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मुनी की रेती: एक आलौकिक अनुभव
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
बेकारअति उत्तम 
भ्रमण
मंगलवार , , 23 अक्टूबर

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  प्रिति टेलर


 

श्रीमति प्रिति टेलर वडोदरा शहर में रहती हैं. प्रिति तरकश के लिए भ्रमण वृतांत लिखती हैं. 

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भारत विविधताओं का देश है. यहाँ प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक स्थलों की भरमार है. मुझे हमेशा से घूमने का शौक रहा है. मैंने भ्रमण के दौरान भारत के कई पर्यटन और ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया है. इन्ही पर्यटन स्थलों में से कुछ स्थलों का विवरण अपने शब्दों में देना चाहूँगी.

4. मुनी की रेती -

laxman-jhoolaदोस्तों अब हम ऋषीकेश की मुख्य सड़क पर आ गए है और हमारा अगला पड़ाव होगा मुनी की रेती. यहाँ से हमे डीजल से चलने वाले ऑटोरिक्शा बड़े आराम से मिल जाते है जो पांच रुपये प्रति व्यक्ति किराया लेकर हमे अपने गन्तव्य स्थान की ओर ले जाते है .

आप पहले लक्ष्मण झुला और फ़िर रामझुला या इससे विपरीत विकल्प ले सकते है. अब आप दिल को थाम लीजिये और आँखों में गंगा एवं हिमालय के अप्रतिम सौंदर्य को भरने के लिए तैयार हो जाइए. रास्ता अभी एकदम से ऊंचाई तो नहीं पकड़ता दिखता है पर फिर भी हिमालय के साम्राज्य में आप अपना पहला कदम बढ़ा रहें हैं. उसकी हसीं वादियाँ आपको मंत्र मुग्ध कर देगी.

हम सीधे लक्ष्मण झुला ही पहुँचते है. वहाँ हम अपने आपको सुंदर पहाड़ों से घिरे हुए पाते हैं. रिक्शा छोड़कर हम रास्ते पर चल देते है. बीच मे एक बड़ी हनुमानजी की मूर्ति आती है और पीछे भव्य शिव मंदिर है. दर्शन करते हुए हम आगे चलते है. आसपास कतारों में दुकानें लगी हुई है. पहाड़ पार चढ़ते उतरते रास्ते पर आगे बढ़ते हुए हम पहुँच जाते है लक्ष्मण झुला के एक छोर पर. अब दिल थामकर हिमालय पुत्री गंगा का चुलबुला अठखेलियाँ करता नया रूप देखने को मन करता है. कहते है यह पुल गंगा नदी से १५० फ़ीट की ऊंचाई पर बना हुआ है [मैंने मापने की कोशिश नहीं की है !!]. पुल पर चलने से वह हिलता रहता है. आप इसपर चल रहे हों तो एकदम बीच में जाकर तनिक ठहर जाइये. चारो दिशाओं में एक बार घूम कर देखिये. अपनी आंखों को एक पल के लिए बंद कर के ठंडी हवाओं की ताज़गी को अपने अंदर भर लीजिये. अब हौले के आँखें खेलिए और हिमालय के साम्राज्य की ओर देखते हुए एक अलौकिक अनुभव किजीए. ये लिखते हुए भी मैं अभी अपने आप को वहां पर ही महसूस कर रही हूँ.

munikireti-monkeyयहाँ बंदर बहुत है .एक शौकीन बंदर तो आइस क्रीम खाते हुए भी देखा गया. आते जाते लोग कुछ न कुछ देते रहते है.

पुल के दूसरे छोर पर विशाल मन्दिर खड़े है. बायें और के चौदह मंज़िल वाले मन्दिर में आपको भारत देश के सभी भगवान के दर्शन हो जायेंगे. हम आस पास के मन्दिर में दर्शन करते हुए यहाँ से बने सीधे रास्ते पर चलते हुए रामझुला जाने के लिए पैदल ही चल पड़ते है. गंगा की गूँज की ध्वनि हमारे कानों में पड़ती रहती है. रास्ते के दोनों तरफ़ आम के बगीचे है.

अब शुरू होता है गंगा के किनारे से लगा हुआ रास्ता. जहाँ पर एक से बढ़कर एक भव्य मंदिरों की शृंखला है और है विशाल घाट. साफ सीढ़ियों वाले इस घाट पर आप गंगा स्नान का आनंद ले सकते हैं. यहाँ भी ज्यादा भिड़ भाड़ नहीं होती है ..

आगे चलकर आता है गीता भवन एक भव्य मन्दिर परिसर. अंदर जाकर परिभ्रमण करने पर आध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है. यहाँ अगर आप कुछ दिन ठहरना चाहते हो तो इसका इंतज़ाम भी है. एडवांस बुकिंग होती है. यहाँ पर बारह बजने से पहले पहुँच जाएँ तो सिर्फ़ दस रूपये में शुद्ध शाकाहारी ,सात्विक ,कम मसालेवाला फ़िर भी स्वादिष्ट खाने की थाली मिलती है. पास मे ही परमार्थ निकेतन है. इसे मैं आश्रम नहीं पर एक शांत आध्यात्मिक अलौकिक अनुभव ही कहूँगी. कितनी पावन और शांत जगह है यह. एक सुंदर सीढियों वाला साफ सुथरा घाट. गंगा के प्रवाह के अंदर बनी शिव जी की विशाल भव्य प्रतिमा. यहाँ पर कुछ घंटों तक बैठ कर आप थोड़ी उछल कूद करती, अंगडाई लेती शरारती गंगा नदी से मूक वार्तालाप भी कर सकते है. रिवर राफ्टिंग के खेल प्रेमिओं की नौकाएँ भी आपको लहरों पर उछलती नज़र आएगी. आप अगर ये शौक रखते है तो यहाँ से पन्द्रह बीस मिल की दूरी पर जीप से वहाँ जा सकते हैं जहाँ से रिवर राफ्टिंग करते हुए लौटा जा सकता है. बहुत सारे विदेशी लोग यहाँ पर योग विद्या के लिए आते है और शांति से यहाँ ठहरते भी है.

यहाँ से रामझुला लौट सकते हैं अथवा नौका विहार का आनंद लेते हुए सामने घाट पर भी जा सकते हैं. वहां पर गीता प्रेस गोरखपुर की दुकान भी है और एक अच्छा बाज़ार भी. नौका विहार के दौरान मध्य में गंगा के निर्मल जल को छूने का एहसास अवर्णनीय है .

हाँ एक और बात काली कमली वाले बाबा के आश्रम के नज़दीक से जीप के जरिये नीलकंठ महादेव के मन्दिर जा सकते है जो बारह किलो मीटर की दूरी पर स्थित है, वैसे हम लोग वहां नहीं जा पाए थे किंतु वहां का महात्म भी अधिक है.

जब हम यहाँ से वापस चलते है तो हमारी आत्मा जैसे इधर ही ठहर जाती है और शरीर ऋषीकेश की और गति करता है. हिमालय और गंगा के इस सफर को जारी रखते हुए अगली बार आपको मैं ले चलूंगी एक सीप में छुपे हुए मोती के पास. बस थोड़ा और इंतजार .........
 
 
 
 


 
 

 

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