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मरचीज़न फॉल नेशनल पार्क की यात्रा-5 |
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भ्रमण
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शनिवार , , 04 अगस्त |
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भावना कुँअर
भावना कुँअर उत्कृष्ट कवियत्री तथा हिन्दी चिट्ठाकार हैं
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कुछ दूर रास्ता तय करके हम नाइल रिवर पहुँचे। वहाँ पर हम लोग गाड़ी से उतर गये और गाड़ी को फेरी पर चढ़ाया गया। वहाँ बहुत सारी गाड़ियाँ थीं। हम लोग भी फेरी पर साईड में जाकर खड़े हो गये, ये सफ़र भी अपने आप में अलग ही था। १५ से २० मिनट के बाद हम नाईल रिवर के पार थे। सभी गाड़ियाँ फेरी से उतारी गयीं और हम सब अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठकर "पारा नेशनल पार्क" की तरफ चल पड़े।
"पारा नेशनल पार्क" युगांड़ा का सबसे बड़ा नेशनल पार्क है। हम सबने गाड़ी में ही ब्रेकफास्ट किया। लगभग २० मिनट की यात्रा के बाद ही हमें जानवर दिखाई देने लगे। जो खतरनाक न होकर मित्रता रखने वाले होते हैं, अगर आप उनको कुछ खाने को भी दो तो वो आप पर हमला नहीं करते। पर कुछ खतरनाक भी होते हैं। गाड़ी का ऊपर का हिस्सा खोलकर हम खड़े हो गये और झुंड़ के झुंड़ जानवरों को अपने कैमरे में कैद करते चले गये। वहाँ पर हिरण परिवार किलोल कर रहे थे। छोटे-छोटे हिरण के बच्चे जहाँ के तहाँ खड़े रहते, किन्तु बड़े-बड़े हिरण गाड़ी को देखकर भाग खड़े होते।
जिराफ़ तो बहुत ही खूबसूरत लग रहे थे। वो बहुत शान्त स्वभाव के दिखे। कहीं तो वो अपने जीवन साथी के साथ खड़े थे और कहीं अपने नन्हें-नन्हें बच्चों के साथ। हम उनको निहारते रहते और वहाँ से हटने का मन न करता बस उनको देखते रहने में ही सुकून मिलता था, किन्तु हर जगह आने जाने का समय निश्चित था क्योंकि अगर देर होती तो आगे का प्रोग्राम चौपट हो जाता, तभी तो हम लोगों को सुबह ६ बजे निकलना पड़ा क्योंकि सुबह-सुबह सब जानवर दिख जाते हैं देर करने पर नहीं, अब हम अपनी भयानक रात को भूल चुके थे।
आगे बढ़े तो अफ्रीकन भैंसे देखे जो देखने में बहुत खतरनाक लग रहे थे और वास्तव में थे भी, तभी तो किसी भी गाड़ी के आने पर भाग खड़े नहीं होते थे बल्कि उनसे आँखे मिलाते थे और इस ताक में रहते थे कि दौड़कर गाड़ी को पलट दें। उनमें इतनी सामर्थ्य जो थी। वहाँ हम रुक नहीं सकते थे सो चलते-चलते ही उनको देखा, जो लगातार ही अपनी भयानक आँखों से हमें देखे जा रहे थे।
बबून भी इधर-उधर दौड़ रहे थे, जो देखने में खूबसूरत तो नहीं किन्तु खतरनाक जरूर दिखते थे।
आगे चलकर एक दौराहा आता है वहाँ से एक रास्ता पड़ता है हम लोग उस रास्ते पर बढ़ चले क्योंकि वह रास्ता हमें हाथियों के झुंड के पास ले जाता था। वहाँ हमने देखा बड़े-२ अफ्रीकन हाथी अपनी मस्त चाल से लोगों में आकर्षण का केन्द्र बने थे। अफ्रीकन हाथी तो दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। एक हाथी ने पेड़ से फल तोड़ा और एक ही झटके में उसको छील लिया और फिर बड़े मज़े से उसका स्वाद लेने लगा। वास्तव में देखने में बहुत ही आश्चर्य जनक था कितनी सफाई से फल तोड़ा पेड़ को हिलाकर, छीला और खा लिया।
