्ति के शरीर को ताकत मिलती है। यहाँ 'युगांडा' में 'मलेरिया' का प्रकोप कुछ ज्यादा ही है।
अब हम लोग जगंल में प्रवेश कर चुके थे। ऐसे जंगल में जहाँ पर खतरनाक जानवर रहते हैं। यहाँ पर एन्ट्री फीस देनी होती है ‘शीलिंग’ में जो यहाँ की करेंसी होती है।


300by300-3 यहाँ पर हम लोग गाड़ी से नीचे उतरे कुछ फोटो आदि लेने के लिये। प्रारम्भ में ही एक 'बन्दर स्टैचू' ने हमारा स्वागत किया। यहाँ एक बड़ी हास्यास्पद, जी हाँ अब तो हास्यास्पद ही कहूँगी मगर उस वक्त तो सबके छक्के छूट गये थे। हुआ यूँ कि जब हम फोटो लेने और वी० डी० ओ० फिल्म बनाने नीचे उतरे तो मैंने अपना बैग, जिसमें सभी के, डिज़िटल कैमरे और सभी कीमती सामान जैसे लगभग ५ हजार डॉलर, ३ मिलीयन शीलिंग, हमारे आई० डी० कार्ड्स, ड्राईविंग लाईसेंस आदि कीमती सामान थे जो वजन के कारण वी० डी० ओ० फिल्म बनाने में असुविधा कर रहा था, मैंने वहीं जमीन पर घास में रख दिया। सब अपनी-अपनी धुन में थे हमने सिर्फ एक वी० डी० ओ० कैमरा और दो डिज़िटल कैमरे ही निकाल रखे थे। फोटो आदि लेने के बाद सब गाड़ी में बैठने लगे, मैं सबसे पीछे रह गयी अपने तरकश के लिये कुछ नयी सामग्री खोजती हुई। मुझे गाड़ी का हॉर्न बजा-बजा कर परेशान कर डाला। मैं दौड़कर गाड़ी पर पहुँची, अब तक मेरे हाथ में डिज़िटल कैमरा और प्रगीत जी के हाथ में वी० डी० ओ० कैमरा आ चुका था, मेरी निगाह पड़ी तो मैंने पूछा- "इसका कवर कहाँ है?" वो बोले- "नहीं मालूम।" बस मेरे तो होशो-हवाश ही उड़ गये, क्योंकि मुझे याद आ चुका था कि मैंने अपना बैग घास में रखा था।
 

मैं दौड़कर वहाँ गयी ये सोचकर कि वो तो अब गया, पर जैसे ही वहाँ पहुँची उसको यथा स्थान पाकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मन में एक विश्वास ने स्थान बना लिया कि चाहे यहाँ 'युगांडा' में कितनी ही गरीबी है पर अभी भी कहीं ईमानदारी बची है, वहीं पास में कुछ अफ्रीकन व्यक्ति और बच्चे भी खड़े थे, किन्तु उन्होंने उस बैग को छुआ तक नहीं था। मैं गाड़ी की ओर खुशी-खुशी बढ़ रही थी और प्रगीत जी, हामिद जी, भूपेन्द्र जी कनु, ऐश्वर्या,  मेरी ओर जिनके चेहरों पर हवाईयाँ उड़ रही थीं, जैसे ही मैंने बैग दिखाया सभी में खुशी की लहर दौड़ गयी। तभी सबने वादा किया कि सब इस बैग का ख्याल रखेंगे, कहीं उतरने से पहले भी और कहीं जाने आने पर भी। अब हम लोग गाड़ी में बैठ गये।


 
 
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आगे की यात्रा कैसी रही? क्या वाकई में सबने उस बैग का ख्याल रखा या सबने मान लिया कि दूसरा उसका ख्याल रख रहा होगा? जानने ले लिये इंतजार किजिये अगली किश्त का....