अब यहाँ आये तो यहाँ से जुड़ी बातें भी याद आनी ही हैं, तो सुनिये अफ्रीकन जंगल में कुछ साल पहले एक बहुत दिल दहला देने वाला हादसा हुआ था। जैसे कि मैंने पहले भी बताया कि यहाँ आप गाड़ी से नीचे नहीं उतर सकते, बैठे-बैठे ही आप जानवरों को देख सकते हैं। यहाँ शिकार करने की भी इज़ाजत नहीं है, यहाँ तक कि अगर आप गाड़ी को सड़क से उतार कर इधर-उधर चलाते हैं तो भी आपको जुर्माना देना होगा। कुछ जानवर मित्रता का व्यवहार इसलिये रखते हैं कि यहाँ शिकारी तो आते नहीं हैं इसलिये वो बेखौफ घूमते हैं, किन्तु कुछ खतरनाक भी हैं जैसे-शेर, हाथी, जगंली सूअर, भैसे आदि, किन्तु ज़िराफ, हिरण जैसे जानवर कोई नुकसान नहीं पहुँचाते। यहाँ जानवरों के छोटे-२ बच्चे आकर्षण का केन्द्र हैं उनको देखकर छूने का यहाँ तक कि घर लाने का भी मन करता है किन्तु मन पर काबू रखना पड़ता है क्योंकि माँ-बाप से बच्चे को अलग करने में हमें तो खुशी नहीं मिल सकती औरों का पता नहीं, बस इसी आर्कषण के वशीभूत होकर एक व्यक्ति ने जो एशियन था, उम्र यही कोई २० या २२ साल रही होगी, ड्राईवर और रेंजर के मना करने पर भी गाड़ी से उतरने की जुर्रत तो की ही, साथ ही हाथी के छोटे से बच्चे के साथ खिलवाड़ भी शुरु कर दिया, बच्चे की माँ ने ये सोचकर कि उसके बच्चे को तंग कर रहे हैं या साथ ले जा रहें हैं, उस व्यक्ति पर हमला कर दिया। हथिनी ने व्यक्ति को पकड़ा और पटक कर दो बार जमीन पर मारा और फिर उठाकर उसको चीर डाला। उसके साथी गाड़ी में बैठे चीख चिल्ला रहे थे, उनसे अपने साथी की हालत देखी नहीं जा रही थी, वह खून से लथपथ हो चुका था, देखते ही देखते जीता जागता व्यक्ति टुकड़ों में बदल गया, किन्तु हथिनी का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था, समय की नज़ाकत को देखते हुये सभी साथी दुखी मन से उसको छोड़कर आगे बढ़ गये, उसमें ले जाने को कुछ बचा भी नहीं था और लेते भी कैसे हथिनी अभी भी पागल हुई उसको कुचले जा रही थी। अब हम इसको क्या कहें उस व्यक्ति की बदकिस्मती या उसकी लापरवाही।
हम लोग यहाँ जंगल में ७ बज़कर ३० मिनट पर पहुँच गये थे और ११ बज़कर ३० मिनट तक जंगल में ही घूमते रहे, उसके बाद वापस प्रस्थान किया फेरी पर, फिर वापस अपनी लॉज में। यहाँ स्नान से निवृत्त होकर लंच करने के लिये अपनी टेबल पर जा बैठे खाने के इन्तज़ार में।
बस इस जंगल की खट्टी मिट्ठी यादों को समेटे हम लोग वापस कम्पाला के लिये रवाना हुये अब दिन के १ बजकर ३० मिनट हुये थे। रास्ते में देखा तो जंगल में भंयकर आग लगी हुई थी, जो कल तक सही सलामत था आज़ वही बुरी तरह झुलस रहा था। शायद गर्मी के कारण ही ऐसा हुआ था। गर्मी चाहे कितनी भी ज्यादा थी फिर भी लोग जंगल में मंगल मना रहे थे। ईस्टर के कारण चारों तरफ धूम मची थी। अफ्रीकन परिवार जंगल में खाना आदि बना रहे थे और संगीत की धुन पर थिरक रहे थे। कम्पाला तक आते हुये यही मँज़र देखने को मिला। हम लोग भी वैन में हिन्दी गानों, तमिल गानों को गाते सुनते हुये, ऊबड़-खाबड़ रास्ता तय करते हुये, ३ बज़कर ३५ मिनट पर समतल रास्ते पर आ गये। कमाल था गाने भी क्या-क्या याद आ रहे थे जैसे- "आते जाते खूबसूरत आवारा सड़कों पे, कभी-कभी इत्तफाक से…..भूपेन्द्र जी ने और प्रगीत जी ने समा बाँध रखा था तो कभी- “ये शाम मस्तानी मदहोश किये जाये, मुझे डोर कोई खींचे…तो शाम भी घिर कर आने लगी। बस यूँ ही गाते गुनगुनाते हम लोग कम्पाला पहुँच ही रहे थे कि जाते-जाते एक निशानी जंगल की मिल ही गयी, मेरी बड़ी बेटी को एक मक्खी ने काटकर हमें विदाई दी। हम ठीक ६ बज़े अपने-अपने घर पहुँच गये।
बस ये यात्रा वर्णन यहीं समाप्त होता है। सभी पाठकों के स्नेह और उत्साह वर्धन के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद। भविष्य में कभी और किसी यात्रा पर जाना हुआ तो फिर आपसे मुलाकात होगी। तब तक के लिये आप सबसे विदा।
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