 

टिप्पणियाँ (17)add
बेसब्री से इन्तज़ार !!
द्वारा प्रेषित Dr.Sanjay , मई 03, 2007
अफ्रीका के बारे में पढ़ा और सुना तो बहुत था किन्तु आपके द्वारा अफ्रीकी यात्रा का जीता जागता वर्णन पढ़कर ऐसा लगा जैसे हम भी इस यात्रा पर हैं इस यात्रा के अगले अंक का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।
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यात्रा
द्वारा प्रेषित Dr.jagdish vyom , मई 03, 2007
भावना जी
आपने अफ्रीका के जंगलों की मुफ्त में ही यात्रा करवा दी...... पर अभी यात्रा के किनारे पर ही पहुँच पाए हैं ...... अब आगे चलने के लिए आपके तरकश की कलम गाड़ी की प्रतीक्षा रहेगी।
डॉ॰ व्योम
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नदियों के पास चली जाऊँ और अपने बचपन में खो जाऊँ !!
द्वारा प्रेषित सपना धवज़ , मई 03, 2007
डॉ० भावना जी आपने सफ़ारी को एक नया मोड़ दिया है, क्योंकि हमारे भारत में लोग सफ़ारी कम ही पसन्द करते हैं और कितनों को तो सफ़ारी का पता भी नहीं होता है, किन्तु आपने जिस तरह से इसको प्रस्तुत किया है उससे लगता है कि जीवन में एक बार तो जरूर ही हर इंसान को इसको आनन्द लेना चाहिये। आज की व्यस्तता भरी जिंदगी में समय ही नहीं है लोगों के पास कि वो प्रकृति का आनन्द लें सके। इसको पढ़कर ऊपर वाले के द्वारा बनाई गई प्रकृति कितनी सुन्दर है इसका आभास हो जाता है। दिल में एक नयी उंमग जागी है, दिल करता है फिर से पढूँ, जंगलों, नदियों के पास चली जाऊँ और अपने बचपन में खो जाऊँ। अब तो बस इन्तज़ार है अगले पार्ट का !!


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बढ़िया
द्वारा प्रेषित समीर लाल , मई 03, 2007
बहुत जीवंत वृतांत चालू किया है. सफारी पर जाने की इच्छा एक समय से है, पढ़कर लग रहा है, हम स्वयं घुम रहे हैं. बहुत बढ़िया वर्णन है. अगली कड़ियों का इंतजार है. बधाई.
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Yatra
द्वारा प्रेषित Vibha , मई 04, 2007
Bhawna ji aapka lekh padha hamare man me bhi tamanna jagi ha is safar par jane ki jab ham kabhi uganda aayenge to aapse milenge or aapse aagraha karenge ki eak bar aap hame apne sath is yatra par le chale aapke sath yatra karne ka aanand hi alag hoga.agla part jaldi hi bhejiyega intjar men bathi hun. :-
vibha
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kalpana bahut achchhi lagi
द्वारा प्रेषित Lalit , मई 04, 2007
Aapka aalekh padha... bahut Sunder hai -photographs bhi
achchhe
hain... Visheshkar aapki chhoti beti ki fairy ke baare mein kalpana
bahut
achchhi lagi :-)

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वाह !!!
द्वारा प्रेषित अनूप भार्गव , मई 04, 2007
सफ़ारी हमारी भी 'विश लिस्ट' (Wish अंग्रेजी वाला smilies/grin.gif) में है । कभी कभी आदमी जानवरों से काफ़ी सीख लेता है ।
आप की बिटिया का नाम अच्छा लगा । एक हमारी भी कनुप्रिया है । कहते हैं ना Great Minds Think Alike smilies/grin.gif


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यात्रा संस्मरण
द्वारा प्रेषित रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' , मई 04, 2007
भावना जी , आपका यह यात्रा संस्मरण मोहक है । आपका कवि मन इस और सुन्दर बना देता है ,इसमें बच्चों के प्रसंग जोड़कर आपने इसे और प्रभावी बना दिया है ।भाषा का प्रवाह सराहनीय है ।
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...
द्वारा प्रेषित लावण्या , मई 05, 2007
[b][/b]भावना जी,नमस्कार !
ऐश्वर्या व कनु बिटिया को मेरे आशिष ~`
परीयोँ की कहानीयाँ हर बच्चोँ के हिस्से आतीँ रहेँ यही मेरी इच्छा है ~
वाह ! सफारी विवरण बढिया शुरु किया है आपने,
अगली किस्तोँ का इँतजार रहेगा ~~
आप का मन कितना रम गया होगा कि, आप पैसेवाला बस्ता ही भूल गईँ !!
आफ्रीका के बारे मेँ हम बहुत कम बातेँ जानते हैँ - आशा है, आप वहाँ की और भी बातेँ हमेँ सुनायेँगीँ
मेरी शुभकामना आपके परिवार के लिये ....लिखती रहिये..
स ` स्नेह,
लावण्या smilies/kiss.gif
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Very Good
द्वारा प्रेषित Pankaj Saran , मई 07, 2007
Dear Bhawna, The article is very nice and explanation is live. Keep us posted for the next instalment of the safari. Regards, Pankaj & Ujjwala
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Regards-Bhabi Ji
द्वारा प्रेषित Nischal , मई 07, 2007
The article is really superab, and one can easily feel himself going with you, because, you have discribed this so easily and natural. With regard to innu's fairy tails i know how sweet she is. Keep on going to write more.
Regards.
Nischal
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खूब सैर की
द्वारा प्रेषित राकेश खंडेलवाल , मई 09, 2007
याद आ गईं मुझे सरिका के जंगल के मीठे अनुभव
जुड़े और नैसर्गिकता से जब अपनी आशा के जेवर
फिर से दॄश्य उभर आये हैं नयनों के पाटल पर मेरे
शांत झील में फ़ैंक गया है लेख आपका आकर कंकर
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धन्यवाद
द्वारा प्रेषित डॉ० भावना कुँअर , मई 10, 2007
संजय जी, डॉ जगदीश व्योम जी, सपना जी, समीर जी, विभा जी और ललित जी आप सबका धन्यवाद जो आपको ये वृतान्त पंसद आया। जल्दी ही दूसरा पार्ट भी आप सबको पढ़ने को मिलेगा। बहुत-बहुत शुक्रिया।
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शुक्रिया
द्वारा प्रेषित डॉ० भावना कुँअर , मई 10, 2007
अनूप जी आप कभी आईये यहाँ आपका स्वागत है फिर हम सब मिलकर एक बार फिर इस यात्रा पर निकलेंगे। ये अच्छा है कि हमारी बेटियों का नाम एक ही है अच्छा लगा जानकर। वृतान्त पसन्द करने के लिये शुक्रिया।
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आभारी हूँ
द्वारा प्रेषित डॉ० भावना कुँअर , मई 10, 2007
रामेश्वर कम्बोज़ जी, लावन्या जी बहुत आभारी हूँ आप दोनों की अपना स्नेह बनाये रखियेगा। सही कहा लावन्या जी मन तो बहुत रम गया था।
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शुक्रिया
द्वारा प्रेषित डॉ० भावना कुँअर , मई 10, 2007
पंकज भैया, उज्जवला जी, निश्चल भैया आप लोगों ने इसको पढ़ा बहुत अच्छा लगा। इस बार इंडिया आने पर आप सबको हिन्दी में लिखना भी सिखाना है याद रखियेगा। तरकश पर आते रहियेगा। आपका शुक्रिया न करने पर आपके नाराज़ होने का भी डर है न, तो बहुत-बहुत शुक्रिया।

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जानने की इच्छा
द्वारा प्रेषित डॉ० भावना कुँअर , मई 10, 2007
खूबसूरत लफ्ज़ों से सज़ी आपकी तारीफ़ को तो हमेशा इन्तज़ार रहता है। बहुत-बहुत शुक्रिया। सरिका के जंगल के मीठे अनुभव जानने की इच्छा है। अगर समय निकाल पायें तो।
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